Monday, 19 August 2019

कृष्णवाद



























'भगवान श्री कृष्ण' का मनोरम और मंगलकारी नाम ही एक विराट वैश्विक दर्शन है क्यों कि उनका सम्पूर्ण जीवन ऐसे अनेक असाधारण घटनाक्रमों और संघर्षों से भरा पड़ा है जिसमें वह किसी लोकनायक की भूमिका से कम नही नजर आते है . दुनिया भर के लाखो बुद्धिजीवी श्री कृष्ण के रहस्यमय जीवन और उनके बताये दुर्लभ ज्ञान को जानने को सदैव उत्सुक बने रहते है . इसलिए यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि आखिर 'श्री कृष्ण' के विराट व्यक्तित्व में ऐसा क्या है जो सदियों से दुनिया भर के श्रेष्ठ अध्यात्मिक दार्शनिको व धार्मिक गुरुओ को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है . कही वह कुरुछेत्र के रण में महाभारत के महानायक श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया वह परम ज्ञान 'श्री मद भगवत गीता' तो नहीं है या फिर महाभारत नामक वह महाग्रंथ, जिसमे देश, धर्म-अधर्म , न्याय-अन्याय , राजनीति, समाज, युद्ध, परिवार, ज्ञान-विज्ञान, अध्यात्म समेत जीवन के समस्त छेत्रो का अद्भुत वर्णन समाहित है . इस सन्दर्भ में सम्पूर्ण विश्व को लोक -परलोक से सम्बन्धित रहस्यमयी ज्ञान देने वाली 'श्री मद भगवत गीता' में श्री कृष्ण के विराट व्यक्तित्व के आगे नतमस्तक होते हुए कुंती पुत्र अर्जुन द्वारा की गई यह एक स्तुति बेहद खास है. 


"वासुदेव सुतं देवम कंस चाणूर मर्दनम्,
देवकी परमानन्दं कृष्णम वन्दे जगतगुरु"
अर्थात 
वासुदेव जी के पुत्र, देवो के देव , कंस और चाणूर को मारने वाले, देवकी को अपार आनंद देने वाले श्री कृष्ण आप इस विश्व के सबसे बड़े और श्रेष्ठ गुरु है .

स्पष्ट है श्री कृष्ण का महान व्यक्तित्व पूरी दुनिया भर में सबसे महानतम है जिसमें उनकी बहुरूपता के भव्य दर्शन होते है. वास्तव में इस प्रक्रति का हर रंग -रूप उनमे समाहित है . "कृष्ण" मूलतः एक संस्कृत शब्द है, जो "काला", "अंधेरा" या "गहरा नीला" का समानार्थी है. "अंधकार" शब्द से इसका सम्बन्ध ढलते चंद्रमा के समय को कृष्ण पक्ष कहे जाने में भी स्पष्ट होता है. हालांकि इस नाम का अनुवाद कहीं-कहीं "अति-आकर्षक" के रूप में भी किया गया है. 

श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र के दिन रात्रि  के 12 बजे हुआ था . उनका यह जन्मदिन श्री क्रष्ण जन्माष्टमी के नाम से भारत, नेपाल, अमेरिका सहित लगभग सम्पूर्ण विश्व में मनाया जाता है. कृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था तथा वह माता देवकी और पिता वासुदेव की 8 वीं संतान थे. दरअसल कृष्ण का जन्म ही नितान्त विषम परिस्थितियों में होता है . जिस बालक का जन्म कारागार के अंदर हो उसके लिए आगे का जीवन, संघर्ष का दूसरा नाम ही होना चाहिए . सबको पता है कि कारागार कोई पवित्र स्थल नही होता है किन्तु कृष्ण ने दुनिया को बताया कि जन्मस्थान से कोई महान नही होता अपितू अपने सद्कर्मो से ही महान बना जा सकता है . ब्रज का मुरलीधर और कुरुछेत्र का श्री कृष्ण, वास्तव में न जाने कितने ही स्वरूपों में श्री क्रष्ण ने स्वयम को प्रस्तुत किया . एक तरफ बांस के पेड़ से निर्मित उनकी मुरली की मधुर धुन ब्रजवासियो को विह्वल करती है तो दूसरी तरफ वह कुरुछेत्र के मैदान में कुशल सारथी बन कर अर्जुन के साथ शंखनाद कर रहे है . अपनी चंचल बाल लीलाओ के माध्यम से खेल -खेल में मथुरा के राजा कंस मामा के भेजे आतताईयो का संहार करना हो या कन्दुक लेने के बहाने यमुना में कालिया नाग को दंडित करना हो , समस्त कृष्ण लीलाए अपरम्पार है . कही युवा कृष्ण अन्याई और अधर्मी कंस का संहार करते है तो अन्यत्र वह गोपियों के संग अपनी मधुर बांसुरी लेकर प्रेम का शास्वत संदेश भी दे रहे है . श्री कृष्ण ने अन्याय से लड़ते हुए तमाम राजा -महाराजा , मायावी दुष्टों को ही नहीं अपितु देवेन्द्र तक को पराजित किया . पता नही क्यों यदुनन्दन कृष्ण के तेज को देवराज इंद्र भी न समझ सके और अपनी एक भूल के कारण इस लोक में अपने देवत्व को गंवा बैठे . कृष्ण का महान व्यक्तित्व इंसानों का ही रछक नही अपितु जीव -जन्तुओ का भी पालक नजर आता है . वास्तव में पूरे विश्व में श्री कृष्ण से बढ़ कर अन्य कोई गोपालक भी नही हुआ होगा . अपनी इन्ही गायो और ग्वालो की रछा करने हेतु वह श्री कृष्ण से गिरधर बन गये . 

ब्रज की गोपिया उन्हें छलिया अवश्य कहती है लेकिन वही छलिया क्रष्ण आखिरकार क्रष्णा (द्रोपदी) के पुकारने में उसकी लाज रखने हेतु पहुच जाते है . ब्रज में राधा अहीरिन (अनुराधा ) के साथ कृष्ण अहीर की रास लीला और प्रेम अठखेलिया उनके निष्काम प्रेम का अभूतपूर्व संदेश है . हालांकि उनके निष्काम प्रेम के स्थान पर आजकल देश में जोर -जबरदस्ती और विकृत मानसिकता काफी ज्यादा हावी है . सम्भवतः यह पाश्चात्य संस्क्रती का भारतीय संस्क्रती पर आक्रमण है . वास्तव में राधा-कृष्ण के प्रेम में नर -नारी के समत्व के दर्शन भी होते है . चर्चा जब राधा -कृष्ण की हो तो मीरा का नाम भी सामने आ जाता है . वही मीराबाई जहा से चित्तौड़ की एक रानी पद्मिनी भी थी . इसी धरती से मीरा ने कृष्णभक्ति में अपना सर्वस्व त्याग दिया . कहा जाता है कि वह कृष्ण के प्रेम में इस कदर खोई कि जहर का प्याला भी अपने अधरों से लगा लिया . अंत मे मीरा ने अपनी अटूट भक्ति से कृष्ण के प्रेम को प्राप्त किया किन्तु मीराबाई का उदय एक ऐसे समय में हुआ था जब भारत में खानवा का युद्ध भी हुआ और इस युद्ध में बाबर ने राणा सांगा को पराजित कर मुग़ल साम्राज्य की नीव डाल दी थी . इस दौर में यह प्रश्न काफी अहम था कि जब मीराबाई अपने इष्ट श्री कृष्ण के प्रेम में डूबी हुई थी तब उस दौर में भारत के राजे -महाराजाओ ने श्री कृष्ण की युद्ध कलाओं और कूटनीति से कोई सबक क्यों नहीं लिया . 


श्री कृष्ण ने अपने जीवनकाल में अथाह पराक्रम और कल्याणकारी कर्म किये इसलिए उन्हें कर्मो का देव मान लेना चाहिए था . किन्तु यह एक विडम्बना ही है कि कर्मयोगी होने के बावजूद भी वह इस देश के जनमानस के अंतर्मन में कर्म के देवता नहीं बन सके . वास्तव में श्री क्रष्ण का जीवन एक लोकनायक के समान ही है . कुरुछेत्र के रण में उन्होंने अर्जुन से स्पष्ट कहा कि इस ब्रह्मांड में कर्म ही असली पूजा है और व्यक्ति या जीव का कर्म ही उसके भाग्य का निर्माण करता है . कृष्ण यादव शिरोमणि है लेकिन दुर्भाग्य से उनके वंशज ही उन्हें अपना आदर्श मानने से कतराते है . उनके वंशज अहीर समाज अपने पुरखे यदुनन्दन श्री कृष्ण के कृष्णवाद को अपनाना तो दूर वे सुबह -शाम उनका ध्यान और स्मरण भी भूल गये . इस प्रकार कृष्ण का विराट वैश्विक व्यक्तित्व अपने वंशजो में ही गुमनाम हो गया . हालांकि बंगाल और उड़ीसा में कृष्ण आज भी काफी जीवंत है . बंगाल में तो किसी की म्रत्यु होने पर ' बोलो हरि -बोल हरि' का उद्घोष आज भी सुनाई पड़ जाता है . महाभारत का एक रोचक प्रसंग कुछ इस प्रकार है . 


वनवास जाने से पूर्व पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- 'हे श्रीकृष्ण! अभी यह द्वाप‍र का अंतकाल चल रहा है. आप हमें बताइए कि आने वाले कलियुग में कलिकाल की चाल या गति क्या होगी ,कैसी होगी?' तब श्रीकृष्ण ने कहा - 'तुम पांचों भाई वन में जाओ और जो कुछ भी वहा दिखे वह आकर मुझे बताओ. मैं तुम्हें उसका प्रभाव अवश्य बताऊंगा '. पांचों भाई वन में गए और वहा जाकर उन्होंने जो देखा उसको देखकर वे सब आश्चर्यचकित रह गए. पांचों भाई वन में अलग-अलग दिशाओं में भ्रमण को निकले. युधिष्ठिर भ्रमण पर थे तो उन्होंने एक जगह पर देखा कि किसी हाथी की दो सूंड है. यह देखकर युधिष्ठिर के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. अर्जुन दूसरी दिशा में भ्रमण पर थे. उन्होंने देखा कि कोई पक्षी है, उसके पंखों पर वेद की ऋचाएं लिखी हुई हैं, पर वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है. महाबली भीम ने देखा कि गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और जन्म के बाद वह बछड़े को इतना चाट रही है कि बछड़ा लहुलुहान हो गया. सहदेव ने देखा कि 6-7 कुएं हैं और आसपास के कुओं में पानी है किंतु बीच का कुआं खाली है. बीच का कुआं गहरा है फिर भी पानी नहीं है. उन्हें यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है?इसी प्रकार नकुल ने देखा कि एक पहाड़ के ऊपर से एक बड़ी-सी शिला लुढ़कती हुई आती है और कितने ही वृक्षों से टकराकर उनको नीचे गिराते हुए आगे बढ़ जाती है. विशालकाय वृक्ष भी उसे रोक न सके. इसके अलावा वह शिला कितनी ही अन्य शिलाओं के साथ टकराई पर फिर भी वह रुकी नहीं और अंत में एक अत्यंत छोटे पौधे का स्पर्श होते ही वह स्थिर हो गई.

पांचों भाइयों ने अपने देखे गए दृश्य की चर्चा की और शाम को श्रीकृष्ण को अपने अनुभव सुनाए. सबसे पहले युधिष्ठिर ने कहा कि मैंने तो पहली बार दो सूंड वाला हाथी देखा. यह मेरे लिए बहुत ही आश्चर्यजनक था. तब श्रीकृष्ण कहते हैं- 'हे धर्मराज! अब तुम कलिकाल की सुनो. कलियुग में ऐसे लोगों का राज्य होगा, जो दोनों ओर से शोषण करेंगे. बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ. मन में कुछ और कर्म में कुछ और , ऐसे ही लोगों का राज्य होगा.' इसके बाद अर्जुन की बात पर श्री क्रष्ण ने कहा कलियुग में ऐसे लोग रहेंगे, जो बड़े ज्ञानी और ध्यानी कहलाएंगे. वे ज्ञान की चर्चा तो करेंगे, लेकिन उनके आचरण राक्षसी होंगे. बड़े पंडित और विद्वान कहलाएंगे किंतु वे यही देखते रहेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और हमारे नाम से संपत्ति कर जाए.' 'हे अर्जुन! 'संस्था' के व्यक्ति विचारेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और संस्था हमारे नाम से हो जाए. हर जाति धर्म के प्रमुख पद पर बैठे विचार करेंगे कि कब किसका श्राद्ध हो. कौन, कब, किस पद से हटे और हम उस पर चढ़े. चाहे कितने भी बड़े लोग होंगे किंतु उनकी दृष्टि तो धन और पद के ऊपर ही रहेगी. ऐसे लोगों की बहुतायत होगी, कोई-कोई विरला ही सज्जन पुरुष होगा.' इसके पश्चात भीम के द्रष्टान्त पर श्री क्रष्ण ने कहा कलियुग का मनुष्य शिशुपाल के समान हो जाएगा. कलियुग में बालकों के लिए ममता के कारण इतना मोह करेगा कि उन्हें अपने विकास का अवसर ही नहीं मिलेगा. मोह-माया में ही घर बर्बाद हो जाएगा. किसी का बेटा घर छोड़कर साधु बनेगा तो हजारों व्यक्ति दर्शन करेंगे, किंतु यदि अपना बेटा साधु बनता होगा तो रोएंगे कि मेरे बेटे का क्या होगा? इतनी सारी ममता होगी कि उसे मोह-माया और परिवार में ही बांधकर रखेंगे और उसका जीवन वहीं खत्म हो जाएगा. अंत में वह बेचारा अनाथ होकर मरेगा. वास्तव में लड़के तुम्हारे नहीं हैं, वे तो बहुओं की अमानत हैं, लड़कियां जमाइयों की अमानत हैं और तुम्हारा यह शरीर मृत्यु की अमानत है. तुम्हारी आत्मा, परमात्मा की अमानत है. तुम अपने शाश्वत संबंध को जान लो '. इसके उपरान्त सहदेव की बात सुनकर श्री क्रष्ण कहते है ,'कलियुग में धनाढ्‍य लोग लड़के-लड़की के विवाह में, मकान के उत्सव में, छोटे-बड़े उत्सवों में तो लाखों रुपए खर्च कर देंगे, परंतु पड़ोस में ही यदि कोई भूखा-प्यासा होगा तो यह नहीं देखेंगे कि उसका पेट भरा है या नहीं. उनका अपना ही सगा भूख से मर जाएगा और वे देखते रहेंगे. दूसरी और मौज, मदिरा, मांस-भक्षण, सुंदरता और व्यसन में पैसे उड़ा देंगे किंतु किसी के दो आंसू पोंछने में उनकी रुचि न होगी. कहने का तात्पर्य यह कि कलियुग में अन्न के भंडार होंगे लेकिन लोग भूख से मरेंगे. सामने महलों, बंगलों में ऐशोआराम चल रहे होंगे लेकिन पास की झोपड़ी में आदमी भूख से मर जाएगा. अत: एक ही जगह पर असमानता अपने चरम पर होगी.' अंत में नकुल की बात पर श्री क्रष्ण जी ने कहा ,'कलियुग में मानव का मन नीचे गिरेगा, उसका जीवन पतित होगा. यह पतित जीवन धन की शिलाओं से नहीं रुकेगा, न ही सत्ता के वृक्षों से रुकेगा. किंतु हरि नाम के एक छोटे से पौधे से, हरि कीर्तन के एक छोटे से पौधे से मनुष्य जीवन का पतन होना रुक जाएगा.' 


पांड्वो और श्री क्रष्ण के मध्य का यह वार्तालाप आज के दौर पर एकदम सटीक बैठता है . इसलिए श्रीक्रष्ण के युगपुरुष होने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए . वास्तव में वह दूरदर्शी और त्रिकालदर्शी भी थे . उनके द्वारा नरकासुर की कैद से मुक्त करवाई गई 16000 कन्याओं को समाज में उचित स्थान नहीं मिल पाएगा और इससे अनेक अनर्थ होंगे, यह विचार कर उन्होंने उन सबसे स्वयम विवाह रचाया. इससे उनके समाज और स्त्रियों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार रखने का पता चलता है . पांडवों के राजसूय यज्ञ के समय श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों का पादप्रक्षालन कर स्वयं जूठे पत्तल उठाए . यह उनकी महानता का बेजोड़ उदाहरण है . 

किंवदन्तियो के अनुसार 124 वर्षों के जीवनकाल के बाद श्री क्रष्ण ने अपनी लीला समाप्त की और उनकी मृत्यु के तुरंत बाद ही कलियुग का आरंभ भी माना जाता है. महाभारत के बाद गांधारी के श्राप के दंश को झेल रहा कृष्ण का यदुवंश हकीकत में निर्दोष नजर आता है . गांधारी ने अपने सभी पुत्रो के महाभारत में परलोक सिधारने पर कुपित होकर कृष्ण और उनके यदुवंश को श्राप दिया था हालांकि गांधारी का यह श्राप बिलकुल औचित्यहीन नजर आता है .काश गांधारी अपने पुत्रमोह को त्यागकर अपने अन्यायी पुत्रो और कर्तव्य से विमुख ध्र्तराष्ट्र को पांड्वो के साथ हो रहे अन्याय के बारे में समझा पाती तो शायद इस महायुद्ध की नौबत ही न आती. आखिर पांच गाँव ही तो मांग रहे थे पांडव् किन्तु दुर्योधन का यह हठ कि पांच गाँव क्या सुई के नोक बराबर भूमि भी नही देंगे . ये सरासर अन्याय ही तो था . यही नहीं, भरी सभा में जब द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था तब गांधारी कहा थी ? इन सबके बावजूद कृष्ण ने अपनी कृष्णनीति से भरपूर प्रयत्न किया था कि युद्ध न हो ,किन्तु कौरव अपने अहंकार में चूर थे . वस्तुतः युद्ध तो श्री कृष्ण भी नही चाहते थे सम्भवतः इसीलिए उन्होंने पुरे युद्ध में कोई शस्त्र नही उठाया अलबत्ता वह अर्जुन के सारथी अवश्य बने रहे . लेकिन समझौते के अनुसार इसके बदले में दुर्योधन ने पहले ही उनकी चतुरंगिनी सेना को अपने साथ मांग लिया था . निश्चित ही गांधारी का यह श्राप उसके पुत्रमोह के पूर्वाग्रह से ग्रस्त था . उसके श्राप में निष्पछता का अभाव था किन्तु जगतगुरु ने उनकी मातृत्व की भावनाओ का सम्मान कर इस श्राप को भी स्वीकार किया . 

गंगा और यमुना भारत की ऐतिहासिक नदिया है . लेकिन आज दोनों ही नदिया प्रदूषित है . यमुना नदी तो श्री कृष्ण की लीलाओ की ऐतिहासिक धरोहर है किन्तु वही सबसे ज्यादा प्रदूषित है . क्या कृष्ण के तमाम अनुयायियों और उनके वंशजो ने कभी अपनी इस धरोहर को सहेजने पर विचार किया ? कृष्ण ने अपने अनेक रूपों से भारत की एकता और संस्क्रति को सम्रद्ध करने का संदेश दिया . उन्होंने यहाँ की गायो की रछा की तो यहाँ के जन -मन को आत्मा -परमात्मा का गूढ़ ज्ञान भी दिया . उन्होंने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन आत्मा पुराने शरीर को वैसे ही छोड़ देती है, जैसे मनुष्य पुराने कपड़ों को उतार कर नए कपड़े धारण कर लेता है. आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, ना ही इसे जलाया जा सकता है, ना ही पानी से गीला किया जा सकता है, आत्मा अमर और अविनाशी है. उनके इस गूढ़ ज्ञान को आज तक कोई झुठला नही सका है . बल्कि विज्ञान भी ऊर्जा के अविनाशी होने की बात का समर्थन करता है . माया-मोह में लिप्त नागरिको को आत्मा के स्वरूप और जीव के कर्मो के अनुसार उसके पुनर्जन्म का सिद्धांत बतलाकर श्री क्रष्ण ने म्रत्यु के भय को दूर किया . उन्होंने सत रज तम (त्रिगुण) की व्याख्या कर लोकजीवन को कल्याणकारी बनाया . एक कृष्ण ही है जिनमें कर्म के त्याग , सुख-दुख,शीत-उष्ण,जय-पराजय के समत्व के योग और सब भूतों में एक अव्यव भाव का सुरीला दर्शन किया जा सकता है . संसार में एकमात्र कृष्ण ही ऐसे व्यक्तित्व हुए जिन्होंने जीवन के दर्शन को भी गीत बना दिया . जीवन के हर छेत्र में कृष्ण उच्च मानवीय आदर्शो के प्रतीक है . मित्रता की बात हो तो कृष्ण -सुदामा की मित्रता का उदाहरण आज भी काफी जीवंत है . धैर्य और सहनशीलता का गुण देखना है तो देखिये कृष्ण ने शिशुपाल की 100 गलतिया तक नजरअंदाज की . सेवक के रूप में उन्होंने जूठे बर्तनों को धोना भी स्वीकार किया . इस प्रकार श्री कृष्ण का व्यक्तित्व और उनकी नीतिया समस्त मानवीय आदर्शो का भव्य संगम है . इसीलिए सम्पूर्ण विश्व उन्हें विश्वगुरु मानता है . 

कृष्णवाद कृष्ण के निष्काम प्रेम योग ,कर्मयोग , मित्रयोग , समत्व योग और अन्याय के खिलाफ युद्ध में कूटनीतियों का वह सम्मिश्रण है जिससे आज के दौर में समाज में बन्धुत्व और समत्व आ सकता है . जिसके फलस्वरूप समाज में एकता और पारस्परिक प्रेम उपजेगा. इससे भारत की गौरवमयी संस्क्रती का पुनर्जन्म होगा और राष्ट्र संगठित व सशक्त होगा . अन्याय और अधर्म का समूल नाश होगा . विश्व में शांति का शंखनाद होगा और भारत का सम्पूर्ण विश्व में गीतगान होगा . 


कृष्ण की पूजा वैष्णववाद का हिस्सा है, जो हिंदू धर्म की एक प्रमुख परंपरा है. कृष्ण को भगवान विष्णु का पूर्ण अवतार भी माना जाता है. सभी वैष्णव परंपराएं कृष्ण को विष्णु का आठवां अवतार मानती हैं; अन्य लोग विष्णु के साथ कृष्ण की पहचान करते हैं . जयदेव अपने गीतगोविंद में कृष्ण को सर्वोच्च प्रभु मानते हैं जबकि दस अवतार उनके रूप हैं. स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक स्वामीनारायण ने भगवान के रूप में कृष्ण को स्वीकार किया है .वही "वृहद कृष्णवाद" वैष्णववाद में , वैसुलिक काल के वासुदेव और वैदिक काल के कृष्ण और गोपाल को प्रमुख माना जाता है . श्री क्रष्ण ऐतिहासिक रूप से कृष्णवाद और वैष्णववाद में इष्ट देव के प्रारंभिक रूपों में से एक है. भारतीय नृत्य और संगीत थिएटर प्राचीन ग्रंथो जैसे वेद और नाट्यशास्त्र ग्रंथों को अपना आधार मानते हैं .हिंदू ग्रंथों में पौराणिक कथाओं और किंवदंतियों से प्रेरित कई नृत्यनाटिकाओ को और चलचित्रो को , जिसमें कृष्ण-संबंधित साहित्य जैसे हरिवंश और भागवत पुराण शामिल हैं ,अभिनीत किया गया है. कृष्ण की कहानियों ने भी भारतीय थियेटर, संगीत, और नृत्य के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, विशेष रूप से रासलीला की परंपरा के माध्यम से. कथक , ओडिसी , मणिपुरी ,कुचीपुड़ी और भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ तो कृष्ण-संबंधी प्रदर्शनों के लिए ही जाने जाते हैं. कृष्णाट्टम ( कृष्णट्टम ) ने अपने मूल को कृष्ण पौराणिक कथाओं के साथ रखा है और यह कथकली नामक एक अन्य प्रमुख शास्त्रीय भारतीय नृत्य रूप से जुड़ा हुआ है .वास्तव में श्री क्रष्ण और उनका जीवन भारत की संस्क्रती में रचा -बसा हुआ है . उनके विचार और तत्वज्ञान भारत के बाहर भी प्रकाशमान है . वह एक वैश्विक और दैवीय व्यक्तित्व है जिनमे सदियों से जनमानस की आस्था व्याप्त है . पूरे ब्रह्मांड में उनके भक्त आज भी विद्यमान है जिनकी आस्था क्रष्णवाद पर टिकी हुई है .

Friday, 7 June 2019

आत्मकथा : लालू प्रसाद यादव

1990 में बिहार में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अगले दिन से ही मैंने हेलीकॉप्टर से राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा शुरू कर दिया। मैं बहुत गरीब वर्ग से आया था और इस तबके से जुड़ना अच्छा लगता था। तकरीबन रोज मैं पटना से उड़ान भरता और हेलीकॉप्टर को चरवाहों, ताड़ी इकट्ठा करने वालों, मैला ढोने वालों, खेतिहर मजदूरों, मछुआरों और सुअर तथा मुर्गी पालने वालों के बीच उतारने को कहता था। उस समय इन लोगों के चेहरों पर जो चमक होती थी, उसे कभी नहीं भूला जा सकता। ऐसे मौकों पर मैं तुरंत उन्हें कुछ इस अंदाज में संबोधित करता- ‘ऐ गाय चराने वालों, ऐ बकरी चराने वालों, ऐ कपड़ा धोने वालों, ऐ सुअर पालने वालों, ऐ मैला ढोने वालों, ऐ बोझा ढोने वालों- पढ़ना-लिखना सीखो।’ मैंने ऐसी बूढ़ी औरतों को गले लगाने से गुरेज नहीं किया, जिनके कपड़े तार-तार थे, जिनकी आंखों में कीचड़ था। उनकी चिपचिपी आंखों को साफ कर मैंने उनसे कहा, मैं आपका बेटा हूं और आप मेरी मां हैं। मैं मुख्यमंत्री बन गया हूं। अब आपकी सेवा करूंगा। जब मैंने ऐसी औरतों को अपनी बांहों में लिया, तो वे रोने लगीं। ये खुशी के आंसू थे। मैंने शायद ही कभी पटना में दोपहर का भोजन किया। बिना किसी सुरक्षा कवच के मैं अक्सर गरीब खेतिहरों के बीच पहुंच जाता और उनसे सतुआ, नजदीक के तालाब से मछली और अनाज लाने के लिए कहता। गांव में यह मजेदार दावत होती। गरीब किसान आग जलाकर भात और मछली पकाते थे और हम सब मिलकर खाते थे। मैं प्रायः सोरठी-बिरिजाभार, चैता, बिरहा और होली गाने वाले लोक गायकों और संगीतकारों को तलाशता और झांझ और ढोलक के साथ उनकी संगत करता। जब तक मैं गांव में रहता, वहां जश्न का माहौल बन जाता। मैं उनमें घुलमिल जाता और उन्हें उखड़े हुए नाखून दिखाता। मैं उन्हें बताता कि मैं भी कभी गाय और भैंस चराता था।






























नई दिल्ली में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनने के कुछ महीने के भीतर ही सत्ता के दो केंद्र बन गए थे। प्रधानमंत्री वीपी सिंह और उप प्रधानमंत्री देवीलाल। इन दोनों नेताओं ने 1989 में राजीव गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार को बेदखल करने के लिए एकजुट होकर काम किया था, लेकिन अब एक-दूसरे को लेकर असहज हो गए थे। कुछ स्वार्थी तत्वों ने देवीलाल को वीपी सिंह के खिलाफ भड़काया, मानो वे राजीव गांधी की सत्ता के खिलाफ संघर्ष करने वाले साथी न होकर एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हों। मुझे चिंता होने लगी कि वीपी सिंह और देवीलाल के बीच बढ़ते तनाव से राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार गिर सकती है और इसका असर बिहार में मेरी सरकार पर भी पड़ सकता है। मैंने जनता पार्टी की सरकार को अंदरूनी झगड़े के कारण गिरते देखा था और नहीं चाहता था कि जनता दल का भी ऐसा हश्र हो। अगस्त, 1990 में वीपी सिंह की सरकार को बचाने के लिए मैंने एक फॉर्म्युला ईजाद किया। मैंने किसी भी केंद्रीय मंत्री को जरा-सी भी भनक न लगने देकर प्रधानमंत्री से मिलने के लिए समय मांगा और वह इसके लिए सहज तैयार हो गए। औपचारिकताओं के बाद मैंने उनसे दो टूक कहा, ‘आपको देवीलाल के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, वरना सरकार गिर जाएगी।’ वीपी सिंह अवाक रह गए। पहली बात, उन्होंने दूर-दूर तक भी कल्पना नहीं की थी कि मैं ऐसा कर सकता हूं। इसके अलावा वह जानते थे कि मैं देवीलाल कैंप का आदमी हूं, लिहाजा मेरी टिप्पणी से उन्हें धक्का लगा। उनका हैरत में पड़ना बहुत स्वाभाविक था कि आखिर मैं क्यों देवीलाल के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कह रहा हूं, जो कि मेरे हितैषी थे। मगर इसके साथ ही वह खुश हुए होंगे कि देवीलाल का एक कट्टर समर्थक उनके खेमे में आ रहा है।

वीपी सिंह तेज दिमाग और अच्छी राजनीतिक सूझबूझ वाले व्यक्ति थे। उन्होंने जवाब दिया, ‘देवीलाल जी जाटों और पिछड़ों के नेता हैं। यदि मैंने उनके खिलाफ कार्रवाई की तो वह देश भर में घूम सकते हैं और प्रचार कर सकते हैं कि मैं पिछड़ा विरोधी और गरीब विरोधी हूं।’ बेशक वह सही थे। लेकिन मैं भी पूरी तरह से तैयार था। मैंने कहा, ‘इसका भी एक रास्ता है। मंडल आयोग ने 1983 में अपनी रिपोर्ट दी थी, जिसमें उसने सरकारी नौकरियों में पिछड़ा वर्गों को 27 फीसदी आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की थी। उसकी सिफारिश आपके दफ्तर में धूल खा रही है। उसे तत्काल प्रभाव से लागू कीजिए।’ मेरा पक्का भरोसा था कि यदि ऐसा कर दिया गया तो यह कदम देवीलाल की ओर से वीपी सिंह को पिछड़ा विरोधी बताने के लिए किए जाने वाले किसी भी प्रचार को बेअसर कर देगा। प्रधानमंत्री इसके खिलाफ थे। संभवत: उनको भय था कि इसके फलस्वरूप समाज में बड़े पैमाने पर अशांति फैल सकती है। मैंने जोर देकर कहा कि मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने से उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत होगी और देवीलाल के खिलाफ उन्हें ताकत मिलेगी। मैंने वीपी सिंह से आग्रह किया कि वह बिना देर किए मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करें। आखिरकार वीपी सिंह सहमत लगे। इसके साथ ही मैंने कहा कि वह पहले मंत्रिमंडल की बैठक बुलाएं और बिना और सोचे रिपोर्ट को लागू करें। शरद यादव और राम विलास पासवान जैसे वरिष्ठ नेताओं को प्रधानमंत्री के साथ मेरी मुलाकात के बारे में पता नहीं था। इसके बाद मैंने उन्हें भरोसे में लिया और हैरत में पड़े इन नेताओं को बताया कि वीपी सिंह मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के लिए सहमत हो गए हैं। मेरे रवाना होने के बाद वीपी सिंह ने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई और तय किया गया कि रिपोर्ट लागू की जाएगी। वीपी सिंह ने एक विशेष संदेशवाहक के जरिए मेरे पास अधिसूचना की एक प्रति भिजवाई। मैंने उसे अपने ब्रीफकेस में रखा और पटना के लिए रवाना हो गया।

(लेखक: लालू यादव, पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार)
(साभार: लालू यादव की पुस्तक- ‘गोपालगंज से रायसीना)’























Friday, 24 May 2019

लोकसभा चुनाव परिणाम : कौन जीता कौन हारा





सत्रहवी लोकसभा चुनाव के चौकाने वाले परिणाम आ चुके है . ये चुनाव परिणाम इतने विचित्र है कि सम्भवतः सत्ता और विपछ दोनों को ही ऐसे परिणामो की उम्मीद बिलकुल नही रही होगी . यह चुनाव परिणाम लगभग एकतरफा है जिनका झुकाव पूरी तरह से सत्ता पछ की तरफ है . सीटो के लिहाज से देश के लोकतंत्र में आज के जैसा कमजोर विपछ शायद कभी नहीं रहा होगा . बेहद महत्वपूर्ण बात यह भी है कि देश के लोकतंत्र में सत्ता पछ के साथ -साथ विपछ की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है अन्यथा सत्ता की निरंकुशता देश के लोकतंत्र का ही विनाश कर डालेगी . दुनिया के तमाम देशो में जहा कही भी अलोकतांत्रिक तानाशाही व्यवस्था ने राज किया है ,वहा सबसे पहले उसने विपछ को कमजोर किया है या फिर उसे पूरी तरह से समाप्त ही कर दिया है . सही मायनों में सत्ता और एक मजबूत विपछ दोनों ही किसी स्वस्थ लोकतंत्र की असली पहचान होते है . इसलिए एक जनप्रिय सरकार चुनने के साथ -साथ देश की जनता को एक मजबूत विपछ की भूमिका का भी सदैव ख्याल रखना चाहिए . आज भारत का लोकतंत्र दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र है . इसलिए यहाँ जब कभी आम चुनाव होते है तो पूरी दुनिया की नजर बनी रहती है और पूरी दुनिया के लोकतंत्रिक देशो में लोकतंत्र के प्रति एक अच्छा सकारात्मक संदेश देना हमारी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है 


लोकसभा चुनाव परिणामो से पूर्व मोदी सरकार के कई विवादास्पद फैसलो और जनता के बीच उसकी हिंसक छवि के कारण नरेंद्र मोदी जी के दुबारा प्रधानमन्त्री बनने की काफी कम सम्भावनाये बन रही थी . यहाँ तक कि उनकी पार्टी समेत समस्त विपछ भी नए प्रधानमन्त्री को चुनने की बात अक्सर कहता रहा था . किन्तु कड़े प्रतिरोधो के बावजूद भी नरेंद्र मोदी अपने दम पर दुबारा प्रधानमन्त्री की कुर्सी तक पहुचने में कामयाब रहे है और यह हैरतंगेज सफलता उनके और पार्टी के लिहाज से काफी अविस्मरणीय रहेगी . किन्तु उनकी पार्टी की इस एकतरफा जीत से देश के लोकतंत्र पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा , या इस जीत के क्या दूरगामी परिणाम होंगे ,इन मुद्दों पर भी बहस प्रारम्भ हो गयी है . वही संगठित विपछ के प्रयासों में आखिर कहा कमी रह गयी जो उसे देश की जनता ने इतनी बुरी तरह से नकार दिया है , ये सवाल भी अब पूछे जा रहे है . 



मोदी सरकार की कार्यशैली 

नरेंद्र मोदी गुजरात के 2002 के दंगो से अचानक चर्चा में आये थे जिसके बाद उन्हें कट्टर हिन्दू वादी भाजपा नेता के रूप में जाना गया . मुख्यमंत्री रहते हुए दंगो में उनकी कथित संलिप्तता से वह काफी विवादों में रहे . साल 2014 के लोकसभा चुनाव आते -आते वह राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ के सहयोग से भाजपा की तरफ से प्रधानमन्त्री के सबसे बड़े दावेदार हो गये . अपनी कट्टर हिंदुत्व की छवि के कारण उन्होंने देश के हिन्दू जनमानस का विश्वास जीत लिया . तब दुनिया भर में चल रहा मुस्लिम आतंकवाद और देश के सेक्युलर नेताओ का ढुलमुल रवैया नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में चार चाँद लगा गया . अपने पूर्व प्रचारक को आगे बढाने में संघ ने अप्रत्यछ रुप से पर्दे के पीछे रह कर भरपूर सहयोग किया . उनकी पार्टी ने दिल्ली की कुर्सी तक पहुचने के लिए अनेक बड़े -बड़े लोक- लुभावन वादे जनता से किये . अनेक संस्थाओ ने दिन- रात प्रचार कर नरेंद्र मोदी को प्रधानमन्त्री पद का दावेदार साबित कर दिया . इस प्रकार पुरे देश में एक मोदी लहर बन गयी और लोक सभा चुनाव के बाद मोदी देश के प्रधानमन्त्री भी बन गये . अपनी सरकार बनने के बाद उन्होंने सर्वप्रथम विदेश नीति पर ध्यान दिया और विदेश यात्राओ का सिलसिला शुरू किया . विदेशो से सम्बन्ध बनाने के चक्कर में वह लगे रहे और देश के भीतर की समस्याओ पर अपेछ्कृत कम ध्यान दिए . आलोचना होने पर उन्होंने स्वच्छ भारत जैसे बड़े कामो की शुरुआत की . 15 लाख देने के अपने वादे को जुमला बता कर बैंको में खाता खुलवाने का कार्य भी शुरू हुआ लेकिन तभी अचानक नोट बंदी का अदूरदर्शी फैसला बिना किसी तैयारी के ले लिया गया . जिससे जनता में गहरा असंतोष व्याप्त हो गया . इसके बाद मोब लिंचिंग , सीमा पर आतंकवाद , GST , बैंको का विलय , रेल दुर्घटनाए . रेल स्टेशनों का निजीकरण , लालकिले समेत कुछ ऐतिहासिक इमारतों को ठेके पर देना , बेरोजगारी , महंगाई , मिडिया पर अंकुश ,सर्जिकल स्ट्राइक , जम्मू -काश्मीर में बढ़ता आतंकवाद , कोर्पोरेट हस्तियों का देश के बैंको को चुना लगाना , अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण न होना , कश्मीर में पंडितो की घर वापसी न होना , राफेल विवाद आदि तमाम मुद्दों के कारण मोदी सरकार आलोचनाओं के केंद्र में आ गयी . लोकतंत्र की परिभाषा में ये सभी मुद्दे जनविरोधी साबित हुए और इससे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता दिनों दिन काफी कम होती गयी . उनकी पार्टी और मात् सन्गठन संघ द्वारा भी करवाए गये तमाम सर्वे से यह बाते मिडिया में लीक हुई थी. किन्तु इसके बावजूद प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी और उनके भरोसेमंद पार्टी अध्यछ अमित शाह 2019 में पुनह अपनी सरकार बनाने के लिए जी -जान से लगे रहे . वास्तव में अपने कार्यकाल में उनकी पार्टी और सरकार देश भर में अपनी पार्टी की सरकार ही बनाने पर केन्द्रित रहे . उनकी सत्ता के प्रति इसी लोलुपता को देखते हुए विपछ को चुनावों में ख़ास तौर पर EVM में हेर -फेर का अंदेशा हो गया जिससे समस्त विपछ ने लोकसभा चुनाव बैलेट पेपर से करवाने की मांग की किन्तु इसे चुनाव आयोग द्वारा खारिज कर दिया गया . इसे सत्ता का दुरुपयोग ही कहना चाहिए कि मोदी सरकार के कार्यकाल में अनेक संवैधानिक संस्थाओ के साथ -साथ चुनाव आयोग की निष्पछ छवि भी धूमिल हुई . 


विपछ की रणनीति 
नरेंद्र मोदी के नेत्रत्व में सत्ता चला रहे NDA के खिलाफ अधिकांश विपछी दल UPA के साथ खड़े होने लगे थे . कुछ छेत्रीय दल अपने -अपने प्रभाव वाले राज्यों में कांग्रेस के साथ गठ्बन्धन कर लोकसभा चुनाव को तैयार हुए . जिसमे उत्तर प्रदेश में सपा -बसपा और बिहार में राजद -कांग्रेस के गठ्बन्धन काफी महत्वपूर्ण थे . सपा से अखिलेश यादव और बसपा से मायावती ने अपने -अपने परम्परागत दलित और पिछड़े वोटबैंक को एकजुट कर सामूहिक चुनौती दी तो बिहार में तेजस्वी यादव ने अपने पिता लालू यादव की विरासत को मजबूत किया . सही मायने में यह चुनाव हिंदुत्व बनाम सेक्युलर विचारधारा की लड़ाई भी थी . एक तरफ अहिंसा और सत्य के मसीहा महात्मा गांधी की विचारधारा थी तो दूसरी तरफ गोडसे को पूजने वाले तथाकथित राष्ट्रवादी विचारधारा थी . इसी दौरान जेल में बंद लालू यादव को चुनाव के दौरान भी जमानत नही दी गयी . इसलिए कई मायनों में लालू यादव को 1975 का आपातकाल का दौर पुनह याद आ गया होगा . लेकिन सम्भवतः लालू के जेल में रहने से कुछ अन्य छेत्रीय दल के नेता भी भाजपा के दबाव में आ गये और उसके खिलाफ आक्रामक चुनाव प्रचार बिलकुल नही कर पाए . यह बात भाजपा के लिए काफी फायदेमंद साबित हुई . हालांकि प् बंगाल में ममता बनर्जी बिलकुल भी केंद्र के दबाव में नही आई और उनका टकराव वोट डालने तक जारी ही रहा .दछिन के कई नेताओ ने तीसरे मोर्चे को जिंदा करने का प्रयत्न भी किया किन्तु विपछ के ज्यादातर नेता चुनाव परिणामो के बाद ही किसी गठ्बन्धन के फैसले पर पहुचना चाहते थे . इसके पीछे सम्भवतः उनकी कुछ महात्वाकान्छाये भी रही होंगी . लेकिन सही मायने में विपछ ने चुनाव पूर्व ही हथियार डाल दिए थे . ऐसा नही था कि जनता मोदी सरकार के खिलाफ आक्रोश में नही थी किन्तु समस्त विपछ सत्ता के खिलाफ आक्रामक ही नही दिखा और न ही उसने सत्ता को कभी उसके किसी जनविरोधी फैसले पर घेरने की कोशिश की . जबकि किसानो की आत्महत्या और कर्जमाफी समेत अनेक गरमा -गर्म मुद्दे ऐसे थे जिन पर पुरे देश में आपातकाल जैसा आन्दोलन भी खड़ा हो सकता था .




विचार मंच 



चुनावी प्रक्रिया
सात चरणों का यह लोकसभा चुनाव काफी लम्बा खिचने वाला चुनाव था . EVM के स्थान पर बैलेट पेपर से चुनाव की विपछ की मांग पर VVPAT का झुनझुना पकड़ा दिया गया . चुनाव के दौरान EVM मशीनों में कमल यानी भाजपा को ही वोट देने के सैकड़ो मामले पाए गये जिससे चुनाव प्रक्रिया सैकड़ो जगह बाधित हुई और आयोग की निष्पछता भी संदिग्ध हो गयी. चुनावी आचार संहिता के मध्य सत्ता पछ द्वारा उसका अनेक क्रिया-कलापों द्वारा बारम्बार विखंडन किया गया . इसके बावजूद चुनाव आयोग सत्ता के दबाव में ही नजर आया . वही एक चुनाव आयुक्त द्वारा आयोग में ही अपनी बात न सुने जाने का आरोप भी लगाया गया जिससे चुनाव आयोग से जनता और विपछ का विशवास भी कम हो गया . जनता को निष्पछ चुनाव के बजाय उस पर सरकारी मशीनरी का भेदभाव नजर आया जिसका सीधा असर मतदान का प्रतिशत पर पड़ा और वह कम हो गया . मतदान कम होने का नुक्सान विपछ को उठाना पड़ता है क्योकि अक्सर यह माना जाता है कि ज्यादा मतदान तभी होता है जब सत्ता के परिवर्तन हेतु जनादेश होता है .


चुनाव परिणाम
चुनाव परिणाम से पूर्व एक्जिट पोल जब मीडिया में आये तो उसमे भाजपा को अभूतपूर्व सफलता दिखाई गयी . लगभग सभी मीडीया चैनेलो ने भाजपा के नेत्रत्व वाले गठ्बन्धन को 350 सीटो के आस -पास दिखाया . विपछ के साथ -साथ 5 साल से आक्रोशित जनता को ये एक्जिट पोल बिलकुल हजम नही हुए , उन्होंने इसे मीडिया पर सत्ता पछ का दबाव बताया . दरअसल विपछ को सत्ता के प्रति जनता में व्याप्त असंतोष पर काफी यकीन था . उसे यह भरोसा था कि नोट बंदी और बेरोजगारी से जूझ रही देश की जनता उनके पछ में वोटिंग जरुर करेगी . विपछ को जनता से यह पूरी उम्मीद थी कि वह जुमलो की बाते करने वाले लोगो को सबक जरुर सिखाएगी . किन्तु 23 मई के रुझान आते ही विपछ की यह गलतफहमी दूर हो गयी . चुनाव के परिणाम ठीक वैसे ही थे जैसे मिडिया के चैनेलो ने एक्जिट पोल में दिखाया था . ऐसे चुनाव परिणामो से पूरा विपछ ही नहीं देश की करोड़ो जनता भी अवाक रह गयी .चुनाव परिणामो में शायद पहली बार ऐसा हुआ कि बिहार में लालू यादव जी की राजद और काश्मीर में महबूबा की पार्टी पी ड़ी पी को एक भी सीट नहीं प्राप्त हुई .  आखिर ऐसा क्या हुआ जो देश की जनता ने पुनह नरेंद्र मोदी के पछ में प्रचंड जनादेश कर दिया . क्या उसके जुमले वाले अच्छे दिन आ गये थे ?  नही बिलकुल नही . फिर ?


जनादेश समीछा
दरअसल जनादेश को समझने से पहले देश की जनता का मूड समझना काफी आवश्यक है . क्या देश की जनता सेक्युलर राजनीति से ऊब चुकी है लेकिन ऐसा तो बिलकुल नही था . इस देश की 'संस्क्रती और सभ्यता' में 'भिन्नता में एकता' का संदेश है . यहाँ के अनेक महापुरुषों ने तो 'वसुधैव कुटुम्बकम' की बात भी कही है . किन्तु वैश्विक आतंकवाद के बढ़ते हुए कदमो ने आज यहाँ भी धर्म पर आधारित विचारधाराओ को पुनर्जीवित कर दिया है . आज सभी धर्मो के ठेकेदार एक -दुसरे से खतरा बता रहे है . हालांकि भारत में हिन्दू और मुस्लिम के बीच का टकराव आजादी के समय से ही होता रहा है . इसी टकराव से देश का विभाजन तक हो चूका है और पाकिस्तान का जन्म हुआ था . दरअसल आजादी के बाद खासतौर से राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की हत्या के बाद से देश भर में मुख्य रूप से दो विचारधाराए चल रही है . एक महात्मा गांधी के विचारों के समर्थन में तो दूसरी उसके विरोध में . जब तक गांधी के सिद्धांत इस देश के कुछेक नेताओ में मौजूद रहे देश में धर्म निर्पेछ्ता और संविधान का राज चलता रहा . देश के लोकतंत्र को कोई खतरा नही रहा . किन्तु गांधी विरोधी मानसिकता (गोडसे ) इसके विपरीत चलती है . संघ और गोडसे से जुड़े सन्गठन धर्म (हिंदुत्व ) को केंद्र में रखकर ही आगे बढ़ते है .उन्हें भारत को हिन्दू राष्ट्र बना कर ही रहना है .लेकिन इस हिन्दू राष्ट्र बनने के बाद में बाकी धर्मो के लोग और उनके राज्य क्या प्रतिक्रिया देंगे, यह सोचा ही नहीं गया है . बमुश्किल खालिस्तान और उत्तर पूर्व के राज्यों में अलगाववाद की समस्या का हल हुआ है लेकिन काश्मीर का मुद्दा अभी भी एक बड़ी समस्या है . वास्तव में धार्मिक ध्रुवीकरण करना भाजपा की राजनीति का एक अहम हिस्सा है . धार्मिक ध्रुविकरन होते ही ज्यादातर हिन्दू एक हो जाता है जिसका लाभ मतदान में लिया जाता है . धार्मिक ध्रुवीकरण का दूसरा पहलु यह भी है कि इसके आगे देश की अन्य समस्याए भी एकदम गौण हो जाती है . जनता को बेरोजगारी, आतंकवाद, महंगाई जैसे मुद्दों से कोई सारोकार नही रह जाता है . राष्ट्रवाद के नाम पर जिन लोगो को भडकाया जाता है उन्हें देशभक्ति और राष्ट्रवाद में अंतर भी नहीं मालुम होता है . कुछ इसी प्रकार धर्म की ही तरह जाती का खेल भी यहां खूब चलता है . देश के सांस्क्रतिक जीवन मे मनुवादी विचारधारा का इतना अधिक बोलबाला है कि संविधान को बीच -बचाव में आना पड़ता है . जबकि देश का बाकी काम -काज सामान्य पिछड़ी दलित आदिवासी आदि जातियों में बंट कर ही सम्पन्न होता है .

हार -जीत
यह बड़ी मशहूर सी बात है कि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है . इसलिए यहाँ की 80 सीटो में अपना परचम लहराने वाला ही देश के लोकतंत्र को चलाता है . उत्तर प्रदेश में सपा -बसपा गठ्बन्धन को मात्र 5 और 10 सीटे प्राप्त हुई है जबकि उम्मीद यह थी कि इन्हें 55 - 60 सीटे मिलेंगी . लेकिन ऐसा नही हुआ . बड़ी अजीब बात है कि जिस गठ्बन्धन से उपचुनाव में उन्हें जीत मिली उसी गठ्बन्धन से उन्हें लोकसभा में एक बड़ी हार भी मिली . हालांकि अबकी बार कांग्रेस उनके साथ नही थी किन्तु कांग्रेस का कोई बड़ा जनाधार भी तो नही था . दरअसल सपा पिछले कई सालो से अपने अंदर की लड़ाई लड़ रही है . पार्टी ने राज्य में सत्ता में आने पर समाजवादी नायक डा राम मनोहर लोहिया के सिद्धांतो पर चलकर अनेक लोकप्रिय योजनाओं से जन कल्याण के कार्य भी किये है किन्तु फिर भी उसका प्रमुख वोटबैंक यादव ,मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग ही मुख्य तौर पर है . पिछडो में यादवो के राजनीति में उभरने से बाकी पिछडो में भी राजनैतिक जागरूकता हुई और एक प्रतिस्पर्धा का जन्म हुआ . जो कि डा राम मनोहर लोहिया का महत्वपूर्ण स्वप्न था . अब थोड़े खाते -पीते पिछड़े लोग भी मुलायम सिंह यादव ,कल्याण सिंह या काशीराम के पदचिन्हों पर चलने को तैयार हुए . उनकी देखा -देखि उनके समुदाय के छोटे -मोटे लोगो ने भी की . लेकिन इसका दुखद पहलु यह भी रहा कि ये लोग मंडल कमिशन (आरछ्न ) का लाभ लेने के बजाय नेताओ के पीछे जिन्दाबाद -जिंदाबाद करने तक ही सीमित रह गये . लेकिन पिछड़े और दलित वर्ग की इस राजनीति ने बड़ी पार्टियों को कई सालो तक देश की मुख्य राजनैतिक धारा से काफी दूर कर दिया . अब बहुमत के बजाय गठ्बन्धन की परम्परा का जन्म हुआ . जिसके कारण उन्हें भी पिछडो को अपनी पार्टियों में लेना पड़ा . लेकिन ये पिछड़ा वर्ग भिन्न -भिन्न पार्टियों में जाकर अपने व्यक्तिगत लाभों को ध्यान में रखकर सामुदायिक विकास से पूरा दूर हो गया . इस प्रकार पिछडो और दलितों के वोट बैंको का बिखराव हो गया . वही दलितों में एक बात विशेष रूप से यह देखने को मिली कि उनका झुकाव संघ की मनुवादी विचारधारा की तरफ भी काफी ज्यादा हो गया . सम्भवतः ये लोग ऐसा संघ के गांधी विरोधी होने की मानसिकता के कारण वहा अपनी वैचारिक समानता  देखते होंगे क्यों कि आज भी देश का एक बड़ा दलित वर्ग डा अम्बेडकर के खिलाफ महात्मा गाँधी के पूना पैक्ट का हवाला देकर उनसे नफरत रखता है . इधर आज की कांग्रेस , सपा और बसपा जैसी कई पार्टियों में जनता से जमीनी सम्पर्क का अभाव दिखता है . उनके पास मीडिया और सोशल मिडिया में अपने खिलाफ होने वाले दुष्प्रचार को रोकने का भी कोई माध्यम मौजूद नही है . इस लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की पार्टी की बड़ी जीत हुई है और समस्त विपछ के लिए वह अजेय से बन चुके है हालांकि उनकी इस जीत में अनेक लोकतान्त्रिक मूल्यों की हार भी हुई है . सही मायनों में देश में अब लोकतंत्र के चुनाव ने एक ऐसे युद्ध का रूप धारण कर लिया है जहा जीत के लिए सब कुछ जायज है .



विचार मंच 

Saturday, 18 May 2019

23 मई : लोकसभा चुनाव परिणाम और नया प्रधानमन्त्री






















भारत में सत्रहवी लोकसभा चुनाव कार्यक्रम 7 चरणों के अंतर्गत 11 अप्रैल , 18 अप्रैल, 23 अप्रैल, 29 अप्रैल, 6 मई, 12 मई और 19 मई को लगभग सम्पन्न होने वाले है . यह मतदान प्रक्रिया सम्पन्न होते ही सभी देशवासियों और राजनैतिक दलों को 23 मई 2019 की मतगणना हेतु  चुनाव के परिणाम का बेसब्री से इंतज़ार होना प्रारम्भ हो जाएगा . तमाम राजनैतिक दलों के समर्थको में अपनी -अपनी पार्टी की जीत के प्रति भारी उत्साह भरा हुआ है . दरअसल भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है इसलिए यहाँ की लोकतान्त्रिक चुनावी प्रक्रिया पूरी दुनिया के लिए एक मिशाल सी है . लोकतंत्र का शब्दिक अर्थ - जनता का शासन है . मशहूर अमेरिकी राष्ट्रपति और अमेरिका में भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करने वाले अब्राहम लिंकन के अनुसार भी लोकतंत्र , जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है. इसलिए बड़ी जाहिर सी बात है कि लोकतंत्र में जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए अपनी सरकार स्वयम चुनती है और हकीकत में किसी भी देश की सम्पन्नता और खुशहाली इस बात पर निर्भर करती है कि वहा का लोकतंत्र कितना स्वस्थ है . 



भारत में लोकतांत्रिक चुनाव प्रत्येक 5 साल के अन्तराल में सम्पन्न होते है . अर्थात जनता अपने मताधिकार से किसी दल या समूह को 5 साल देश में शासन करने के लिए ही अवसर देती है . एक कार्यकाल पूर्ण होने के बाद पुनह चुनाव होने पर वह अपने विवेकानुसार उस वक्त मौजूद सबसे बेहतर विकल्प (राजनैतिक दल ) पर विचार कर मतदान करती है . इस प्रक्रिया में बहुमत प्राप्त करने वाले राजनैतिक दल के प्रतिनिधि देश पर संवैधानिक रूप से शासन करते है . सत्ता पर बैठने वाले राजनैतिक दल पूरी कोशिश करते है कि वह अपने बेहतर कार्यक्रमों और जन कल्याण की नीतियों से जनता को सदैव प्रसन्न रखे ताकि उन्हें पुनह 5 साल बाद जनता से विशवास मत प्राप्त हो सके .हालांकि सत्ता मिलने के बाद अक्सर विभिन्न दलों में अहंकार और उनके प्रति जनता में असंतोष व्याप्त होते हुए देखा गया है . वही सत्ता और विपछ में मौजूद राजनैतिक दलों के बीच विरोधाभास होना एक आम बात है . इसे सत्ता के लिए इन दलों के बीच पारस्परिक प्रतिस्पर्धा भी कहा जा सकता है .वास्तव में प्रत्येक 5 साल के कार्यकाल के बाद जनता को दुसरे बेहतर विकल्पों पर गौर करना चाहिए जिससे पूर्व में सत्तासीन सरकारों के संदिग्ध कार्यो की जांच भी की जा सके . क्यों कि सत्ता की निरंकुशता दलों को भ्रष्टाचारी और तानाशाही भी बना देती है इसीलिए प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी , प्रखर समाजवादी चिंतक और देश में मौजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ पहली बार आवाज उठाने वाले डा राममनोहर लोहिया जी ने कहा था ,कि सच्चे लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीवनशक्ति सरकारों के उलट-पलट में बसती है. उनके अनुसार तवे पर जैसे रोटी को उलट -पलट कर सेंका जाता है और पकाया जाता है ठीक इसी तरह राजनैतिक दलों को भी लोकतंत्र में उलटते -पलटते रहना चाहिए ,तभी सच्चा लोकतंत्र स्थापित हो सकेगा . 



अगर देखा जाए तो आजादी के बाद से अब तक के सफर में देश के लोकतान्त्रिक चुनावों का इतिहास काफी मिला -जुला रहा है . हालांकि देश का चुनाव आयोग निष्पछता से चुनाव सम्पन्न करवाता रहा है किन्तु फिर भी कई स्थानों में स्थानीय स्तर पर जनता को लोभ देकर मतदान करवाने के भी अक्सर प्रयास होते आये है . भारतीय संविधान के भाग 15 में अनुच्छेद 324 से अनुच्छेद 329 तक चुनाव यानी निर्वाचन की व्याख्या की गई है. अनुच्छेद 324 निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित होना बताता है. संविधान ने अनुच्छेद 324 में ही निर्वाचन आयोग को चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी दी है. साल 1989 तक निर्वाचन आयोग केवल 1 सदस्यीय संगठन होता था किन्तु 16 अक्टूबर 1989 को राष्ट्रपति अधिसूचना के द्वारा 2 और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति कर दी गयी है . समय के साथ चलते हुए आज देश में बैलेट पेपर के बजाय EVM से चुनाव हो रहे है , किन्तु यह नयी तकनीक विवादों के केंद्र में भी खूब है . EVM को हैक कर मतदान प्रभावित करने के कई समाचार सुनने में आते रहे है. जबकि निर्वाचन आयोग निरंतर इसका खंडन ही करता रहा है . किन्तु हाल में कई मौको पर किसी दल के प्रत्यासी को वोट डालने पर कमल (भाजपा ) की ही पर्ची निकलने पर चुनाव आयोग की निष्पछता पर संदेह गहरा हो गया है . इसीलिए तमाम विपछी दलों ने EVM के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव करवाने की मांग अनेको बार की है . इसके बावजूद भी आयोग ने VVPAT मशीनों की बात कह कर EVM से ही चुनाव करवा दिए है . इधर समस्त चुनावी प्रक्रिया के दौरान EVM भी देश की जनता के मध्य काफी अविश्वसनीय हो गया है . जिससे चुनाव आयोग की निष्पछता पर आंच पडती नजर आ रही है .

देश में 543 लोकसभा सीटो का चुनाव हो रहा है, हालांकि लोकसभा सीटों की कुल संख्या 545 है. दरअसल अगर राष्ट्रपति को लगता है कि एंग्लो-इंडियन समुदाय के लोगों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व काफ़ी नहीं है तो वह 2 लोगों को नामांकित कर सकता है. वही कुल लोकसभा सीटों में से 131 लोकसभा सीटें रिज़र्व हैं जिसमे अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें रिज़र्व हैं. यानी इन रिजर्व सीटों पर कोई अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं. देश में सरकार बनाने हेतु लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत के लिए कम से कम 272 सीटें आवश्यक है . 



अब सत्रहवी लोकसभा के चुनाव परिणाम की बात की जाए तो पहले सभी राज्यों में कितनी -कितनी सीटे उपलब्ध है , इसे समझ लिया जाए . उत्तर प्रदेश -80 . राजस्थान -25 ,मध्य प्रदेश -29 , छत्तीसगढ़ -11 , बिहार -40 ,झारखंड -14 , जम्मू -काश्मीर -6 , महाराष्ट्र -48 ,पश्चिम बंगाल -42 ,तमिलनाडू -39 , केरल - 20 , कर्नाटक -28 , उडीसा -21 ,असम -14, त्रिपुरा -2 , मणिपुर -2 , पंजाब -13 , हरियाणा -10 , हिमाचल -4 , उत्तराखंड -5 , दिल्ली -7 ,गुजरात -26 , तेलंगाना -17, गोवा -2 ,मेघालय -2 ,मणिपुर -2 ,मिजोरम -1 , नागालैंड -1 , अरुणाचल प्रदेश -2 .आंध्र प्रदेश -25 .

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा 31 % मत पाकर 282 सीटो पर और कांग्रेस 19.3 % मत पाकर 44 सीटो पर विजयी हुई थी . वही TMC (ममता बनर्जी ) को 3.8 % मतों से 34 सीटो पर और ADMK (स्व जयललिता ) को 3.3 % मतों से 37 सीटो पर विजय मिली थी . इस प्रकार विगत चुनाव में भाजपा ने अपने दम पर ही बहुमत प्राप्त कर लिया किन्तु अनेक सहयोगी दलों के साथ मिल कर गठ्बन्धन की सरकार बनाई . इस सरकार के मुखिया गुजरात से अपनी कट्टर हिन्दू की छवि रखने वाले नरेंद्र मोदी जी बने . सरकार बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने सर्वप्रथम विदेश नीति पर ध्यान दिया और स्वयं विदेश भ्रमण पर निकल गये . इधर उनके सिपाहसलार अमित शाह पुरे देश में भाजपा की राज्य सरकार बनाने की मंशा में जुट गये . नरेंद्र मोदी जी की सरकार में मंत्रालयों का कार्य भार तो बंटा लेकिन सर्वेसर्वा नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही बने रहे .हालांकि नरेंद्र मोदी विदेश भ्रमण के साथ -साथ स्वच्छ भारत , गंगा की सफाई , शौचालयों के निर्माण आदि पर भी काफी जोर देते रहे . लेकिन उनके समर्थको ने इन योजनाओं को मीडिया में अपनी वाह वाही लुटने तक ही सीमित रखा . जिससे ये तमाम योजनाये भारी धन आवंटन के बावजूद भी अधर में लटक गयी . इसी के साथ -साथ प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी जी नोट बंदी का अदूरदर्शी फैसला ले बैठे . देश की जनता इससे उबरती कि तभी उन्होंने GST का नया चक्र रच दिया . इससे जनता में भारी असंतोष और छोभ पैदा हो गया . जनता की नजर में वह और उनकी सरकार नीचे उतर गयी . आये दिन हो रही रेल दुर्घटनाये , रेल किरायो में व्रद्धी , बढती हुई महंगाई और बेरोजगारी , कालेधन पर अंकुश लगाने में नाकामी , सीमापार का आतंकवाद और धार्मिक कट्टरता ने मोदी सरकार की छवि को विकृत कर दिया . हालांकि सरकार ने अपनी छवि को लोकप्रिय करने हेतु गुजरात माडल के आधार पर देश की मीडिया को काफी हद तक नियंत्रित किया किन्तु फिर भी उनके ख़ास समर्थको के अलावा देश के अधिकाँश जनमानस ने उन्हें नकार दिया . नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल में अपनी उपलब्धियों के बजाय कांग्रेस की खामिया ही गिनाते रहे . आर्थिक मुद्दों पर उनके करीबियों से भी मतभेद उत्पन्न हो गये. वही देश में लाखो -करोड़ो का घोटाला कर विदेश भाग जाने वालो के प्रति काफी उदार बने रहना जनता को चुभ गया .ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी का गुजरात माडल गुजरात में भले ही कारगर रहा हो लेकिन व्यापक रूप से देश भर में यह असफल हो गया है. लेकिन इन सबके बावजूद मोदी सरकार लोकसभा चुनावों में एक बार पुनह जीत कर सरकार बनाने की लालसा पाले हुए है . 



आज देश की राजनीति में लोकतंत्र और तानाशाही का मिला -जुला असर भी दिख रहा है . तमाम संवैधानिक संस्थाए दबाव में है . किसानो और जवानो के रूप में सत्ता से जनता की बड़ी नाराजगी है . अब तक के कई चरणों के मतदान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि नरेंद्र मोदी के नेत्रत्व में भाजपा अपने दम पर बहुमत बिलकुल नही प्राप्त कर सकेगी और सत्ता विरोधी लहर के कारण उसके गठ्बन्धन के सहयोगी भी मात खायेंगे .

हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा है . राहुल गाँधी में राजनैतिक परिपक्वता नजर आ रही है . वह मोदी सरकार की कमियों को पकड़ कर आक्रामक है और भाजपा बैकफुट पर रछात्म्क मुद्रा में नजर आती है . 3 राज्यों में सरकार बनाने के बाद राहुल गांधी काफी आत्मविश्वास में है . वही देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में सपा अध्यछ अखिलेश यादव का बसपा के साथ गठ्बन्धन का फार्मूला हिट हो चूका है . गठ्बन्धन के प्रयोग से उपचुनावों में मिली जीत से उत्साहित अखिलेश यादव ने बसपा से लोकसभा चुनावों में भी गठ्बन्धन कर डाला . वास्तव में यह फैसला काफी महत्वपूर्ण और निर्णायक है . सम्भवतः इस फैसले का असर देश को अगला प्रधानमन्त्री देने तक में रह सकता है . इसलिए यह काफी दूरदर्शी और महत्वपूर्ण घटनाक्रम है . अखिलेश यादव को इसका महत्वपूर्ण राजनैतिक लाभ विधान सभा चुनावों में भी मिल सकेगा . बिहार में भी भाजपा और नितीश की हालत राजद + कांग्रेस के आगे कमजोर ही है . पश्चिम बंगाल में भाजपा और TMC (ममता ) के बीच कांटे की लड़ाई है , परिणाम किसके पछ में रहेगा ,कहना मुश्किल है . महाराष्ट्र में अपनी सहयोगी शिवसेना से भाजपा को अवश्य काफी उम्मीदे होंगी .मध्यप्रदेश , राजस्थान ,गुजरात ,छत्तीसगढ़ अदि में कांग्रेस -भाजपा की लड़ाई करीब हो सकती है . दछिन के राज्यों से भाजपा को अधिक उम्मीदे नहीं रखनी चाहिए .हालांकि पूर्वोत्तर में उसे कुछ लाभ जरुर मिल सकता है . इस हिसाब में भाजपा को अकेले बहुमत मिलना असम्भव ही नजर आ रहा है . वही यह भी निश्चित है कि अगली सरकार किसी एक पार्टी की कदापि नहीं होगी , नई सरकार गठ्बन्धन की ही होगी . लेकिन किस गठ्बन्धन की ? यह समझना थोडा मुश्किल है . अनुमानों के अनुसार भाजपा 150 सीट और कांग्रेस 200 सीट तक प्राप्त कर पाएंगी . बाकी लगभग 200 सीटो पर छेत्रिय दलों का कब्जा रहेगा . जिसमे मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश , बिहार , प बंगाल , महाराष्ट्र , तमिलनाडू और कर्नाटक के छेत्रिय दल प्रमुख होंगे . इस आधार पर कांग्रेस और भाजपा के गठ्बन्धन के अलावा तमाम छेत्रीय दलों का एक तीसरा मोर्चा ममता बनर्जी या किसी अन्य नेता के नेत्रत्व में भी बन सकता है . इस लोकसभा चुनाव में जिन नेताओ को प्रधानमन्त्री की कुर्सी नसीब हो सकती है उनमे मायावती , ममता , राहुल गाँधी , राजनाथ सिंह , लालू यादव , शरद यादव आदि मुख्य है . जहा तक नरेंद्र मोदी जी के पुनह प्रधानमन्त्री बनने का सवाल है , यह तभी सम्भव है जब भाजपा अपने दम पर बहुमत प्राप्त कर सकेगी .