Friday, 31 July 2020

मुंशी प्रेमचन्द


प्रेम चंद



प्रेमचन्द आधुनिक हिन्दी कहानी के पितामह और उपन्यास सम्राट माने जाते हैं और उन्होंने हिंदी साहित्य में यथार्थवाद की शुरूआत की थी .

चूंकि प्रेमचंद मूल रूप से उर्दू के लेखक थे और उर्दू से हिंदी में आए थे, इसलिए उनके सभी आरंभिक उपन्‍यास मूल रूप से उर्दू में लिखे गए और बाद में उनका हिंदी में अनुवाद किया गया. उन्‍होंने 'सेवासदन' (1918) उपन्यास से हिंदी उपन्यास की दुनिया में प्रवेश किया था . यह मूल रूप से 'बाजारे-हुस्‍न' नाम से पहले उर्दू में लिखा गया था लेकिन इसका हिंदी रूप 'सेवासदन' पहले प्रकाशित कराया गया . 'सेवासदन' एक नारी के वेश्या बनने की कहानी है. 'सेवासदन' में व्यक्त मुख्य समस्या भारतीय नारी की पराधीनता है. इसके बाद किसान जीवन पर भी उनका पहला उपन्यास 'प्रेमाश्रम' (1921) आया. दरअसल प्रेमचंद के उपन्यासों का मूल कथ्‍य भारतीय ग्रामीण जीवन ही था.



प्रेमचन्द को प्रायः "मुंशी प्रेमचंद" के नाम से जाना जाता है. प्रेमचंद के नाम के साथ 'मुंशी' कब और कैसे जुड़ गया? इस विषय में अधिकांश लोग यही मान लेते हैं कि प्रारम्भ में प्रेमचंद अध्यापक रहे होंगे . अध्यापकों को प्राय: उस समय मुंशी जी कहा जाता था. इसके अतिरिक्त कायस्थों के नाम के पहले सम्मान स्वरूप 'मुंशी' शब्द लगाने की परम्परा रही है. संभवत: प्रेमचंद जी के नाम के साथ मुंशी शब्द जुड़कर रूढ़ हो गया. दरअसल प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे 'मुंशी' शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया. मुंशी शब्द सम्मान सूचक है, जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने कभी लगा दिया होगा. यह तथ्य अनुमान पर आधारित है. लेकिन प्रेमचंद के नाम के साथ मुंशी विशेषण जुड़ने का प्रामाणिक कारण यह है कि 'हंस' नामक पत्र प्रेमचंद एवं 'कन्हैयालाल मुंशी' के सह संपादन में निकलता था. जिसकी कुछ प्रतियों पर कन्हैयालाल मुंशी का पूरा नाम न छपकर मात्र 'मुंशी' छपा रहता था साथ ही प्रेमचंद का नाम इस प्रकार छपा होता था. 'हंस के संपादक प्रेमचंद तथा कन्हैयालाल मुंशी थे परन्तु कालांतर में पाठकों ने 'मुंशी' तथा 'प्रेमचंद' को एक समझ लिया और 'प्रेमचंद'- 'मुंशी प्रेमचंद' बन गए.

साहित्य सम्राट प्रेमचन्द के जन्मदिन पर आज साहित्य जगत में ख़ामोशी है . जो इस देश के सम्रद्ध साहित्य के दम तोड़ने का संकेत भी है .

Friday, 27 March 2020

कोरोना : भ्रान्तिया और अफवाह



कोरोना जैसी महामारी ने लगभग सारी दुनिया भर में ही व्यापक कहर ढा रखा है और भारत में भी अपने पैर पसार चुकी है . वैश्विक संकट के इस समय में संयम , समझदारी और वैज्ञानिक द्र्ष्टिकोंन की अत्यंत आवश्यकता है . किन्तु देश -विदेश में कुछ लोग पर्याप्त जानकारी के अभाव में या कुछ स्वार्थो के कारण ही जनता के बीच भ्रामक और गलत जानकारिया परोस रहे है . 

भारत में अभी हाल फिलहाल तक गाय के मूत्र और गोबर से कोरोना के इलाज की बाते कई मंत्री और नेता स्वयम कह रहे थे . जिसके कारण सोशल मिडिया में ये मामला काफी सुर्खियों में रहा था . ध्यान रखिये इंडियन वायरोलॉजिकल सोसाइटी के डॉ शैलेंद्र सक्सेना के अनुसार "ऐसा कोई मेडिकल सबूत नहीं है, जिससे पता चलता हो कि गोमूत्र में एंटी-वायरल गुण होते हैं. वहीं गाय के गोबर का इस्तेमाल उल्टा भी पड़ सकता है. क्योंकि हो सकता है कि इसमें कोरोना वायरस हो जो इंसानों में भी आ सकता है." 

2018 से काउपैथी गाय के गोबर से बने साबुन के अलावा अल्कोहल-फ्री हैंड सैनिटाइजर ऑनलाइन बेच रही है, जिनमें देसी गायों का गोमूत्र मिलाया जाता है. फिलहाल ये ऑनलाइन आउट ऑफ स्टॉक दिखाया जा  रहा है. प्रोडक्ट के अनुसार "मांग बढ़ जाने की वजह से अब हम प्रति ग्राहक उत्पाद बेचने की सीमा तय कर रहे हैं, ताकि सभी ग्राहकों को यह उत्पाद मिल सके." वहीं दूसरी तरफ योग गुरु बाबा रामदेव ने एक हिंदी न्यूज़ चैनल पर लोगों को घर में ही हर्बल हैंड सैनिटाइजर बनाने की सलाह दे डाली है. उन्होंने कहा है कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी गिलोय, हल्दी और तुलसी के पत्तों के सेवन से कोरोना वायरस को रोकने में मदद मिल सकती है. 


लेकिन मित्रो विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमरीका के डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक़ अल्कोहल युक्त हैंड सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करना बेहद ज़रूरी है और लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन में प्रोफेसर सैली ब्लोमफिल्ड के मुताबिक भी कोई भी घर में बनाया गया सैनिटाइज़र कारगर नहीं होगा, क्योंकि वोडका तक में सिर्फ़ 40 प्रतिशत अल्कोहल ही होता है. 

यही नहीं कोरोना के नाम पर कुछ कारोबारी तो ये कहकर सामान बेच रहे हैं कि इससे कोरोना वायरस से बचा जा सकता है. उदाहरण के लिए 15 हज़ार रुपए में "एंटी कोरोना वायरस" गद्दे बेचे जा रहे हैं. इसके विज्ञापन अख़बारों में भी दिए गए थे . किन्तु विरोध होने पर निर्माता ने विज्ञापन हटा दिया है . 

इसी प्रकार कहा जा रहा है कि चाय पीकर कोरोना से बचा जा सकता है . दरअसल इसके पीछे चाय में मिथाइलज़ेन्थाइन्स नाम का एक तत्व का होना है जो कॉफी और चॉकलेट में भी मिलता है. चीन में भी फरवरी में इस तरह की कुछ रिपोर्ट आई थीं जिनमें दावा किया गया था कि चाय के इस्तेमाल से कोरोना वायरस को फैलने से रोका जा सकता है, लेकिन ये दावे सही नहीं है. 

कोरोना जैसी खतरनाक महामारी से बचने के लिए अफवाहों से बचना भी आवश्यक है . अत: किसी भी जानकारी पर विश्वास करने से पहले उसके तथ्यों की जांच अवश्य कर ले .

Sunday, 22 March 2020

चन्द्रमा का भाई :2020 सीडी3







































भारत में चन्द्रमा यानी चाँद (Moon) का अपना अलग धार्मिक महत्व है . विज्ञान उसे प्रथ्वी का उपग्रह मानता है लेकिन भारत के लोग चन्द्रमा को किसी देवता से कम नही मानते है . चन्द्रमा के साथ तो यहाँ की महिलाओ की हजारो साल से आस्थाए भी जुडी हुई है .दादा -दादी की बच्चो को चंदा मामा की कहानिया हो या यहाँ के ज्योतिषियों का ज्योतिष , चन्द्रमा का सम्बन्ध जन मानस की मनोभावनाओ से जुड़ चूका है . कही पर चाँद की सुन्दरता का पैमाना लिया जाता है तो कही -कही पर उसका जिक्र स्वभाव में नम्रता के साथ शांत मन के साथ किया जाता है . सदियों तक चन्द्रमा का वजूद कपोल -कल्पनाओ पर आधारित कहानियों और मान्यताओ पर चलता रहा . किन्तु 1969 में अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रोंग और उनके साथी के चन्द्रमा में पहुचते ही चन्द्रमा के तमाम रहस्यों से पर्दा उठ गया . इसके बाद चन्द्रमा के बारे में कई गुप्त जानकारिय उपग्रहों और कुछ अंतरिक्ष यानो द्वारा समय -समय पर उपलब्ध करवाई जाती रही है . 



अमेरिका ,रूस , चीन के साथ भारत भी चन्द्रमा के खोजी अभियान से जुड़ चूका है और इस दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है . वास्तव में विज्ञान ने प्रथ्वी के सुदूर स्थित इस उपग्रह के अंधेरो की पर्तो को भी हटा दिया है . अब बात केवल एक चन्द्रमा की ही नहीं रही बल्कि उससे जुदा एक और चन्द्रमा की भी होने लगी है . दरअसल हाल में ही अमेरिकी खगोलविदों, थियोडोर प्रूआइन और कैक्पर वीर्ज़कोज ने टास्कुन (एरिज़ोना) की माउंट लेमन ऑब्जरवेटरी में 1.52 मीटर (60 इंच) के टेलिस्कोप की मदद से एक ऐसे छोटे चन्द्रमा की खोज की है जो पिछले 3 साल से प्रथ्वी की परिक्रमा कर रहा है . इन खगोलविदों ने इस नए चन्द्रमा का नाम 2020 सीडी3 दिया है. 





















नारंगी रंग में नए चन्द्रमा 2020 सीडी3 का परिक्रमा पथ व सफेद रंग में मुख्य स्थाई चन्द्रमा का पथ2020 सीडी3, वास्तव में एस्टेरॉयड्स (क्षुद्रग्रहों) के एक ऐसे समूह का बहुत छोटा सा हिस्सा है जो स्थायी तौर पर सूरज और अस्थायी तौर पर धरती का चक्कर काटते हैं. खगोलविदों का कहना है कि नया चन्द्रमा 2020 सीडी3 इतना छोटा है कि यदि यह प्रथ्वी से टकरा भी जाए तो प्रथ्वी को इससे कोई नुकसान नहीं होगा. इस सम्बन्ध में क्षुद्र ग्रहों का अध्ययन करने वाली संस्था माइनर प्लैनेट सेंटर के अनुसार प्रथ्वी के पास एक और चांद है जो करीब 3 सालों से इसके चक्कर लगा रहा है. यह नया चंद्रमा हमारे पुराने चंद्रमा जितना बड़ा नहीं है और उतना चमकीला भी नहीं है. इसकी कुल माप मात्र 1 से 6 मीटर के बीच ही है और सम्भव है यह ज्यादा समय तक हमारे साथ भी नहीं रहेगा.

कहा जाता है कि इस तरह के मिनी-मून्स या छोटे-मोटे चंद्रमा आते-जाते रहते है और हो सकता है कि 2020 सीडी3 भी प्रथ्वी की अपनी आखिरी परिक्रमा ही कर रहा हो. एक अध्ययन बताता है कि हर समय इस तरह का कम से कम एक अस्थायी छोटा चंद्रमा प्रथ्वी का चक्कर लगा रहा होता है. आम तौर पर इनका साइज 1 मीटर से ज्यादा होता है और ये धरती की कम से कम एक परिक्रमा तो करते ही हैं. इनमें से किसी के भी लंबे समय तक न टिक पाने का कारण हमारे अपने चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल है. इससे पैदा हुए खिंचाव के चलते ही ये छोटे पिंड कुछ सालों बाद धरती का चक्कर लगाना छोड़कर फिर से सूर्य की परिक्रमा करने लगते हैं.




दरअसल प्रथ्वी के ये सभी कथित चंद्रमा ऐसे एस्टेरॉयड्स है जो सूर्य का एक चक्कर लगाने में 1 साल का वक्त लगाते हैं. ये प्रथ्वी के साथ-साथ सूर्य का भी चक्कर लगा रहे होते हैं. इन्हें प्रथ्वी का क्वासी सैटेलाइट यानी आभासी उपग्रह भी कहा जाता है क्योंकि ये हमसे हमारे मुख्य चंद्रमा के मुकाबले बहुत दूर होते हैं. 2016 एचओ3 इस तरह के उपग्रहों का सबसे अच्छा उदाहरण है. यह सूरज के साथ-साथ प्रथ्वी की परिक्रमा भी करता हुआ प्रतीत होता है.

वर्ष 2006 में इसी तरह के एक और पिंड आरएच120 को भी खोजा गया था. मात्र 2-3 मीटर व्यास वाले आरएच120 ने सितंबर 2006 से जून 2007 के बीच धरती के चार चक्कर लगाए थे. बाद में यह स्वतंत्र होकर, सुदूर सूरज की तरफ निकल गया. यह लगभग हर 20 साल बाद धरती के पास आता है और अगली बार 2028 में फिर से हमारे पास से गुजरेगा.

2020 सीडी3 अपने छोटे आकार के कारण प्रथ्वी के मुख्य चन्द्रमा का छोटा भाई जरुर बन सकता है किन्तु हमें इससे रात में किसी प्रकार की चांदनी की उम्मीद नही करनी चाहिए . सूरज और चाँद के बीच आने -जाने वाले इन छोटे ग्रहों पर अभी काफी खोज किया जाना बाकी है . लेकिन निष्कर्ष यह भी है कि प्रथ्वी के लिए केवल एक ही चन्द्रमा नही है .
(द ओपन यूनिवर्सिटी में प्लानेटरी जियोसाइंस के प्रोफेसर डेविड रोथरी के मूल लेख द कन्वर्सेशन पर आधारित ).































Tuesday, 31 December 2019

नया वर्ष और धरती की सुरछा






दुनिया के इनवायरमेंट वैज्ञानिको ने वर्ष 2030 को प्रथ्वी के बिगड़ते वातावरण को दुरुस्त करने हेतु अंतिम समय सीमा निर्धारित की है . अर्थात 2030 के बाद धरती के वातावरण को की गयी हानि फिर कभी दुरस्त नही हो सकेगी . जिसके लिए कम से कम 2010 से प्रयास किये जाने चाहिए थे . किन्तु अफ़सोस दुनिया भर में इन 10 वर्षो में कागजी खाना पूरी के सिवाय कुछ नही किया गया . 

अब 2020 आने को है और ये आने वाले 10 साल हमारे लिए अंतिम अवसर है . प्रथ्वी के वातावरण के बिगड़ने का ही दुष्प्रभाव है कि आज मौसम की चाल -ढाल बदल रही है . असहय गर्मी और असहय ठंड के कारण तमाम जीवधारियो की जान निकल रही है . विकास के नाम पर चल रहा प्राक्रतिक दोहन और वैश्विक बाजार का कचरा धरती की सत्ता को चुनौती दे रहा है .

धरती पर रहने वाले प्राणियों किसी गफलत में मत रहिये , समय रहते यदि प्रथ्वी और पर्यावरण को सुरछित नही किया गया तो सबका अंत निकट है . नए साल की खुशियों में अपनी सामाजिक और प्राक्रतिक जिम्मेदारियों को भी याद रखिये . धन्यवाद .

सभी साथियों और शुभचिंतको को नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाये .

Wednesday, 18 December 2019

प्रमुख राजनैतिक विचारक



























देश के राजनैतिक चिंतन और दर्शन में महात्मा गाँधी जी के बाद डा राम मनोहर लोहिया और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का भी विशिष्ट योगदान माना जा सकता है .

गाँधी जी के सिद्धांत सत्य ,अहिंसा और विशवास थे . वे जिस कांग्रेस के नेत्रत्व कर्ता थे उसका सम्बन्ध आजादी के आंदोलन से जुड़ा रहा . वह इस कांग्रेस को राजनैतिक दल के रूप में देखने के विरुद्ध थे . किन्तु प्रधानमंत्री नेहरु ने राजनैतिक कांग्रेस को खड़ा किया और यह राजनैतिक कांग्रेस लगभग 70 साल तक सत्ता से जुडी रही . इन 70 सालो में कांग्रेस के क्रिया कलापों और महात्मा गाँधी जी की उपर्युक्त सोच पर आज एक व्यापक चिन्तन किया जा सकता है .

देश के दुसरे राजनैतिक चिंतक डा राम मनोहर लोहिया जी की बात करे तो वह आज भी इस देश के आधे से ज्यादा लोगो के लिए अनजान व्यक्तित्व है . किन्तु डा लोहिया इस देश के सर्वश्रेष्ठ मौलिक चिंतक , साहित्यकार ,दार्शनिक , इतिहासकार ,स्वप्नद्रष्टा , स्वतन्त्रता सेनानी और राजनैतिक चिंतक थे . वास्तव में वह राजनीति से आगे सामाजिक और आर्थिक मामलो के भी गूढ़ विशेषग्य थे . वह समस्त भेदभाव के खिलाफ थे और देश काल की सीमाओ से परे विश्व नागरिकता के द्रष्टा थे . उन्होंने महात्मा गाँधी और मार्क्स के विचारो का संगम करते हुए भारत के सन्दर्भ में समाजवाद की अवधारणा प्रस्तुत की . डा लोहिया देश के लिए एक नई संस्क्रति और सभ्यता के जन्मदाता थे किन्तु उनके विचार इतने प्रखर और मौलिक है कि सम्भवतः देश के लोग उन्हें आत्मसात नही कर पाए .कांग्रेस को राजनैतिक दल बनाने की जिस मुहीम का महात्मा गाँधी ने शांतिपूर्ण विरोध किया था , डा लोहिया उसी कांग्रेस शासित सरकार की गांधीवाद की व्यावहारिकता पर सवाल उठाते नजर आये . इसमें कोई संदेह नही कि उनके विचारो ने देश के लोकतंत्र को काफी वक्त तक संजीवनी दी .

तीसरे राजनैतिक चिंतक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने चिन्तन में एकात्मवाद का विचार प्रस्तुत किया था . एकात्मता अर्थात अनेक विषमताओ पर समदर्शी विचार .उनका मानना था कि समाज और व्यक्ति में परस्पर संघर्ष पतन का कारण है और इससे संस्क्रति का हास होता है . एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि भारतवर्ष विश्व में सर्वप्रथम रहेगा तो अपनी सांस्कृतिक संस्कारों के कारण. उन्होंने कहा था कि मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा ये चारों अंग ठीक रहेंगे तभी मनुष्य को चरम सुख और वैभव की प्राप्ति हो सकती है. जब किसी मनुष्य के शरीर के किसी अंग में कांटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है, बुद्धि हाथ को निर्देशित करती है कि तब हाथ चुभे हुए स्थान पर पल भर में पहुँच जाता है और कांटे को निकालने की चेष्टा करता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. सामान्यत: मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चारें की चिंता करता है. मानव की इसी स्वाभाविक प्रवृति को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद की संज्ञा दी थी .

उनके अनुसार संस्कृति किसी काल विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के बन्धन से जकड़ी हुई नहीं है, अपितु यह तो स्वतंत्र एवं विकासशील जीवन की मौलिक प्रवृत्ति है. इस संस्कृति को ही हमारे देश में धर्म कहा गया है. जब हम कहते हैं कि भारतवर्ष धर्म-प्रधान देश है तो इसका अर्थ मजहब, मत या रिलीजन नहीं, अपितु यह संस्कृति ही है.दीनदयाल जी का मानना था कि भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा . भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी. उनके अनुसार विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं, राजनीति अथवा अर्थनीति की नहीं.

किन्तु 52 वर्ष की आयु में 11 फ़रवरी 1968 को मुग़लसराय के पास रेलगाड़ी में यात्रा करते समय पंडित दीनदयाल जी की दुखद हत्या कर दी गयी .जिसकी गुत्थी आज भी अल्सुल्झी हुई है .

फिलहाल देश की राजनीति की दिशा आज जिस तरफ जा रही है , उस सन्दर्भ में इन तीनो महापुरुषों के प्रमुख विचारो को जानना बेहद आवश्यक हो गया है .