Wednesday, 11 September 2019

विनोबा भावे





















यु तो इस देश में जमीन की लड़ाई का इतिहास काफी पुराना है और भारत जैसे शांति प्रिय देश में जमीन की लड़ाई ने महाभारत का युद्ध तक करवा दिया था . किन्तु आज के हिंसाप्रिय और अराजक माहोल में लोग इस बात को एकदम भूल चुके है कि कभी कुछ समाजसेवियों के आह्वाहन पर इसी भारत में लोगों ने अपने ही गांव-समाज की जमीने भूमिहीन लोगों के लिए दान में दे दी थी .

आज़ादी के बाद भारत के सामने एक सबसे बड़ा प्रश्न जमीन के बंटवारे का भी था. जहा एक तरफ राजे-रजवाड़ों से लेकर जमींदारों और बड़े भूमिपतियों के पास बेहिसाब जमीनें थीं, तो दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता भूमिहीन थी. जहां एक ओर जमींदारी उन्मूलन और भू-हदबंदी जैसे सरकारी प्रयास चल रहे थे, वहीं दूसरी ओर अनेक स्थानों में बंदूक के जरिए जमीन और संपत्ति छीन लेने का खूनी-संघर्ष भी चल रहा था. ऐसे विकट समय में विनोबा भावे आगे आये और उन्होंने भूदान आन्दोलन का सूत्रपात किया . 

विनोबा को अपने अहिंसा और प्रेमपूर्ण आन्दोलन की बदौलत लगभग 42 लाख एकड़ जमीन भूदान में मिल गयी . उन्होंने इसमें से 15 लाख तो तत्काल ही भूमिहीनों में बांट दी . कहा जाता है कि भूदान आंदोलन में मिली जमीनों में से 10 लाख एकड़ जमीन आज भी बिना बंटे ही सरकारी राजस्व विभाग की फाइलों में धूल फांक रही है. वास्तव में आज यह विश्वास करना भी काफी कठिन है कि जिस जमीन के कारण भाई-भाई का सिर काटता है, गोलियां चलती हैं, जिसके लिए लोग सारा जीवन कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटते बिता देते हैं, वह जमीन लोगों ने विनोबा को प्रेम से दे दी थी और विनोबा ने इसमें से ज्यादातर जमीनें हरिजनों और आदिवासियों के बीच बांट दी थी . 

इस तरह जमीन के असमान और एकतरफा अधिकार को काफी हद तक विनोबा ने समान अधिकार में बदल दिया . विनोबा के भूदान ने लोगो को इतना प्रभावित किया कि लोग ग्राम दान तक करने लगे . ग्राम दान यानी पुरे गाव की जमीन का ही दान . इस मुहीम से प्रभावित होकर लोकनायक जयप्रकाश ने अपना जीवन दान करने की बात कह दी और पूंजीवादियो से उद्योग दान की सिफारिश भी की . 

विनोबा ने कितनी भी मेहनत से गरीबो को जमीने दिलवाई हो , लेकिन आज के दबंग और रसूखदार लोग जमीनों को हडप कर उनका व्यवसाय भी शुरू कर दिया है और भूदान के स्थान पर भू माफिया हो गया है . 










Sunday, 1 September 2019

पेरियार ललई सिंह यादव



कर्मवीर ललई सिंह यादव जी का जन्म 1 सितम्बर 1911 को ग्राम कठारा रेलवे स्टेशन-झींझक, जिला कानपुर देहात के एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ था. उनके पिता चौधरी गुज्जू सिंह यादव एक कर्मठ आर्य समाजी थे एवं माता श्रीमती मूलादेवी, उस क्षेत्र के जनप्रिय नेता चौधरी साधौ सिंह यादव की पुत्री थी. 

ललई सिंह यादव जी ने सन् 1928 में हिन्दी के साथ उर्दू विषय लेकर हाईस्कूल पास किया. वह सन् 1929 से 1931 तक फाॅरेस्ट गार्ड के पद पर कार्यरत रहे एवं सन 1931 में ही इनका विवाह श्रीमती दुलारी देवी जी के साथ सम्पन्न हुआ. तत्पश्चात सन 1933 में वह सशस्त्र पुलिस कम्पनी जिला मुरैना (म.प्र.) में कान्स्टेबिल के पद पर भर्ती हो गये . अपनी सिपाही की नौकरी से समय निकाल कर वह अपनी उच्च शिछा -दीछा भी सम्पन्न करते रहे और सन् 1946 में नान गजेटेड मुलाजिमान पुलिस एण्ड आर्मी संघ ग्वालियर के अध्यक्ष चुने गए. नौकरी में रहते हुए उन्होंने तत्कालीन सिपाहियो की दशा पर ‘‘सिपाही की तबाही’ नामक एक पुस्तक लिखी, जिसने समस्त सिपाहियों को क्रांति के पथ पर चलने का आह्वान किया. इस प्रकार अंग्रेजी राज के खिलाफ इन्होंने आजाद हिन्द फौज की तर्ज पर ग्वालियर राज्य की आजादी के लिए जनता तथा सरकारी कर्मचारियों को संगठित कर पुलिस और फौज में हड़ताल करवाई एवं समस्त जवानों से कहा कि 
बलिदान न सिंह का होते सुना, 
बकरे बलि बेदी पर लाए गये।
विषधारी को दूध पिलाया गया,
केंचुए कटिया में फंसाए गये।
न काटे टेढ़े पादप गये,
सीधों पर आरे चलाए गये।
बलवान का बाल न बांका भया
बलहीन सदा तड़पाये गये। 
हमें रोटी कपड़ा मकान चाहिए,


आखिरकार अंग्रेजी हुकूमत ने 29.03.1947 को ग्वालियर स्टेट्स के स्वतंत्रता संग्राम के सिलसिले में पुलिस व सेना में हड़ताल कराने के आरोप धारा 131 भारतीय दण्ड विधान (सैनिक विद्रोह) के अंतर्गत साथियों सहित उन्हें राज-बन्दी बना लिया और 06.11.1947 को स्पेशल क्रिमिनल सेशन जज ग्वालियर ने उन्हें अध्यक्ष हाई कमाण्डर ग्वालियर नेशनल आर्मी होने के कारण 5 वर्ष स-श्रम कारावास तथा 5 रूपये अर्थ दण्ड का सर्वाधिक दण्ड भी सुना दिया . जेल की सजा होने के बाद अंततः देश आजाद होने पर वह दिनांक 12.01.1948 को अपने सभी साथियों सहित जेल से रिहा हुये. 

एक ईमानदार स्वतन्त्रता सेनानी और क्रन्तिकारी विचारो के कारण उन्हें अन्याय बिलकुल बर्दास्त नही था फिर वह चाहे किसी भी स्वरूप में क्यों न हो . इसी लिए हिन्दू शास्त्रों में व्याप्त घोर अंधविश्वास और पाखण्ड के खिलाफ वह विद्रोह कर बैठे . हिन्दू धर्म में मनुवाद और ब्राह्मणवाद से उपजे शोषण पर वह काफी दुखी थे और ऐसी स्थिति में इन्होंने यह धर्म छोड़ने का भी मन बना लिया. वह समाज में व्याप्त सामजिक विषमता के घोर खिलाफ थे और समस्त मानव जाति के प्रति समता और बन्धुत्व का व्यवहार चाहते थे . उनका कहना था कि सामाजिक विषमता का मूल, वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था, स्मृति और पुराणों से ही पोषित है. सामाजिक विषमता का विनाश सामाजिक सुधार से नहीं अपितु इस व्यवस्था से अलगाव में ही समाहित है. 

तभी इन्हें यह अहसास हुआ कि देश की अशिछित जनता को जागरूक करने एवं विचारों के प्रचार- प्रसार का सबसे सबल माध्यम साहित्य ही है अत; साहित्य प्रकाशन की ओर भी इनका विशेष ध्यान गया. उन्होंने ‘अशोक पुस्तकालय’ नाम से प्रकाशन संस्था स्थापित की और अपना प्रिन्टिंग प्रेस लगाया, जिसका नाम ‘सस्ता प्रेस’ रखा . इसके पश्चात उन्होंने 5 नाटक लिखे- (1) अंगुलीमाल नाटक, (2) शम्बूक वध, (3) सन्त माया बलिदान, (4) एकलव्य, और (5) नाग यज्ञ नाटक. गद्य में भी उन्होंने 3 पुस्तके लिखीं – (1) शोषितों पर धार्मिक डकैती, (2) शोषितों पर राजनीतिक डकैती, और (3) सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो? 

एशिया के सुकरात कहे जाने वाले दक्षिण भारत के महान क्रान्तिकारी पैरियार ई. व्ही. रामस्वामी नायकर जी के उस समय उत्तर भारत में कई दौरे हो रहे थे जिनसे ललई सिंह यादव जी उनके सम्पर्क में आये. सम्पर्क होने पर पेरियार द्वारा लिखित ‘‘रामायण ए ट्रू रीडि़ंग’’ में उन्होंने विशेष अभिरूचि दिखाई. इसके बाद दोनों सामजिक क्रान्तिकारियो में इस पुस्तक के प्रचार प्रसार की, सम्पूर्ण भारत विशेषकर उत्तर भारत में करने पर विशेष चर्चा हुई. समस्त उत्तर भारत में इस पुस्तक के हिन्दी में प्रकाशन की अनुमति पैरियार रामास्वामी नायकर जी ने ललईसिंह यादव जी को 01-07-1968 को दे दी. जिसके बाद ललईसिंह यादव जी द्वारा इसे 'सच्ची रामायण' के हिन्दी स्वरूप में 01-07-1969 को प्रकाशित किया गया . इसके प्रकाशन से सम्पूर्ण उत्तर पूर्व तथा पश्चिम् भारत में एक तहलका सा मच गया. जिससे उ.प्र. सरकार द्वारा 08-12-1969 को इस पुस्तक को प्रतिबंधित कर इसके जब्ती का आदेश प्रसारित हो गया . सरकार के अनुसार यह पुस्तक भारत के कुछ नागरिक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर चोट पहुंचाने तथा उनके धर्म एवं धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने के लक्ष्य से लिखी गयी थी . 

इस प्रतिबन्ध और साहित्यिक दमन के विरूद्ध प्रकाशक ललई सिंह यादव जी ने हाई कोर्ट इलाहाबाद में क्रमिनल मिसलेनियस एप्लीकेशन 28-02-1970 को प्रस्तुत किया . कोर्ट में तीन जजों की स्पेशल बैंच इस केस के सुनने के लिए बनाई गई . जिसमे अपीलांट (ललईसिंह यादव) की ओर से निःशुल्क एडवोकेट श्री बनवारी लाल यादव और सरकार की ओर से गवर्नमेन्ट एडवोकेट तथा उनके सहयोगी श्री पी.सी. चतुर्वेदी एडवोकेट व श्री आसिफ अंसारी एडवोकेट की बहस दिनांक 26, 27 व 28 अक्टूबर 1970 को लगातार 3 दिन तक सम्पन्न हुई. जिसमे 19-01-71 को माननीय जस्टिस श्री ए. के. कीर्ति, जस्टिस के. एन. श्रीवास्तव तथा जस्टिस हरी स्वरूप ने बहुमत से निर्णय दिया कि -

1. गवर्नमेन्ट आफ उ.प्र. की पुस्तक ‘सच्ची रामायण’ की जब्ती की आज्ञा निरस्त की जाती है. 
2. जब्तशुदा पुस्तकें ‘सच्ची रामायण’ अपीलांट ललईसिंह यादव को वापिस दी जाये. 
3. गर्वन्र्मेन्ट आफ उ.प्र. की ओर से अपीलांट ललई सिंह यादव को 300 का हर्जाना खर्च भी दिया जाए . 

अभी ललई सिंह यादव द्वारा प्रकाशित ‘सच्ची रामायण’ का प्रकरण चल ही रहा था कि उ.प्र. सरकार की 10 मार्च 1970 की स्पेशल आज्ञा द्वारा 'सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें' नामक पुस्तक जिसमें डाॅ. अम्बेडकर के कुछ भाषण थे तथा 'जाति भेद का उच्छेद' नामक पुस्तक 12 सितम्बर 1970 को चौधरी चरण सिंह की सरकार द्वारा जब्त कर ली गयी. इसके लिए भी ललई सिंह यादव ने श्री बनवारी लाल यादव एडवोकेट, के सहयोग से मुकदमें की पैरवी की. मुकदमें की जीत से ही 14 मई 1971 को उ.प्र. सरकार की इन पुस्तकों की जब्ती की कार्यवाही निरस्त कराई गयी और सभी पुस्तके जनता को उपलब्ध हो सकी. इसी प्रकार ललई सिंह यादव द्वारा लिखित पुस्तक ‘आर्यो का नैतिक पोल प्रकाश’ के विरूद्ध 1973 में मुकदमा चला दिया गया और यह मुकदमा उनके जीवन पर्यन्त चलता रहा.

पुस्तक 'सच्ची रामायण' समेत अन्य पर हाई कोर्ट में हारने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी किन्तु वहां भी अपीलांट उत्तर प्रदेश सरकार क्रिमिनल मिसलेनियस अपील नम्बर 291/1971 ई. निर्णय सुप्रीम कोर्ट आफ इण्डिया, नई दिल्ली दि. 16-9-1976 ई. के अनुसार अपीलांट की हार हुई अर्थात् रिस्पांडेण्ट श्री ललई सिंह यादव की जीत हुई. यहाँ फुलबैंच में माननीय सर्वश्री जस्टिस पी. एन. भगवती जस्टिस वी. आर. कृष्णा अय्यर तथा जस्टिस मुर्तजा फाजिल अली मौजूद थे . 


महान क्रान्तिकारी पैरियार ई. व्ही. रामास्वामी नायकर जो गड़रिया (पाल-बघेल) जाति के थे, अचानक वह 20 दिसम्बर 1973 की सुबह इस लोक से विदा हो गये. उनकी मृत्यु के पश्चात् एक विशाल सभा में चेन्नई में ललईसिंह यादव जी को एक व्याख्यान हेतु बुलाया गया था. श्री रामास्वामी नायकर पेरियार जी की श्रद्धांजलि सभा में दिये गये इनके भाषण पर दक्षिण भारतीय श्रोता मुग्ध हो गये और इनके भाषण की समाप्ति पर 3 नारे लगाये गये. 

1 . अब हमारा अगला पैरियार
2 . पैरियार ललई सिंह
3 . पैरियार ललई सिंह



इस घटना के बाद से ही इनके नाम के पूर्व पैरियार शब्द का शुभारम्भ हुआ. दक्षिण भारत में पैरियार शब्द जाति वादी नहीं अपितु स्वच्छ निष्पक्ष-निर्भीक अथवा सागर के अर्थों में प्रयोग किया जाने वाला सम्मान सूचक शब्द है. शोषित पिछड़े समाज में स्वाभिमान व सम्मान को जगाने तथा उनमें व्याप्त अज्ञान, अंधविश्वास, जातिवाद तथा ब्राह्मणवादी परम्पराओं को ध्वस्त करने के उद्देश्य से वह लघु साहित्य के प्रकाशन की धुन में अपनी 59 बीघे की जमीन कौडि़यों के भाव बेच प्रकाशन के कार्य में आजीवन जुटे रहे और अंत में एक कर्मयोगी की तरह 7 फरवरी 1993 को उन्होंने इस दुनिया से अंतिम विदा ले ली.

देश के पिछड़े और शोषित समाज की लड़ाई आजीवन लड़ने के बावजूद भी आज पेरियार ललई सिंह यादव जी का नाम गुमनामी के अँधेरे में खोया हुआ है . उनके क्रन्तिकारी विचारो के तेज और बहुमूल्य साहित्य को तलाशना भी एक दुरूह कार्य बन चूका है जिसका दोष इस देश की  मनुवादी ताकतों के साथ -साथ थोडा -बहुत बहुजन को भी दिया जाना चाहिए . काश बहुजन समाज अपने इस महापुरुष के संघर्ष को संजो कर आगे बढ़ पाता तो उसमे कही न कही क्रन्तिकारी वैचारिक बदलाव अवश्य नजर आता .


Monday, 19 August 2019

कृष्णवाद



























'भगवान श्री कृष्ण' का मनोरम और मंगलकारी नाम ही एक विराट वैश्विक दर्शन है क्यों कि उनका सम्पूर्ण जीवन ऐसे अनेक असाधारण घटनाक्रमों और संघर्षों से भरा पड़ा है जिसमें वह किसी लोकनायक की भूमिका से कम नही नजर आते है . दुनिया भर के लाखो बुद्धिजीवी श्री कृष्ण के रहस्यमय जीवन और उनके बताये दुर्लभ ज्ञान को जानने को सदैव उत्सुक बने रहते है . इसलिए यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि आखिर 'श्री कृष्ण' के विराट व्यक्तित्व में ऐसा क्या है जो सदियों से दुनिया भर के श्रेष्ठ अध्यात्मिक दार्शनिको व धार्मिक गुरुओ को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है . कही वह कुरुछेत्र के रण में महाभारत के महानायक श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया वह परम ज्ञान 'श्री मद भगवत गीता' तो नहीं है या फिर महाभारत नामक वह महाग्रंथ, जिसमे देश, धर्म-अधर्म , न्याय-अन्याय , राजनीति, समाज, युद्ध, परिवार, ज्ञान-विज्ञान, अध्यात्म समेत जीवन के समस्त छेत्रो का अद्भुत वर्णन समाहित है . इस सन्दर्भ में सम्पूर्ण विश्व को लोक -परलोक से सम्बन्धित रहस्यमयी ज्ञान देने वाली 'श्री मद भगवत गीता' में श्री कृष्ण के विराट व्यक्तित्व के आगे नतमस्तक होते हुए कुंती पुत्र अर्जुन द्वारा की गई यह एक स्तुति बेहद खास है. 


"वासुदेव सुतं देवम कंस चाणूर मर्दनम्,
देवकी परमानन्दं कृष्णम वन्दे जगतगुरु"
अर्थात 
वासुदेव जी के पुत्र, देवो के देव , कंस और चाणूर को मारने वाले, देवकी को अपार आनंद देने वाले श्री कृष्ण आप इस विश्व के सबसे बड़े और श्रेष्ठ गुरु है .

स्पष्ट है श्री कृष्ण का महान व्यक्तित्व पूरी दुनिया भर में सबसे महानतम है जिसमें उनकी बहुरूपता के भव्य दर्शन होते है. वास्तव में इस प्रक्रति का हर रंग -रूप उनमे समाहित है . "कृष्ण" मूलतः एक संस्कृत शब्द है, जो "काला", "अंधेरा" या "गहरा नीला" का समानार्थी है. "अंधकार" शब्द से इसका सम्बन्ध ढलते चंद्रमा के समय को कृष्ण पक्ष कहे जाने में भी स्पष्ट होता है. हालांकि इस नाम का अनुवाद कहीं-कहीं "अति-आकर्षक" के रूप में भी किया गया है. 

श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र के दिन रात्रि  के 12 बजे हुआ था . उनका यह जन्मदिन श्री क्रष्ण जन्माष्टमी के नाम से भारत, नेपाल, अमेरिका सहित लगभग सम्पूर्ण विश्व में मनाया जाता है. कृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था तथा वह माता देवकी और पिता वासुदेव की 8 वीं संतान थे. दरअसल कृष्ण का जन्म ही नितान्त विषम परिस्थितियों में होता है . जिस बालक का जन्म कारागार के अंदर हो उसके लिए आगे का जीवन, संघर्ष का दूसरा नाम ही होना चाहिए . सबको पता है कि कारागार कोई पवित्र स्थल नही होता है किन्तु कृष्ण ने दुनिया को बताया कि जन्मस्थान से कोई महान नही होता अपितू अपने सद्कर्मो से ही महान बना जा सकता है . ब्रज का मुरलीधर और कुरुछेत्र का श्री कृष्ण, वास्तव में न जाने कितने ही स्वरूपों में श्री क्रष्ण ने स्वयम को प्रस्तुत किया . एक तरफ बांस के पेड़ से निर्मित उनकी मुरली की मधुर धुन ब्रजवासियो को विह्वल करती है तो दूसरी तरफ वह कुरुछेत्र के मैदान में कुशल सारथी बन कर अर्जुन के साथ शंखनाद कर रहे है . अपनी चंचल बाल लीलाओ के माध्यम से खेल -खेल में मथुरा के राजा कंस मामा के भेजे आतताईयो का संहार करना हो या कन्दुक लेने के बहाने यमुना में कालिया नाग को दंडित करना हो , समस्त कृष्ण लीलाए अपरम्पार है . कही युवा कृष्ण अन्याई और अधर्मी कंस का संहार करते है तो अन्यत्र वह गोपियों के संग अपनी मधुर बांसुरी लेकर प्रेम का शास्वत संदेश भी दे रहे है . श्री कृष्ण ने अन्याय से लड़ते हुए तमाम राजा -महाराजा , मायावी दुष्टों को ही नहीं अपितु देवेन्द्र तक को पराजित किया . पता नही क्यों यदुनन्दन कृष्ण के तेज को देवराज इंद्र भी न समझ सके और अपनी एक भूल के कारण इस लोक में अपने देवत्व को गंवा बैठे . कृष्ण का महान व्यक्तित्व इंसानों का ही रछक नही अपितु जीव -जन्तुओ का भी पालक नजर आता है . वास्तव में पूरे विश्व में श्री कृष्ण से बढ़ कर अन्य कोई गोपालक भी नही हुआ होगा . अपनी इन्ही गायो और ग्वालो की रछा करने हेतु वह श्री कृष्ण से गिरधर बन गये . 

ब्रज की गोपिया उन्हें छलिया अवश्य कहती है लेकिन वही छलिया क्रष्ण आखिरकार क्रष्णा (द्रोपदी) के पुकारने में उसकी लाज रखने हेतु पहुच जाते है . ब्रज में राधा अहीरिन (अनुराधा ) के साथ कृष्ण अहीर की रास लीला और प्रेम अठखेलिया उनके निष्काम प्रेम का अभूतपूर्व संदेश है . हालांकि उनके निष्काम प्रेम के स्थान पर आजकल देश में जोर -जबरदस्ती और विकृत मानसिकता काफी ज्यादा हावी है . सम्भवतः यह पाश्चात्य संस्क्रती का भारतीय संस्क्रती पर आक्रमण है . वास्तव में राधा-कृष्ण के प्रेम में नर -नारी के समत्व के दर्शन भी होते है . चर्चा जब राधा -कृष्ण की हो तो मीरा का नाम भी सामने आ जाता है . वही मीराबाई जहा से चित्तौड़ की एक रानी पद्मिनी भी थी . इसी धरती से मीरा ने कृष्णभक्ति में अपना सर्वस्व त्याग दिया . कहा जाता है कि वह कृष्ण के प्रेम में इस कदर खोई कि जहर का प्याला भी अपने अधरों से लगा लिया . अंत मे मीरा ने अपनी अटूट भक्ति से कृष्ण के प्रेम को प्राप्त किया किन्तु मीराबाई का उदय एक ऐसे समय में हुआ था जब भारत में खानवा का युद्ध भी हुआ और इस युद्ध में बाबर ने राणा सांगा को पराजित कर मुग़ल साम्राज्य की नीव डाल दी थी . इस दौर में यह प्रश्न काफी अहम था कि जब मीराबाई अपने इष्ट श्री कृष्ण के प्रेम में डूबी हुई थी तब उस दौर में भारत के राजे -महाराजाओ ने श्री कृष्ण की युद्ध कलाओं और कूटनीति से कोई सबक क्यों नहीं लिया . 


श्री कृष्ण ने अपने जीवनकाल में अथाह पराक्रम और कल्याणकारी कर्म किये इसलिए उन्हें कर्मो का देव मान लेना चाहिए था . किन्तु यह एक विडम्बना ही है कि कर्मयोगी होने के बावजूद भी वह इस देश के जनमानस के अंतर्मन में कर्म के देवता नहीं बन सके . वास्तव में श्री क्रष्ण का जीवन एक लोकनायक के समान ही है . कुरुछेत्र के रण में उन्होंने अर्जुन से स्पष्ट कहा कि इस ब्रह्मांड में कर्म ही असली पूजा है और व्यक्ति या जीव का कर्म ही उसके भाग्य का निर्माण करता है . कृष्ण यादव शिरोमणि है लेकिन दुर्भाग्य से उनके वंशज ही उन्हें अपना आदर्श मानने से कतराते है . उनके वंशज अहीर समाज अपने पुरखे यदुनन्दन श्री कृष्ण के कृष्णवाद को अपनाना तो दूर वे सुबह -शाम उनका ध्यान और स्मरण भी भूल गये . इस प्रकार कृष्ण का विराट वैश्विक व्यक्तित्व अपने वंशजो में ही गुमनाम हो गया . हालांकि बंगाल और उड़ीसा में कृष्ण आज भी काफी जीवंत है . बंगाल में तो किसी की म्रत्यु होने पर ' बोलो हरि -बोल हरि' का उद्घोष आज भी सुनाई पड़ जाता है . महाभारत का एक रोचक प्रसंग कुछ इस प्रकार है . 


वनवास जाने से पूर्व पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- 'हे श्रीकृष्ण! अभी यह द्वाप‍र का अंतकाल चल रहा है. आप हमें बताइए कि आने वाले कलियुग में कलिकाल की चाल या गति क्या होगी ,कैसी होगी?' तब श्रीकृष्ण ने कहा - 'तुम पांचों भाई वन में जाओ और जो कुछ भी वहा दिखे वह आकर मुझे बताओ. मैं तुम्हें उसका प्रभाव अवश्य बताऊंगा '. पांचों भाई वन में गए और वहा जाकर उन्होंने जो देखा उसको देखकर वे सब आश्चर्यचकित रह गए. पांचों भाई वन में अलग-अलग दिशाओं में भ्रमण को निकले. युधिष्ठिर भ्रमण पर थे तो उन्होंने एक जगह पर देखा कि किसी हाथी की दो सूंड है. यह देखकर युधिष्ठिर के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. अर्जुन दूसरी दिशा में भ्रमण पर थे. उन्होंने देखा कि कोई पक्षी है, उसके पंखों पर वेद की ऋचाएं लिखी हुई हैं, पर वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है. महाबली भीम ने देखा कि गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और जन्म के बाद वह बछड़े को इतना चाट रही है कि बछड़ा लहुलुहान हो गया. सहदेव ने देखा कि 6-7 कुएं हैं और आसपास के कुओं में पानी है किंतु बीच का कुआं खाली है. बीच का कुआं गहरा है फिर भी पानी नहीं है. उन्हें यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है?इसी प्रकार नकुल ने देखा कि एक पहाड़ के ऊपर से एक बड़ी-सी शिला लुढ़कती हुई आती है और कितने ही वृक्षों से टकराकर उनको नीचे गिराते हुए आगे बढ़ जाती है. विशालकाय वृक्ष भी उसे रोक न सके. इसके अलावा वह शिला कितनी ही अन्य शिलाओं के साथ टकराई पर फिर भी वह रुकी नहीं और अंत में एक अत्यंत छोटे पौधे का स्पर्श होते ही वह स्थिर हो गई.

पांचों भाइयों ने अपने देखे गए दृश्य की चर्चा की और शाम को श्रीकृष्ण को अपने अनुभव सुनाए. सबसे पहले युधिष्ठिर ने कहा कि मैंने तो पहली बार दो सूंड वाला हाथी देखा. यह मेरे लिए बहुत ही आश्चर्यजनक था. तब श्रीकृष्ण कहते हैं- 'हे धर्मराज! अब तुम कलिकाल की सुनो. कलियुग में ऐसे लोगों का राज्य होगा, जो दोनों ओर से शोषण करेंगे. बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ. मन में कुछ और कर्म में कुछ और , ऐसे ही लोगों का राज्य होगा.' इसके बाद अर्जुन की बात पर श्री क्रष्ण ने कहा कलियुग में ऐसे लोग रहेंगे, जो बड़े ज्ञानी और ध्यानी कहलाएंगे. वे ज्ञान की चर्चा तो करेंगे, लेकिन उनके आचरण राक्षसी होंगे. बड़े पंडित और विद्वान कहलाएंगे किंतु वे यही देखते रहेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और हमारे नाम से संपत्ति कर जाए.' 'हे अर्जुन! 'संस्था' के व्यक्ति विचारेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और संस्था हमारे नाम से हो जाए. हर जाति धर्म के प्रमुख पद पर बैठे विचार करेंगे कि कब किसका श्राद्ध हो. कौन, कब, किस पद से हटे और हम उस पर चढ़े. चाहे कितने भी बड़े लोग होंगे किंतु उनकी दृष्टि तो धन और पद के ऊपर ही रहेगी. ऐसे लोगों की बहुतायत होगी, कोई-कोई विरला ही सज्जन पुरुष होगा.' इसके पश्चात भीम के द्रष्टान्त पर श्री क्रष्ण ने कहा कलियुग का मनुष्य शिशुपाल के समान हो जाएगा. कलियुग में बालकों के लिए ममता के कारण इतना मोह करेगा कि उन्हें अपने विकास का अवसर ही नहीं मिलेगा. मोह-माया में ही घर बर्बाद हो जाएगा. किसी का बेटा घर छोड़कर साधु बनेगा तो हजारों व्यक्ति दर्शन करेंगे, किंतु यदि अपना बेटा साधु बनता होगा तो रोएंगे कि मेरे बेटे का क्या होगा? इतनी सारी ममता होगी कि उसे मोह-माया और परिवार में ही बांधकर रखेंगे और उसका जीवन वहीं खत्म हो जाएगा. अंत में वह बेचारा अनाथ होकर मरेगा. वास्तव में लड़के तुम्हारे नहीं हैं, वे तो बहुओं की अमानत हैं, लड़कियां जमाइयों की अमानत हैं और तुम्हारा यह शरीर मृत्यु की अमानत है. तुम्हारी आत्मा, परमात्मा की अमानत है. तुम अपने शाश्वत संबंध को जान लो '. इसके उपरान्त सहदेव की बात सुनकर श्री क्रष्ण कहते है ,'कलियुग में धनाढ्‍य लोग लड़के-लड़की के विवाह में, मकान के उत्सव में, छोटे-बड़े उत्सवों में तो लाखों रुपए खर्च कर देंगे, परंतु पड़ोस में ही यदि कोई भूखा-प्यासा होगा तो यह नहीं देखेंगे कि उसका पेट भरा है या नहीं. उनका अपना ही सगा भूख से मर जाएगा और वे देखते रहेंगे. दूसरी और मौज, मदिरा, मांस-भक्षण, सुंदरता और व्यसन में पैसे उड़ा देंगे किंतु किसी के दो आंसू पोंछने में उनकी रुचि न होगी. कहने का तात्पर्य यह कि कलियुग में अन्न के भंडार होंगे लेकिन लोग भूख से मरेंगे. सामने महलों, बंगलों में ऐशोआराम चल रहे होंगे लेकिन पास की झोपड़ी में आदमी भूख से मर जाएगा. अत: एक ही जगह पर असमानता अपने चरम पर होगी.' अंत में नकुल की बात पर श्री क्रष्ण जी ने कहा ,'कलियुग में मानव का मन नीचे गिरेगा, उसका जीवन पतित होगा. यह पतित जीवन धन की शिलाओं से नहीं रुकेगा, न ही सत्ता के वृक्षों से रुकेगा. किंतु हरि नाम के एक छोटे से पौधे से, हरि कीर्तन के एक छोटे से पौधे से मनुष्य जीवन का पतन होना रुक जाएगा.' 


पांड्वो और श्री क्रष्ण के मध्य का यह वार्तालाप आज के दौर पर एकदम सटीक बैठता है . इसलिए श्रीक्रष्ण के युगपुरुष होने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए . वास्तव में वह दूरदर्शी और त्रिकालदर्शी भी थे . उनके द्वारा नरकासुर की कैद से मुक्त करवाई गई 16000 कन्याओं को समाज में उचित स्थान नहीं मिल पाएगा और इससे अनेक अनर्थ होंगे, यह विचार कर उन्होंने उन सबसे स्वयम विवाह रचाया. इससे उनके समाज और स्त्रियों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार रखने का पता चलता है . पांडवों के राजसूय यज्ञ के समय श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों का पादप्रक्षालन कर स्वयं जूठे पत्तल उठाए . यह उनकी महानता का बेजोड़ उदाहरण है . 

किंवदन्तियो के अनुसार 124 वर्षों के जीवनकाल के बाद श्री क्रष्ण ने अपनी लीला समाप्त की और उनकी मृत्यु के तुरंत बाद ही कलियुग का आरंभ भी माना जाता है. महाभारत के बाद गांधारी के श्राप के दंश को झेल रहा कृष्ण का यदुवंश हकीकत में निर्दोष नजर आता है . गांधारी ने अपने सभी पुत्रो के महाभारत में परलोक सिधारने पर कुपित होकर कृष्ण और उनके यदुवंश को श्राप दिया था हालांकि गांधारी का यह श्राप बिलकुल औचित्यहीन नजर आता है .काश गांधारी अपने पुत्रमोह को त्यागकर अपने अन्यायी पुत्रो और कर्तव्य से विमुख ध्र्तराष्ट्र को पांड्वो के साथ हो रहे अन्याय के बारे में समझा पाती तो शायद इस महायुद्ध की नौबत ही न आती. आखिर पांच गाँव ही तो मांग रहे थे पांडव् किन्तु दुर्योधन का यह हठ कि पांच गाँव क्या सुई के नोक बराबर भूमि भी नही देंगे . ये सरासर अन्याय ही तो था . यही नहीं, भरी सभा में जब द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था तब गांधारी कहा थी ? इन सबके बावजूद कृष्ण ने अपनी कृष्णनीति से भरपूर प्रयत्न किया था कि युद्ध न हो ,किन्तु कौरव अपने अहंकार में चूर थे . वस्तुतः युद्ध तो श्री कृष्ण भी नही चाहते थे सम्भवतः इसीलिए उन्होंने पुरे युद्ध में कोई शस्त्र नही उठाया अलबत्ता वह अर्जुन के सारथी अवश्य बने रहे . लेकिन समझौते के अनुसार इसके बदले में दुर्योधन ने पहले ही उनकी चतुरंगिनी सेना को अपने साथ मांग लिया था . निश्चित ही गांधारी का यह श्राप उसके पुत्रमोह के पूर्वाग्रह से ग्रस्त था . उसके श्राप में निष्पछता का अभाव था किन्तु जगतगुरु ने उनकी मातृत्व की भावनाओ का सम्मान कर इस श्राप को भी स्वीकार किया . 

गंगा और यमुना भारत की ऐतिहासिक नदिया है . लेकिन आज दोनों ही नदिया प्रदूषित है . यमुना नदी तो श्री कृष्ण की लीलाओ की ऐतिहासिक धरोहर है किन्तु वही सबसे ज्यादा प्रदूषित है . क्या कृष्ण के तमाम अनुयायियों और उनके वंशजो ने कभी अपनी इस धरोहर को सहेजने पर विचार किया ? कृष्ण ने अपने अनेक रूपों से भारत की एकता और संस्क्रति को सम्रद्ध करने का संदेश दिया . उन्होंने यहाँ की गायो की रछा की तो यहाँ के जन -मन को आत्मा -परमात्मा का गूढ़ ज्ञान भी दिया . उन्होंने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन आत्मा पुराने शरीर को वैसे ही छोड़ देती है, जैसे मनुष्य पुराने कपड़ों को उतार कर नए कपड़े धारण कर लेता है. आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, ना ही इसे जलाया जा सकता है, ना ही पानी से गीला किया जा सकता है, आत्मा अमर और अविनाशी है. उनके इस गूढ़ ज्ञान को आज तक कोई झुठला नही सका है . बल्कि विज्ञान भी ऊर्जा के अविनाशी होने की बात का समर्थन करता है . माया-मोह में लिप्त नागरिको को आत्मा के स्वरूप और जीव के कर्मो के अनुसार उसके पुनर्जन्म का सिद्धांत बतलाकर श्री क्रष्ण ने म्रत्यु के भय को दूर किया . उन्होंने सत रज तम (त्रिगुण) की व्याख्या कर लोकजीवन को कल्याणकारी बनाया . एक कृष्ण ही है जिनमें कर्म के त्याग , सुख-दुख,शीत-उष्ण,जय-पराजय के समत्व के योग और सब भूतों में एक अव्यव भाव का सुरीला दर्शन किया जा सकता है . संसार में एकमात्र कृष्ण ही ऐसे व्यक्तित्व हुए जिन्होंने जीवन के दर्शन को भी गीत बना दिया . जीवन के हर छेत्र में कृष्ण उच्च मानवीय आदर्शो के प्रतीक है . मित्रता की बात हो तो कृष्ण -सुदामा की मित्रता का उदाहरण आज भी काफी जीवंत है . धैर्य और सहनशीलता का गुण देखना है तो देखिये कृष्ण ने शिशुपाल की 100 गलतिया तक नजरअंदाज की . सेवक के रूप में उन्होंने जूठे बर्तनों को धोना भी स्वीकार किया . इस प्रकार श्री कृष्ण का व्यक्तित्व और उनकी नीतिया समस्त मानवीय आदर्शो का भव्य संगम है . इसीलिए सम्पूर्ण विश्व उन्हें विश्वगुरु मानता है . 

कृष्णवाद कृष्ण के निष्काम प्रेम योग ,कर्मयोग , मित्रयोग , समत्व योग और अन्याय के खिलाफ युद्ध में कूटनीतियों का वह सम्मिश्रण है जिससे आज के दौर में समाज में बन्धुत्व और समत्व आ सकता है . जिसके फलस्वरूप समाज में एकता और पारस्परिक प्रेम उपजेगा. इससे भारत की गौरवमयी संस्क्रती का पुनर्जन्म होगा और राष्ट्र संगठित व सशक्त होगा . अन्याय और अधर्म का समूल नाश होगा . विश्व में शांति का शंखनाद होगा और भारत का सम्पूर्ण विश्व में गीतगान होगा . 


कृष्ण की पूजा वैष्णववाद का हिस्सा है, जो हिंदू धर्म की एक प्रमुख परंपरा है. कृष्ण को भगवान विष्णु का पूर्ण अवतार भी माना जाता है. सभी वैष्णव परंपराएं कृष्ण को विष्णु का आठवां अवतार मानती हैं; अन्य लोग विष्णु के साथ कृष्ण की पहचान करते हैं . जयदेव अपने गीतगोविंद में कृष्ण को सर्वोच्च प्रभु मानते हैं जबकि दस अवतार उनके रूप हैं. स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक स्वामीनारायण ने भगवान के रूप में कृष्ण को स्वीकार किया है .वही "वृहद कृष्णवाद" वैष्णववाद में , वैसुलिक काल के वासुदेव और वैदिक काल के कृष्ण और गोपाल को प्रमुख माना जाता है . श्री क्रष्ण ऐतिहासिक रूप से कृष्णवाद और वैष्णववाद में इष्ट देव के प्रारंभिक रूपों में से एक है. भारतीय नृत्य और संगीत थिएटर प्राचीन ग्रंथो जैसे वेद और नाट्यशास्त्र ग्रंथों को अपना आधार मानते हैं .हिंदू ग्रंथों में पौराणिक कथाओं और किंवदंतियों से प्रेरित कई नृत्यनाटिकाओ को और चलचित्रो को , जिसमें कृष्ण-संबंधित साहित्य जैसे हरिवंश और भागवत पुराण शामिल हैं ,अभिनीत किया गया है. कृष्ण की कहानियों ने भी भारतीय थियेटर, संगीत, और नृत्य के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, विशेष रूप से रासलीला की परंपरा के माध्यम से. कथक , ओडिसी , मणिपुरी ,कुचीपुड़ी और भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ तो कृष्ण-संबंधी प्रदर्शनों के लिए ही जाने जाते हैं. कृष्णाट्टम ( कृष्णट्टम ) ने अपने मूल को कृष्ण पौराणिक कथाओं के साथ रखा है और यह कथकली नामक एक अन्य प्रमुख शास्त्रीय भारतीय नृत्य रूप से जुड़ा हुआ है .वास्तव में श्री क्रष्ण और उनका जीवन भारत की संस्क्रती में रचा -बसा हुआ है . उनके विचार और तत्वज्ञान भारत के बाहर भी प्रकाशमान है . वह एक वैश्विक और दैवीय व्यक्तित्व है जिनमे सदियों से जनमानस की आस्था व्याप्त है . पूरे ब्रह्मांड में उनके भक्त आज भी विद्यमान है जिनकी आस्था क्रष्णवाद पर टिकी हुई है .

Friday, 7 June 2019

आत्मकथा : लालू प्रसाद यादव

1990 में बिहार में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अगले दिन से ही मैंने हेलीकॉप्टर से राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा शुरू कर दिया। मैं बहुत गरीब वर्ग से आया था और इस तबके से जुड़ना अच्छा लगता था। तकरीबन रोज मैं पटना से उड़ान भरता और हेलीकॉप्टर को चरवाहों, ताड़ी इकट्ठा करने वालों, मैला ढोने वालों, खेतिहर मजदूरों, मछुआरों और सुअर तथा मुर्गी पालने वालों के बीच उतारने को कहता था। उस समय इन लोगों के चेहरों पर जो चमक होती थी, उसे कभी नहीं भूला जा सकता। ऐसे मौकों पर मैं तुरंत उन्हें कुछ इस अंदाज में संबोधित करता- ‘ऐ गाय चराने वालों, ऐ बकरी चराने वालों, ऐ कपड़ा धोने वालों, ऐ सुअर पालने वालों, ऐ मैला ढोने वालों, ऐ बोझा ढोने वालों- पढ़ना-लिखना सीखो।’ मैंने ऐसी बूढ़ी औरतों को गले लगाने से गुरेज नहीं किया, जिनके कपड़े तार-तार थे, जिनकी आंखों में कीचड़ था। उनकी चिपचिपी आंखों को साफ कर मैंने उनसे कहा, मैं आपका बेटा हूं और आप मेरी मां हैं। मैं मुख्यमंत्री बन गया हूं। अब आपकी सेवा करूंगा। जब मैंने ऐसी औरतों को अपनी बांहों में लिया, तो वे रोने लगीं। ये खुशी के आंसू थे। मैंने शायद ही कभी पटना में दोपहर का भोजन किया। बिना किसी सुरक्षा कवच के मैं अक्सर गरीब खेतिहरों के बीच पहुंच जाता और उनसे सतुआ, नजदीक के तालाब से मछली और अनाज लाने के लिए कहता। गांव में यह मजेदार दावत होती। गरीब किसान आग जलाकर भात और मछली पकाते थे और हम सब मिलकर खाते थे। मैं प्रायः सोरठी-बिरिजाभार, चैता, बिरहा और होली गाने वाले लोक गायकों और संगीतकारों को तलाशता और झांझ और ढोलक के साथ उनकी संगत करता। जब तक मैं गांव में रहता, वहां जश्न का माहौल बन जाता। मैं उनमें घुलमिल जाता और उन्हें उखड़े हुए नाखून दिखाता। मैं उन्हें बताता कि मैं भी कभी गाय और भैंस चराता था।






























नई दिल्ली में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनने के कुछ महीने के भीतर ही सत्ता के दो केंद्र बन गए थे। प्रधानमंत्री वीपी सिंह और उप प्रधानमंत्री देवीलाल। इन दोनों नेताओं ने 1989 में राजीव गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार को बेदखल करने के लिए एकजुट होकर काम किया था, लेकिन अब एक-दूसरे को लेकर असहज हो गए थे। कुछ स्वार्थी तत्वों ने देवीलाल को वीपी सिंह के खिलाफ भड़काया, मानो वे राजीव गांधी की सत्ता के खिलाफ संघर्ष करने वाले साथी न होकर एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हों। मुझे चिंता होने लगी कि वीपी सिंह और देवीलाल के बीच बढ़ते तनाव से राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार गिर सकती है और इसका असर बिहार में मेरी सरकार पर भी पड़ सकता है। मैंने जनता पार्टी की सरकार को अंदरूनी झगड़े के कारण गिरते देखा था और नहीं चाहता था कि जनता दल का भी ऐसा हश्र हो। अगस्त, 1990 में वीपी सिंह की सरकार को बचाने के लिए मैंने एक फॉर्म्युला ईजाद किया। मैंने किसी भी केंद्रीय मंत्री को जरा-सी भी भनक न लगने देकर प्रधानमंत्री से मिलने के लिए समय मांगा और वह इसके लिए सहज तैयार हो गए। औपचारिकताओं के बाद मैंने उनसे दो टूक कहा, ‘आपको देवीलाल के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, वरना सरकार गिर जाएगी।’ वीपी सिंह अवाक रह गए। पहली बात, उन्होंने दूर-दूर तक भी कल्पना नहीं की थी कि मैं ऐसा कर सकता हूं। इसके अलावा वह जानते थे कि मैं देवीलाल कैंप का आदमी हूं, लिहाजा मेरी टिप्पणी से उन्हें धक्का लगा। उनका हैरत में पड़ना बहुत स्वाभाविक था कि आखिर मैं क्यों देवीलाल के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कह रहा हूं, जो कि मेरे हितैषी थे। मगर इसके साथ ही वह खुश हुए होंगे कि देवीलाल का एक कट्टर समर्थक उनके खेमे में आ रहा है।

वीपी सिंह तेज दिमाग और अच्छी राजनीतिक सूझबूझ वाले व्यक्ति थे। उन्होंने जवाब दिया, ‘देवीलाल जी जाटों और पिछड़ों के नेता हैं। यदि मैंने उनके खिलाफ कार्रवाई की तो वह देश भर में घूम सकते हैं और प्रचार कर सकते हैं कि मैं पिछड़ा विरोधी और गरीब विरोधी हूं।’ बेशक वह सही थे। लेकिन मैं भी पूरी तरह से तैयार था। मैंने कहा, ‘इसका भी एक रास्ता है। मंडल आयोग ने 1983 में अपनी रिपोर्ट दी थी, जिसमें उसने सरकारी नौकरियों में पिछड़ा वर्गों को 27 फीसदी आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की थी। उसकी सिफारिश आपके दफ्तर में धूल खा रही है। उसे तत्काल प्रभाव से लागू कीजिए।’ मेरा पक्का भरोसा था कि यदि ऐसा कर दिया गया तो यह कदम देवीलाल की ओर से वीपी सिंह को पिछड़ा विरोधी बताने के लिए किए जाने वाले किसी भी प्रचार को बेअसर कर देगा। प्रधानमंत्री इसके खिलाफ थे। संभवत: उनको भय था कि इसके फलस्वरूप समाज में बड़े पैमाने पर अशांति फैल सकती है। मैंने जोर देकर कहा कि मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने से उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत होगी और देवीलाल के खिलाफ उन्हें ताकत मिलेगी। मैंने वीपी सिंह से आग्रह किया कि वह बिना देर किए मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करें। आखिरकार वीपी सिंह सहमत लगे। इसके साथ ही मैंने कहा कि वह पहले मंत्रिमंडल की बैठक बुलाएं और बिना और सोचे रिपोर्ट को लागू करें। शरद यादव और राम विलास पासवान जैसे वरिष्ठ नेताओं को प्रधानमंत्री के साथ मेरी मुलाकात के बारे में पता नहीं था। इसके बाद मैंने उन्हें भरोसे में लिया और हैरत में पड़े इन नेताओं को बताया कि वीपी सिंह मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के लिए सहमत हो गए हैं। मेरे रवाना होने के बाद वीपी सिंह ने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई और तय किया गया कि रिपोर्ट लागू की जाएगी। वीपी सिंह ने एक विशेष संदेशवाहक के जरिए मेरे पास अधिसूचना की एक प्रति भिजवाई। मैंने उसे अपने ब्रीफकेस में रखा और पटना के लिए रवाना हो गया।

(लेखक: लालू यादव, पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार)
(साभार: लालू यादव की पुस्तक- ‘गोपालगंज से रायसीना)’