Friday, 27 March 2020

कोरोना : भ्रान्तिया और अफवाह



कोरोना जैसी महामारी ने लगभग सारी दुनिया भर में ही व्यापक कहर ढा रखा है और भारत में भी अपने पैर पसार चुकी है . वैश्विक संकट के इस समय में संयम , समझदारी और वैज्ञानिक द्र्ष्टिकोंन की अत्यंत आवश्यकता है . किन्तु देश -विदेश में कुछ लोग पर्याप्त जानकारी के अभाव में या कुछ स्वार्थो के कारण ही जनता के बीच भ्रामक और गलत जानकारिया परोस रहे है . 

भारत में अभी हाल फिलहाल तक गाय के मूत्र और गोबर से कोरोना के इलाज की बाते कई मंत्री और नेता स्वयम कह रहे थे . जिसके कारण सोशल मिडिया में ये मामला काफी सुर्खियों में रहा था . ध्यान रखिये इंडियन वायरोलॉजिकल सोसाइटी के डॉ शैलेंद्र सक्सेना के अनुसार "ऐसा कोई मेडिकल सबूत नहीं है, जिससे पता चलता हो कि गोमूत्र में एंटी-वायरल गुण होते हैं. वहीं गाय के गोबर का इस्तेमाल उल्टा भी पड़ सकता है. क्योंकि हो सकता है कि इसमें कोरोना वायरस हो जो इंसानों में भी आ सकता है." 

2018 से काउपैथी गाय के गोबर से बने साबुन के अलावा अल्कोहल-फ्री हैंड सैनिटाइजर ऑनलाइन बेच रही है, जिनमें देसी गायों का गोमूत्र मिलाया जाता है. फिलहाल ये ऑनलाइन आउट ऑफ स्टॉक दिखाया जा  रहा है. प्रोडक्ट के अनुसार "मांग बढ़ जाने की वजह से अब हम प्रति ग्राहक उत्पाद बेचने की सीमा तय कर रहे हैं, ताकि सभी ग्राहकों को यह उत्पाद मिल सके." वहीं दूसरी तरफ योग गुरु बाबा रामदेव ने एक हिंदी न्यूज़ चैनल पर लोगों को घर में ही हर्बल हैंड सैनिटाइजर बनाने की सलाह दे डाली है. उन्होंने कहा है कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी गिलोय, हल्दी और तुलसी के पत्तों के सेवन से कोरोना वायरस को रोकने में मदद मिल सकती है. 


लेकिन मित्रो विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमरीका के डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक़ अल्कोहल युक्त हैंड सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करना बेहद ज़रूरी है और लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन में प्रोफेसर सैली ब्लोमफिल्ड के मुताबिक भी कोई भी घर में बनाया गया सैनिटाइज़र कारगर नहीं होगा, क्योंकि वोडका तक में सिर्फ़ 40 प्रतिशत अल्कोहल ही होता है. 

यही नहीं कोरोना के नाम पर कुछ कारोबारी तो ये कहकर सामान बेच रहे हैं कि इससे कोरोना वायरस से बचा जा सकता है. उदाहरण के लिए 15 हज़ार रुपए में "एंटी कोरोना वायरस" गद्दे बेचे जा रहे हैं. इसके विज्ञापन अख़बारों में भी दिए गए थे . किन्तु विरोध होने पर निर्माता ने विज्ञापन हटा दिया है . 

इसी प्रकार कहा जा रहा है कि चाय पीकर कोरोना से बचा जा सकता है . दरअसल इसके पीछे चाय में मिथाइलज़ेन्थाइन्स नाम का एक तत्व का होना है जो कॉफी और चॉकलेट में भी मिलता है. चीन में भी फरवरी में इस तरह की कुछ रिपोर्ट आई थीं जिनमें दावा किया गया था कि चाय के इस्तेमाल से कोरोना वायरस को फैलने से रोका जा सकता है, लेकिन ये दावे सही नहीं है. 

कोरोना जैसी खतरनाक महामारी से बचने के लिए अफवाहों से बचना भी आवश्यक है . अत: किसी भी जानकारी पर विश्वास करने से पहले उसके तथ्यों की जांच अवश्य कर ले .

Sunday, 22 March 2020

चन्द्रमा का भाई :2020 सीडी3







































भारत में चन्द्रमा यानी चाँद (Moon) का अपना अलग धार्मिक महत्व है . विज्ञान उसे प्रथ्वी का उपग्रह मानता है लेकिन भारत के लोग चन्द्रमा को किसी देवता से कम नही मानते है . चन्द्रमा के साथ तो यहाँ की महिलाओ की हजारो साल से आस्थाए भी जुडी हुई है .दादा -दादी की बच्चो को चंदा मामा की कहानिया हो या यहाँ के ज्योतिषियों का ज्योतिष , चन्द्रमा का सम्बन्ध जन मानस की मनोभावनाओ से जुड़ चूका है . कही पर चाँद की सुन्दरता का पैमाना लिया जाता है तो कही -कही पर उसका जिक्र स्वभाव में नम्रता के साथ शांत मन के साथ किया जाता है . सदियों तक चन्द्रमा का वजूद कपोल -कल्पनाओ पर आधारित कहानियों और मान्यताओ पर चलता रहा . किन्तु 1969 में अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रोंग और उनके साथी के चन्द्रमा में पहुचते ही चन्द्रमा के तमाम रहस्यों से पर्दा उठ गया . इसके बाद चन्द्रमा के बारे में कई गुप्त जानकारिय उपग्रहों और कुछ अंतरिक्ष यानो द्वारा समय -समय पर उपलब्ध करवाई जाती रही है . 



अमेरिका ,रूस , चीन के साथ भारत भी चन्द्रमा के खोजी अभियान से जुड़ चूका है और इस दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है . वास्तव में विज्ञान ने प्रथ्वी के सुदूर स्थित इस उपग्रह के अंधेरो की पर्तो को भी हटा दिया है . अब बात केवल एक चन्द्रमा की ही नहीं रही बल्कि उससे जुदा एक और चन्द्रमा की भी होने लगी है . दरअसल हाल में ही अमेरिकी खगोलविदों, थियोडोर प्रूआइन और कैक्पर वीर्ज़कोज ने टास्कुन (एरिज़ोना) की माउंट लेमन ऑब्जरवेटरी में 1.52 मीटर (60 इंच) के टेलिस्कोप की मदद से एक ऐसे छोटे चन्द्रमा की खोज की है जो पिछले 3 साल से प्रथ्वी की परिक्रमा कर रहा है . इन खगोलविदों ने इस नए चन्द्रमा का नाम 2020 सीडी3 दिया है. 





















नारंगी रंग में नए चन्द्रमा 2020 सीडी3 का परिक्रमा पथ व सफेद रंग में मुख्य स्थाई चन्द्रमा का पथ2020 सीडी3, वास्तव में एस्टेरॉयड्स (क्षुद्रग्रहों) के एक ऐसे समूह का बहुत छोटा सा हिस्सा है जो स्थायी तौर पर सूरज और अस्थायी तौर पर धरती का चक्कर काटते हैं. खगोलविदों का कहना है कि नया चन्द्रमा 2020 सीडी3 इतना छोटा है कि यदि यह प्रथ्वी से टकरा भी जाए तो प्रथ्वी को इससे कोई नुकसान नहीं होगा. इस सम्बन्ध में क्षुद्र ग्रहों का अध्ययन करने वाली संस्था माइनर प्लैनेट सेंटर के अनुसार प्रथ्वी के पास एक और चांद है जो करीब 3 सालों से इसके चक्कर लगा रहा है. यह नया चंद्रमा हमारे पुराने चंद्रमा जितना बड़ा नहीं है और उतना चमकीला भी नहीं है. इसकी कुल माप मात्र 1 से 6 मीटर के बीच ही है और सम्भव है यह ज्यादा समय तक हमारे साथ भी नहीं रहेगा.

कहा जाता है कि इस तरह के मिनी-मून्स या छोटे-मोटे चंद्रमा आते-जाते रहते है और हो सकता है कि 2020 सीडी3 भी प्रथ्वी की अपनी आखिरी परिक्रमा ही कर रहा हो. एक अध्ययन बताता है कि हर समय इस तरह का कम से कम एक अस्थायी छोटा चंद्रमा प्रथ्वी का चक्कर लगा रहा होता है. आम तौर पर इनका साइज 1 मीटर से ज्यादा होता है और ये धरती की कम से कम एक परिक्रमा तो करते ही हैं. इनमें से किसी के भी लंबे समय तक न टिक पाने का कारण हमारे अपने चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल है. इससे पैदा हुए खिंचाव के चलते ही ये छोटे पिंड कुछ सालों बाद धरती का चक्कर लगाना छोड़कर फिर से सूर्य की परिक्रमा करने लगते हैं.




दरअसल प्रथ्वी के ये सभी कथित चंद्रमा ऐसे एस्टेरॉयड्स है जो सूर्य का एक चक्कर लगाने में 1 साल का वक्त लगाते हैं. ये प्रथ्वी के साथ-साथ सूर्य का भी चक्कर लगा रहे होते हैं. इन्हें प्रथ्वी का क्वासी सैटेलाइट यानी आभासी उपग्रह भी कहा जाता है क्योंकि ये हमसे हमारे मुख्य चंद्रमा के मुकाबले बहुत दूर होते हैं. 2016 एचओ3 इस तरह के उपग्रहों का सबसे अच्छा उदाहरण है. यह सूरज के साथ-साथ प्रथ्वी की परिक्रमा भी करता हुआ प्रतीत होता है.

वर्ष 2006 में इसी तरह के एक और पिंड आरएच120 को भी खोजा गया था. मात्र 2-3 मीटर व्यास वाले आरएच120 ने सितंबर 2006 से जून 2007 के बीच धरती के चार चक्कर लगाए थे. बाद में यह स्वतंत्र होकर, सुदूर सूरज की तरफ निकल गया. यह लगभग हर 20 साल बाद धरती के पास आता है और अगली बार 2028 में फिर से हमारे पास से गुजरेगा.

2020 सीडी3 अपने छोटे आकार के कारण प्रथ्वी के मुख्य चन्द्रमा का छोटा भाई जरुर बन सकता है किन्तु हमें इससे रात में किसी प्रकार की चांदनी की उम्मीद नही करनी चाहिए . सूरज और चाँद के बीच आने -जाने वाले इन छोटे ग्रहों पर अभी काफी खोज किया जाना बाकी है . लेकिन निष्कर्ष यह भी है कि प्रथ्वी के लिए केवल एक ही चन्द्रमा नही है .
(द ओपन यूनिवर्सिटी में प्लानेटरी जियोसाइंस के प्रोफेसर डेविड रोथरी के मूल लेख द कन्वर्सेशन पर आधारित ).































Tuesday, 31 December 2019

नया वर्ष और धरती की सुरछा






दुनिया के इनवायरमेंट वैज्ञानिको ने वर्ष 2030 को प्रथ्वी के बिगड़ते वातावरण को दुरुस्त करने हेतु अंतिम समय सीमा निर्धारित की है . अर्थात 2030 के बाद धरती के वातावरण को की गयी हानि फिर कभी दुरस्त नही हो सकेगी . जिसके लिए कम से कम 2010 से प्रयास किये जाने चाहिए थे . किन्तु अफ़सोस दुनिया भर में इन 10 वर्षो में कागजी खाना पूरी के सिवाय कुछ नही किया गया . 

अब 2020 आने को है और ये आने वाले 10 साल हमारे लिए अंतिम अवसर है . प्रथ्वी के वातावरण के बिगड़ने का ही दुष्प्रभाव है कि आज मौसम की चाल -ढाल बदल रही है . असहय गर्मी और असहय ठंड के कारण तमाम जीवधारियो की जान निकल रही है . विकास के नाम पर चल रहा प्राक्रतिक दोहन और वैश्विक बाजार का कचरा धरती की सत्ता को चुनौती दे रहा है .

धरती पर रहने वाले प्राणियों किसी गफलत में मत रहिये , समय रहते यदि प्रथ्वी और पर्यावरण को सुरछित नही किया गया तो सबका अंत निकट है . नए साल की खुशियों में अपनी सामाजिक और प्राक्रतिक जिम्मेदारियों को भी याद रखिये . धन्यवाद .

सभी साथियों और शुभचिंतको को नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाये .

Wednesday, 18 December 2019

प्रमुख राजनैतिक विचारक



























देश के राजनैतिक चिंतन और दर्शन में महात्मा गाँधी जी के बाद डा राम मनोहर लोहिया और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का भी विशिष्ट योगदान माना जा सकता है .

गाँधी जी के सिद्धांत सत्य ,अहिंसा और विशवास थे . वे जिस कांग्रेस के नेत्रत्व कर्ता थे उसका सम्बन्ध आजादी के आंदोलन से जुड़ा रहा . वह इस कांग्रेस को राजनैतिक दल के रूप में देखने के विरुद्ध थे . किन्तु प्रधानमंत्री नेहरु ने राजनैतिक कांग्रेस को खड़ा किया और यह राजनैतिक कांग्रेस लगभग 70 साल तक सत्ता से जुडी रही . इन 70 सालो में कांग्रेस के क्रिया कलापों और महात्मा गाँधी जी की उपर्युक्त सोच पर आज एक व्यापक चिन्तन किया जा सकता है .

देश के दुसरे राजनैतिक चिंतक डा राम मनोहर लोहिया जी की बात करे तो वह आज भी इस देश के आधे से ज्यादा लोगो के लिए अनजान व्यक्तित्व है . किन्तु डा लोहिया इस देश के सर्वश्रेष्ठ मौलिक चिंतक , साहित्यकार ,दार्शनिक , इतिहासकार ,स्वप्नद्रष्टा , स्वतन्त्रता सेनानी और राजनैतिक चिंतक थे . वास्तव में वह राजनीति से आगे सामाजिक और आर्थिक मामलो के भी गूढ़ विशेषग्य थे . वह समस्त भेदभाव के खिलाफ थे और देश काल की सीमाओ से परे विश्व नागरिकता के द्रष्टा थे . उन्होंने महात्मा गाँधी और मार्क्स के विचारो का संगम करते हुए भारत के सन्दर्भ में समाजवाद की अवधारणा प्रस्तुत की . डा लोहिया देश के लिए एक नई संस्क्रति और सभ्यता के जन्मदाता थे किन्तु उनके विचार इतने प्रखर और मौलिक है कि सम्भवतः देश के लोग उन्हें आत्मसात नही कर पाए .कांग्रेस को राजनैतिक दल बनाने की जिस मुहीम का महात्मा गाँधी ने शांतिपूर्ण विरोध किया था , डा लोहिया उसी कांग्रेस शासित सरकार की गांधीवाद की व्यावहारिकता पर सवाल उठाते नजर आये . इसमें कोई संदेह नही कि उनके विचारो ने देश के लोकतंत्र को काफी वक्त तक संजीवनी दी .

तीसरे राजनैतिक चिंतक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने चिन्तन में एकात्मवाद का विचार प्रस्तुत किया था . एकात्मता अर्थात अनेक विषमताओ पर समदर्शी विचार .उनका मानना था कि समाज और व्यक्ति में परस्पर संघर्ष पतन का कारण है और इससे संस्क्रति का हास होता है . एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि भारतवर्ष विश्व में सर्वप्रथम रहेगा तो अपनी सांस्कृतिक संस्कारों के कारण. उन्होंने कहा था कि मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा ये चारों अंग ठीक रहेंगे तभी मनुष्य को चरम सुख और वैभव की प्राप्ति हो सकती है. जब किसी मनुष्य के शरीर के किसी अंग में कांटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है, बुद्धि हाथ को निर्देशित करती है कि तब हाथ चुभे हुए स्थान पर पल भर में पहुँच जाता है और कांटे को निकालने की चेष्टा करता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. सामान्यत: मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चारें की चिंता करता है. मानव की इसी स्वाभाविक प्रवृति को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद की संज्ञा दी थी .

उनके अनुसार संस्कृति किसी काल विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के बन्धन से जकड़ी हुई नहीं है, अपितु यह तो स्वतंत्र एवं विकासशील जीवन की मौलिक प्रवृत्ति है. इस संस्कृति को ही हमारे देश में धर्म कहा गया है. जब हम कहते हैं कि भारतवर्ष धर्म-प्रधान देश है तो इसका अर्थ मजहब, मत या रिलीजन नहीं, अपितु यह संस्कृति ही है.दीनदयाल जी का मानना था कि भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा . भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी. उनके अनुसार विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं, राजनीति अथवा अर्थनीति की नहीं.

किन्तु 52 वर्ष की आयु में 11 फ़रवरी 1968 को मुग़लसराय के पास रेलगाड़ी में यात्रा करते समय पंडित दीनदयाल जी की दुखद हत्या कर दी गयी .जिसकी गुत्थी आज भी अल्सुल्झी हुई है .

फिलहाल देश की राजनीति की दिशा आज जिस तरफ जा रही है , उस सन्दर्भ में इन तीनो महापुरुषों के प्रमुख विचारो को जानना बेहद आवश्यक हो गया है .

Saturday, 16 November 2019

1962 का रेजांगला युद्ध और अहीर रेजिमेंट की मांग


1962 के भारत -चीन युद्ध ने उस दौरान भारत की सबसे कमजोर सैन्य रणनीति और तत्कालीन अदूरदर्शी राजनैतिक नेत्रत्व का अत्यंत दुखद अहसास करवाया था . तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु का पंचशील और 'हिंदी -चीनी भाई -भाई ' का सिद्धांत धरा का धरा रह गया और धोखेबाज चीन ने मौके का फायदा उठा कर भारत से विश्वासघात कर दिया था .इस विनाशकारी युद्ध के परिणाम देश की सेना ही नहीं वरन प्रधानमन्त्री नेहरु के लिए भी इतने घातक रहे कि वह इस अपमानजनक  युद्ध के लगभग 2 साल बाद 1964 में ही परलोक चल बसे . हालाँकि ऐसा नहीं था कि उन्हें चीन से चल रहे सीमा विवाद और चीन की महात्वाकान्छाओ के बारे में किसी राजनेता ने चेताया नहीं था . कहा जाता है कि उस समय विपछ के प्रमुख नेता रहे डा राम मनोहर लोहिया ने भी चीन के नापाक इरादो के बारे में नेहरु जी को कई बार सचेत किया था किन्तु प्रधानमंत्री नेहरु अति आत्मविश्वास और 'हिंदी -चीनी भाई -भाई' की अपनी सोच से बाहर नहीं निकल सके.


लगभग 18000 फीट से ज्यादा की ऊंचाई वाले बर्फीले इलाके वाले इस युद्ध में चीनी सेना ने 20 अक्टूबर 1962 को पूर्व में तवांग एवं पश्चिमी क्षेत्र में चुशूल स्थित रेजांग-ला पर सैन्य हमला किया था तथा भारी तबाही करने के बाद 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा की गयी थी . चीन की बड़ी सेनाओ (जिनमे 3 रेजिमेंट शामिल थी ) के सामने भारतीय फ़ौज की कम्पनियों की संख्या काफी कम थी . इस युद्ध का एक अहम पहलू यह भी था कि दोनों देशो ने अपनी वायु सेना का प्रयोग इस युद्ध में बिलकुल भी नहीं किया था . जबकि कुछ अमेरिकी सैन्य विश्लेषको के अनुसार भारत को अपनी वायु सेना का प्रयोग इस युद्ध में अवश्य करना चाहिए था .सम्भवतः 1962 के इस युद्ध में भारत की कमजोर स्थिति को भांपकर पाकिस्तान ने भी 1965 में भारत पर एक और आक्रमण करने का दुस्साहस कर डाला लेकिन उसे पहले की तरह ही फिर से मुह की खानी पड़ी थी . सैन्य विश्लेशको के अनुसार पाकिस्तान को इस युद्ध में चीन का परोछ समर्थन भी हासिल था . 


1962 के इस बड़े युद्ध में देश को मिली हार के कारणों की जांच हेतु एक समिति बनाई गयी थी जिसका जिम्मा ले. जनरल हेंडरसन ब्रुक्स तथा इंडियन मिलिट्री एकेडमी के तत्कालीन कमानडेंट ब्रिगेडियर प्रेमिन्दर सिंह भगत को प्राप्त हुआ था .लेफ्टिनेंट जनरल एंडरसन ब्रूक्स तथा ब्रिगेडियर पीएस भगत ने 1962 के इस युद्ध से संबंधित दस्तावेजों तथा परिस्थितियों की जांच की और 1963 में इस जांच रिपोर्ट को प्रधानमंत्री नेहरू तथा उनके कुछ अन्य वरिष्ठ मंत्रियों को सौंप दिया था . किन्तु कहा जाता है कि यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट कभी भी सार्वजनिक नहीं हो पाई क्योंकि इस रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमन्त्री नेहरु जी की लापरवाहियो की तरफ भी उंगलिया उठ रही थी . वास्तव में प्रधानमन्त्री नेहरु जी का सम्पूर्ण कार्यकाल कश्मीर मुद्दा और चीन के साथ 1962 के इस युद्ध के कारण काफी आलोचना का विषय बन चूका है . दरअसल 1962 के इस युद्ध में मिली सैन्य विजय से चीन को भले ही कुछ लाभ हुआ था किन्तु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि एक विश्वासघाती राष्ट्र के रूप में भी बन गई थी . इससे दुनिया के अनेक देश चीन की सीमा विस्तार और साम्राज्यवादी सोच के प्रति सतर्क हो गये . हालाँकि भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन के खिलाफ इस विश्वासघाती कदम पर कोई बड़ा माहोल नहीं बना सका और चीन द्वारा कब्जाई गयी हजारो वर्ग किलोमीटर की अपनी जमींन को भी वापस नहीं पा सका था . उधर इस युद्ध से चीनी सेनाओ को कितना दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक लाभ हुआ इसका नजारा हाल -फ़िलहाल में तब नजर आया जब कुछ महीने पहले डोकलाम पर ढाई महीनों तक चले गतिरोध के दौरान चीनी सैनिको ने भारतीय सैनिको पर तंज कसा कि लगभग 4 -5 दशक पूर्व 1962 के युद्ध में उन्होंने उनकी क्या दुर्दशा की थी. लेकिन ये चीनी सैनिक तंज कसते हुए 1962 के ही चुशूल स्थित रेजांग ला के उस महत्वपूर्ण युद्ध को बिलकुल ही भूल गए थे जिसमे उनके हजारो सैनिको को 13 कुमायूं रेजिमेंट के 124 भारतीय सैनिको ने किस तरह गाजर –मूली की तरह काट डाला था .


दरअसल सन 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान 13 कुमायूं रेजिमेंट की चार्ली कम्पनी को चुशूल क्षेत्र में तैनात किया गया था. चुशूल चीनी सीमा से 15 किलोमीटर दूर हिमालय के पहाडो में लगभग 18000 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक छोटा सा गाँव है. यह ऊंचे ग्लेशियरों से घिरा हुआ एक सुनसान पहाड़ी इलाका है जहां हर मौसम में लैंडिंग के लिए उपयुक्त एक हवाई पट्टी भी बनी हुई है. चुशूल घाटी के दक्षिण-पूर्व दिशा में कुछ मील की दूरी पर रेजांग ला नामक एक पहाड़ी दर्रा है, जो देश की सुरक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है . 13 कुमायूं रेजिमेंट की अहीर चार्ली कंपनी को यही पर रेजांग ला में तैनात किया गया था जिसके जिम्मे चुशूल की इसी महत्वपूर्ण हवाई पट्टी की सुरछा थी . 13 कुमायू रेजीमेंट की इस अहीर चार्ली कम्पनी का नेत्रत्व मेजर शैतान सिंह कर रहे थे जिसमे मेजर शैतान सिंह और 2-3 जवानो के अतिरिक्त बाकी सभी सैनिक अहीर थे जो मुख्य रूप से हरियाणा और राजस्थान के आस -पास के निवासी थे . दरअसल 'अहीर' शब्द संस्कृत के 'अभीर' शब्द का अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है "न डरने वाला' अर्थात निडर. इस असाधारण ऊंचाई वाले मोर्चे पर इन अहीर भारतीय सैनिको ने महत्वपूर्ण तरीके से अपनी पोजीसन ले रखी थी. सभी सैनिको ने वहा अच्छे मोर्चे बना लिए थे किन्तु उनके पास चीनी सैनिको को रोकने के लिए न तो कोई बारूदी सुरंग बिछाने का प्रबन्ध था और न ही कमांड पोस्ट की सुरक्षा हेतु उन्नत किस्म के हथियार ही उपलब्ध थे . 

आखिरकार 17 -18 नवम्बर की वह रात्रि आ ही गई जब वहां का तापमान शून्य से 15 डिग्री सेल्सियस नीचे था. यह असाधारण एवं खून जमा देने वाली कड़ाके की ठण्ड थी. इसी दौरान रात्रि 10 बजे तेज बर्फीला तूफान आया जो लगभग 2 घंटे तक चलता रहा . इससे ठंड और ज्यादा बढ़ गयी . हमारे सभी भारतीय सैनिक मैदानी क्षेत्र से लाकर वहां तैनात किये गए थे जाहिर है वे सब इस तरह की बर्फीली ठण्ड में रहने के अभ्यस्त भी नहीं थे. इससे भी बड़ी समस्या यह थी कि इनके पास पहाड़ी-ठण्ड से बचने के लिए उपयुक्त वर्दी भी नहीं थी. 18 नवम्बर 1962 को रविवार का दिन था और देश में दीपावली का त्योहार भी मनाया जा रहा था . सारा देश जहा दीपावली का जश्न मना रहा था तब 13 कुमायु रेजिमेंट के अहीर चार्ली कम्पनी के ये मुट्ठी भर भारतीय सैनिक विषम परिस्थियों में प्राणों की बाजी लगाकर मातृभूमि की रक्षा के लिए खून की होली खेल रहे थे. अंततः सुबह 5 बजे पौ फटने से पहले चीनी सैनिको ने रेजांग ला की चौकी पर भीषण हमला कर दिया लेकिन वीर भारतीय सैनिको ने जबरदस्त जवाबी कार्रवाई करते हुए उस हमले को विफल कर दिया. यह जबरदस्त लड़ाई कई घंटों तक चली और इसमें चीनी सैनिको को काफी नुक्सान हुआ था . उनके सैकड़ो सैनिक मारे गये और बहुत से घायल भी हुए थे . कहा जाता है कि भारतीय सैनिको की गोलीबारी से इस रणछेत्र की नालियाँ चीनी सैनिको की लाशों से भर गईं थी . इस हमले के विफल हो जाने पर थोड़ी देर बाद चीनी फ़ौज़ ने पुनह एक और जबरदस्त हमला किया, लेकिन इस बार भी उनका वही हश्र हुआ . इन 124 वीर भारतीय सैनिको ने चीन के इस हमले को भी विफ़ल कर दिया था . 


अब तक दो बार मुह की खाने के बाद चीनी सेना ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और चारो ओर से भारी मशीन गन, मोर्टार, ग्रेनेड आदि के साथ भारतीय सैनिको पर भीषण हमला बोल दिया. किन्तु चीनी सेना को आगे बढ़ते हुए पिछले दो प्रयासों के दौरान मारे गये अपने ही सैकड़ो चीनी सैनिकों की लाशो पर से गुजरना पड़ा .भारतीय सैनिक चीनियों की अपेक्षा जहाँ संख्या में बहुत कम थे वहीं उनके हथियार और गोला बारूद भी अपेक्षाकृत कम उन्नत थे फ़िर भी वे बड़ी वीरता के साथ डट कर लडे. गोला बारूद समाप्त हो जाने पर भी भारतीय जांबाजो ने हार नहीं मानी . ये अपने मोर्चे और चौकियो से बाहर निकल आये तथा निहत्थे ही चीनी सैनिकों पर टूट पड़े. चीनी फ़ौज़ का जो भी सैनिक मिला उसे पकड़ लिया और चट्टान पर पटक - पटक कर मार डाला गया . इस प्रकार विषम परिस्थितियों मे प्राकृतिक बाधाओं के खिलाफ रेजांग-ला की इस लडाई मे भारतीय वीर जवान आखिरी गोली, खून की आखिरी बूँद और आखिरी सांस तक लडते रहे. युद्ध में इन वीरो की कंपनी के 124 में से 114 अहीर जवान शहीद हो गये थे . किन्तु इस लड़ाई में चीन की सेना का भी बहुत ज्यादा नुक्सान हुआ था.कहा जाता है कि इस लड़ाई में 114 वीर अहीर सैनिको ने अपने प्राणों की आहुति देते हुए चीनी सेना के लगभग 1300 सैनिको को मौत की नीद सुला दिया था .



13 कुमायूं रेजिमेंट की इस बहादुर कंपनी के इन 114 वीरों की याद में चुशूल से 12 किलोमीटर की दूरी पर एक स्मारक बनाया गया जिसमे सभी वीर सैनिकों के नाम अंकित हैं जिसे 'अहीर धाम' के नाम से भी जाना जाता है . वास्तव में 1962 की इस लड़ाई में चीन के साथ युद्ध में भारतीय सेना को जहां कई मोर्चो पर हार का सामना करना पड़ा, वहीं लद्दाख के चुशूल सेक्टर में उसने ऐसा इतिहास रचा कि भारी प्रयासों के बाद भी चीनी सैनिक रेजांगला पर कब्जा नहीं कर पाए. प्रसिद्ध कवि प्रदीप और स्वर कोकिला लता मंगेशकर के गाये गीत ‘ए मेरे वतन के लोगो’ की पंक्ति ‘जब देश में थी दिवाली, वो खेल रहे थे होली, जब हम बैठे थे घरों में, वो झेल रहे थे गोली’ रेजांगला के इन्ही वीर अहीर शहीदों को समर्पित कर लिखा गया था. किन्तु इस गीत की पंक्तियों में 'कोई सिख कोई जाट मराठा कोई गोरखा कोई मद्रासी' में इन वीर अहीरों का जिक्र कही नही हुआ, इससे अहीर समुदाय को काफी ठेस पहुची और वे अपने स्वाभिमान और वीरता की पहिचान के लिए सेना में 'अहीर रेजिमेंट' की मांग कर बैठे . दरअसल अंग्रेजो के समय से ही भारतीय थल सेना की लगभग सभी भर्तिया जाति /क्षेत्र और धर्म के आधार पर होती है .जैसे गढ़वाल रेजिमेंट में सिर्फ गढ़वाली ही भर्ती किये जातें हैं, डोगरा रेजिमेंट में सिर्फ डोगरा भर्ती किये जाते हैं , सिख रेजिमेंट में सिर्फ सिख भर्ती किये जाते हैं . इसी प्रकार जाट , राजपूत , महार , सिख लाइट इन्फेंट्री , मराठा , डोगरा नाम की रेजिमेंट जाति आधारित और राजपुताना राइफल्स, गढ़वाल राइफल्स , कुमाऊ , मद्रास आदि क्षेत्र आधारित रेजिमेंट हैं . एक प्रकार से यह भी जाती और धर्म आधारित आरक्षण ही है जबकि भारतीय सविंधान या किसी न्यायालय से सेना में ऐसे आरक्षण का कोई प्राविधान नहीं है . फिर भी यदि जाति आधारित यह व्यवस्था चल ही रही है तो इसमें अहीर समुदाय को समुचित प्रतिनिधित्व न दिया जाना इस बिरादरी के शहीदों और उनकी शहादत का भी घोर अपमान है . हरियाणा का अहिरवाल छेत्र तो सदियों से अहीरों की वीरता के किस्सों के लिए मशहूर रहा है . महाभारत के समय में भी यदुकुल शिरोमणि श्री क्रष्ण भगवान की नारायणी सेना ने युद्ध में अपने महान शौर्य का प्रदर्शन किया था . कहा तो यह भी जाता है कि अहीरों की वीरता के कारण प्राचीन समय में कई राज्यों के सेनापतियो का पद सिर्फ अहीरों के लिए ही आरक्षित रहता था . वर्तमान समय में अहीर रेजिमेंट की मांग दिनोदिन तेज होती जा रही है . अहीर समुदाय के अनेक नेताओ और सामाजिक कार्यकर्ताओ ने अपनी इस मांग को महामहिम राष्ट्रपति महोदय तक पहुचाया हुआ है . जिसमे मुख्य रूप से राष्ट्रीय यादव संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मंगलेश यादव भी शामिल है . इस मुद्दे की प्रासंगिकता के कारण अब कुछ राजनैतिक पार्टिया भी इसे अपने राजनैतिक एजेंडे में शामिल करती नजर आ रही है . 1962 का चीन युद्ध हालांकि देश के लिए एक बड़ी हार ही है किन्तु जिस प्रकार रेजांगला के इन 114 वीर सैनिको ने अपनी जान पर खेलकर चीन के हजारो सैनिको को मौत की नीद सुला दिया था , यह भारत के इतिहास में वीरता की एक अनुपम मिशाल भी है . चीन से लगती सीमा पर आज भी विवाद होता ही रहता है ऐसे समय में रेजांगला की यह शौर्य गाथा चीन के लिए एक सबक भी होनी चाहिए . 1962 के युद्ध के इन सभी वीर शहीदों के लिए साहिर लुधियानवी के शब्दों में कहा जा सकता है कि , हजार बर्फ गिरे लाख आंधिया उड़े वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले है . 



13 कुमाऊं रेजीमेंट के शौर्य व पराक्रम पर लिखा गया गीत ‘वो झेल रहे थे गोली’