Saturday, 5 May 2018

कार्ल मार्क्स



जर्मन दार्शनिक व अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स का नाम किसी पहचान का मोहताज नही है . जो लोग अन्याय, गैर-बराबरी और शोषण को खत्म होते देखना चाहते हैं उनके लिए आज का दिन यानी 5 मई बहुत ही ख़ास है. इस दिन कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ था और आज उनका 200वां जन्मदिन है.


मार्क्स के क्रांतिकारी विचारो का ही ये परिणाम था कि सोवियत संघ, साम्यवादी चीन, पूर्वी यूरोप सहित दुनिया भर में समाजवादी क्रांतियों से अनेक समाजवादी सरकारों का गठन हुआ. हालांकि मार्क्स की आदर्श परिकल्पना को ये समाजवादी सरकारे हकीकत में नही बदल सकी जिसके फलस्वरूप धीरे -धीरे दुनियाभर में समाजवाद कमजोर होता गया .इसके बावजूद आज भी कई देशो में समाजवादी सरकारे शासन चला रही है . 

मार्क्स ने आम जनता का चिन्तन कर अनेक राजनैतिक और आर्थिक विचारधाराए प्रस्तुत की . उन्होंने वैज्ञानिक समाजवाद के साथ वर्ग संघर्ष की व्याख्या भी प्रस्तुत की . 'दास कैपिटल ' पूंजीवाद पर लिखी उनकी एक सर्वोत्तम पुस्तक है . मार्क्स ने उस सर्वग्राही पूंजीवाद के ख़िलाफ़ दार्शनिक तरीक़े तर्क रखे, जिसने पूरी मानव सभ्यता को ग़ुलाम बना लिया. उन्होंने पूंजीवादी समाज में 'वर्ग संघर्ष' की बात की है और बताया है कि कैसे अंततः संघर्ष में सर्वहारा वर्ग पूरी दुनिया में बुर्जुआ वर्ग को हटाकर सत्ता पर कब्ज़ा कर लेगा. वास्तव में 20वीं शताब्दी में मज़दूरों ने रूस, चीन, क्यूबा और अन्य देशों में शासन करने वालों को उखाड़ फेंका और निज़ी संपत्ति और उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लिया. मजदूरों के हितो की लड़ाई लड़ते हुए सन 1864 में लंदन में 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' की स्थापना में भी मार्क्स ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी .

मार्क्स का मानना था कि बाज़ार को चलाने में किसी अदृश्य शक्ति की भूमिका नहीं होती. बल्कि वो कहते हैं कि मंदी का बार बार आना तय है और इसका कारण पूंजीवाद में ही निहित है.मार्क्स के सिद्धांत का एक अहम पहलू है- 'अतिरिक्त मूल्य.' ये वो मूल्य है जो एक मज़दूर अपनी मज़दूरी के अलावा पैदा करता है. मार्क्स के मुताबिक़, समस्या ये है कि उत्पादन के साधनों के मालिक इस अतिरिक्त मूल्य को ले लेते हैं और सर्वहारा वर्ग की क़ीमत पर अपने मुनाफ़े को अधिक से अधिक बढ़ाने में जुट जाते हैं. इस तरह पूंजी एक जगह और कुछ चंद हाथों में केंद्रित होती जाती है और इसकी वजह से बेरोज़गारी बढ़ती है और मज़दूरी में गिरावट आती जाती है. 

साल 1848 में, जब कार्ल मार्क्स कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिख रहे थे, तब उन्होंने बाल श्रम का जिक्र किया था. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ के साल 2016 में जारी आंकड़ों के मुताबिक आज भी दुनिया में 10 में से 1 बच्चा बाल श्रमिक है. आज यदि बहुत सारे बच्चे कारखाना को छोड़कर स्कूल जा रहे हैं तो यह कार्ल मार्क्स की ही देन है. मार्क्स के अनुसार अधिकांश समय आपको आपकी मेहनत के हिसाब से पैसे नहीं दिए जाते और आपका शोषण किया जाता है .इसलिए मार्क्स चाहते थे कि हमारी ज़िंदगी पर हमारा खुद का अधिकार हो, हमारा जीना सबसे ऊपर हो. वो चाहते थे कि हम आज़ाद हो और हमारे अंदर सृजनात्मक क्षमता का विकास हो.उन्होने अन्याय और भेदभाव से लड़ने के लिए एकजुट होकर संगठित विरोध करने की बात कही . 19वीं शताब्दी में. हालांकि उस समय सोशल मीडिया नहीं था फिर भी वो पहले शख़्स थे जिन्होंने इस तरह के सांठगांठ की व्याख्या की थी.उन्होंने उस समय सरकारों, बैंकों, व्यापारों और उपनिवेशीकरण के प्रमुख एजेंटों के बीच सांठगांठ का अध्ययन किया. कार्ल मार्क्स ने मीडिया की ताक़त महसूस की थी. लोगों की सोच प्रभावित करने के लिए यह एक बेहतर माध्यम था. इन दिनों हम फेक़ न्यूज़ की बात करते हैं, लेकिन कार्ल मार्क्स ने इन सब के बारे में पहले ही बता दिया था. 

मार्क्स का कहना था ,दार्शनिकों ने अब तक दुनिया की व्याख्या की है जब कि सवाल उसे बदलने का है. दुनिया भर में मानवता के लिए वैचारिक क्रांति के बीज बोने वाले कार्ल मार्क्स ने 14 मार्च 1883 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया .

Monday, 16 April 2018

हास्य अभिनय के बेताज बादशाह -चार्ली चैपलिन
















पूरी दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन की शानदार अदाकारी पर अपनी हंसी रोक पाया होगा. चार्ली चैपलिन एक ऐसी शख्सियत का नाम है जिसने पूरी दुनिया के लोगो को अपनी अदाकारी से खूब हंसाया . जिस किसी ने भी चार्ली चैपलिन की फिल्मो को देखा होगा वह अपनी जिन्दगी का कुछ वक्त तो जरुर ही दुःख दर्द को भूल ही गया होगा . 



लोकप्रिय कलाकार चार्ली चैपलिन का जन्म 16 अप्रैल 1889 को लंदन में हुआ था. उनका असली पूरा नाम चार्ल स्पेंसर चैपलिन था. उनके पिता एक गायक और अभिनेता थे और उनकी माँ, एक गायक और अभिनेत्री थी. चार्ली चैपलिन के माता-पिता में तालमेल न होने के कारण उनके बचपन में ही उन दोनों को अलग होना पड़ा . इसके पश्चात उनकी मां ने अपना मानसिक संतुलन भी खो दिया . विषम पारिवारिक हालातो में आगे चल कर 13 साल की उम्र में चार्ली चैपलिन की पढ़ाई भी छूट गई.
























चार्ली चैपलिन ने बेहद कम उम्र में ही स्टेज ऐक्टर और कमीडियन के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था. बाद में, महज 19 साल की उम्र में उन्हें एक अमेरिकन कंपनी ने साइन कर लिया और वह अमेरिका चले गए. अमेरिका से चार्ली ने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की और 1918 तक आते-आते वह पूरी दुनिया भर में काफी लोकप्रिय हो चुके थे. 

चार्ली चैपलिन की पहली फिल्म "मेकिंग अ लिविंग' 1914 में आई ', ये फिल्म एक साइलेंट फिल्म थी. इसके बाद उनकी पहली फुल लेंग्थ फीचर फिल्म 'द किड' 1921 में आई थी. चार्ली ने अपने जीवन में दोनों विश्व युद्ध देखे थे और जिस समय दुनिया युद्ध की विभीषिका झेल रही थी तब वह लोगों को हंसा रहे थे. चार्ली चैपलिन ने एक बार कहा था, 'मेरा दर्द किसी के हंसने की वजह हो सकता है, पर मेरी हंसी कभी भी किसी के दर्द की वजह नहीं होनी चाहिए.'



















साल 1940 में आई उनकी फिल्म 'द ग्रेट डिक्टेटर' काफी विवादों में रही थी. इस फिल्म में चार्ली ने अडोल्फ हिटलर का किरदार निभाया था. बाद में अमेरिका में उनके ऊपर कम्यूनिस्ट होने के आरोप भी लगाए गए और उनके ऊपर FBI की जांच बिठा दी गई. इसके बाद चार्ली चैपलिन ने अमेरिका छोड़ दिया और स्विट्जरलैंड में जाकर बस गए थे . 

चार्ली चैपलिन का पारिवारिक जीवन भी काफी उतार -चढाव से भरा रहा . उन्होंने अपनी जिंदगी में कुल 4 शादियां की थीं. इन शादियों से उनके 11 बच्चे थे. उन्होंने पहली शादी 1918 में मिल्ड्रेड हैरिस से की थी लेकिन यह शादी 2 साल ही चली. इसके बाद उन्होंने लिटा ग्रे, पॉलेट गॉडर्ड और 1943 में 18 साल की उना ओनील से शादी की. उस समय चार्ली 54 साल के थे. चार्ली की ये शादियां काफी विवादों के घेरे में रही थीं.

मशहूर साइंटिस्ट अल्बर्ट आइंसटीन और ब्रिटेन की महारानी के साथ -साथ दुनिया भर के तमाम महत्वपूर्ण लोग चार्ली चैपलिन के प्रशंसक थे. हालांकि खुद चार्ली भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महानायक महात्मा गांधी जी से काफी प्रभावित थे. इसलिए वह महात्मा गांधी का बहुत सम्मान करते थे.


















पूरी दुनिया को हंसाने वाले इस हंसी के जादूगर चार्ली चैपलिन की म्रत्यु 25 दिसम्बर 1977 में हुई . कहा जाता है कि मृत्यु के बाद कुछ लोगों ने उनका शव ही चुरा लिया था. उनका शव उनके परिवार से फिरौती मांगने के उद्देश्य से चुराया गया था. किन्तु बाद में उनका शव बरामद कर लिया गया और पुनह चोरी से बचाने के लिए उसे 6 फीट कंक्रीट के नीचे दफनाया गया.
















चार्ली चैपलिन हास्य अभिनय की दुनिया के सबसे प्रसिद्ध कलाकारों में से एक होने के अलावा अमेरिकी सिनेमा के एक महत्वपूर्ण फिल्म निर्माता और संगीतकार भी थे. वह मूक फिल्म युग के सबसे रचनात्मक और प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक थे जिन्होंने अपनी फिल्मों में अभिनय, निर्देशन, पटकथा, निर्माण और अंततः संगीत तक दिया. 





Sunday, 18 February 2018

राम क्रष्ण परमहंस



स्वामी राम क्रष्ण परमहंस को संतो की उस श्रेणी में रखा जा सकता है जो असाधारण होते हुए भी समाज के सबसे साधारण व्यक्ति बन कर जिए . ऐसे संतो को उनके प्रतिभाशाली शिष्यों ने देश -दुनिया को बताया अन्यथा उन्हें खुद को प्रसिद्धि दिलाने की कोई चाहत तक नही थी . मसलन सुकरात को प्लेटो , रामानन्द को कबीर और इसी तरह राम क्रष्ण को स्वामी विवेकानन्द जैसे शिष्यों के कारण दुनिया ने बेहतर तरीके से समझा . 


राम क्रष्ण ने धर्म के छेत्र में अनेक प्रयोग किये थे .वह ईश्वर को देखना और महसूस करना चाहते थे . जिसके लिए उन्होंने हिन्दू , मुस्लिम और ईसाई सभी धर्मो के मन्दिर मस्जिद चर्च में जाकर पूजा -अर्चना की . यहाँ तक उन्होंने ईश्वर की एकरूपता को मानकर कभी 5 वक्त की नमाज भी पढ़ी .

ईश्वर को जानने के लिए उनका व्यवहार पागलपन तक पहुच जाता था . जिन्दा रहते ईश्वर प्राप्ति के लिए ही एक बार उन्होंने जन्म से ब्राह्मण होने के अपने अहंकार को नष्ट करने के लिए भी एक प्रयोग किया. वह तत्कालीन समाज में कथित अछूत माने जानेवाले एक परिवार में पहुंचे और उनके घर दासों की तरह सारा काम करने की आज्ञा मांगने लगे. उस परिवार ने भारी पाप लगने के डर से उन्हें ऐसा नहीं करने दिया. लेकिन जब उस परिवार के लोग रात को सो जाते, तो रामकृष्ण उनके घर में घुस जाते और अपने बड़े-बड़े बालों से ही सारा घर झाड़-बुहार डालते थे
.


अपनी साधना और तपस्या से रामकृष्ण को वेदांत के माध्यम से यह समझ में आया कि सारे जीव आत्मतत्व हैं और आत्मा के बीच लिंग का कोई भेद नहीं है. अर्थात स्त्री-पुरुष का भेद तो केवल शरीर के स्तर पर ही है, आत्मा के स्तर पर नहीं. लेकिन यह भी अजीब बात है कि ईश्वर की कल्पना और बाद में उसकी अनुभूति रामकृष्ण ने महिला के रूप में ही की थी . उनके मुंह से जगदम्बा और मां जैसे संबोधन ही निकलते थे. कहते है अपनी पत्नी सारदामणि को भी वे मां ही कहा करते थे. इन दोनों का जब विवाह हुआ था तो रामकृष्ण 22 साल के थे और सारदामणि 5 साल कीं. यानी रामकृष्ण से 17 वर्ष छोटी थी .

रामकृष्ण के सबसे प्रिय शिष्य स्वामी विवेकानंद ने न्यूयॉर्क की एक सभा में अपने गुरु के बारे में एक ओजपूर्ण व्याख्यान दिया था, जो बाद में ‘मेरे गुरुदेव’ के नाम से प्रकाशित भी हुआ था . विवेकानंद ने इसमें कहा था- ‘एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और आश्चर्यजनक सत्य जो मैंने अपने गुरुदेव से सीखा, वह यह है कि संसार में जितने भी धर्म हैं वे कोई परस्परविरोधी और वैरभावात्मक नहीं हैं- वे केवल एक ही चिरन्तन शाश्वत धर्म के भिन्न-भिन्न भाव मात्र हैं. ...इसलिए हमें सभी धर्मों को मान देना चाहिए और जहां तक हो उनके तत्वों में अपना विश्वास रखना चाहिए.’

इसी सभा में विवेकानंद ने आगे कहा- ‘श्रीरामकृष्ण का संदेश आधुनिक संसार को यही है— मतवादों, आचारों, पंथों तथा गिरजाघरों और मंदिरों की अपेक्षा ही मत करो. प्रत्येक मनुष्य के भीतर जो सार वस्तु अर्थात् ‘धर्म’ विद्यमान है इसकी तुलना में ये सब तुच्छ हैं. पहले इस धर्मधन का उपार्जन करो, किसी में दोष मत ढूंढ़ो, क्योंकि सभी मत, सभी पंथ अच्छे हैं. अपने जीवन के द्वारा यह दिखा दो कि धर्म का अर्थ न तो शब्द होता है, न नाम, न संप्रदाय, बल्कि इसका अर्थ होता है आध्यात्मिक अनुभूति. ...जब तुम दुनिया के सभी धर्मों में सामंजस्य देख पाओगे, तब तुम्हें प्रतीत होगा कि आपस में झगड़े की कोई आवश्यकता नहीं है और तभी तुम समग्र मानवजाति की सेवा के लिए तैयार हो सकोगे. इस बात को स्पष्ट कर देने के लिए कि सब धर्मों में मूल तत्व एक ही है, मेरे गुरुदेव का अवतार हुआ था.’

स्वयं स्वामी रामकृष्ण ने एक बार कहा था- ‘सांप्रदायिक भ्रातृप्रेम के बारे में बातचीत बिल्कुल न करो, बल्कि अपने शब्दों को सिद्ध करके दिखाओ.’ भारत जैसे अनेक धर्मो वालो इस देश को स्वामी रामक्रष्ण परमहंस के दर्शन और व्यवहार की सख्त जरूरत है .


(स्वामी रामक्रष्ण परमहंस अपने प्रमुख शिष्यों विवेकान्द समेत महा समाधि के पश्चात )




इन काउन्टर

गुजरात के सोहराबुद्दीन शेख, इशरत जहां, हाशिमपुरा आदि के बाद मध्यप्रदेश ,हरियाणा समेत राजस्थान में अनेक एनकाउंटर यहाँ की भाजपा सरकारों ने किये है . इसी क्रम में अब उत्तर प्रदेश में भी इनकाउन्टर का भूत चल-फिर रहा है . जाहिर है भाजपा ने गुजरात माडल को इन सभी राज्यों पर लागू किया है . 

इनकाउन्टर के बारे में देश का कानून और सविधान क्या कहता है , ये तो कोई कानून विशेषग्य ही बता पायेगा . फिलहाल समाज शास्त्र के अनुसार कोई अपराधी जन्म से नही पैदा होता है , बल्कि वे हमारे इसी समाज में बनाए जाते है. फूलन देवी इसका प्रत्यछ उदाहरण है . अगर बात रामराज्य की ही की जाए तो महर्षि बाल्मीकि जी को भी यदि सुधरने का अवसर नही मिलता तो 'रामायण ' कौन लिखता ? 

वास्तव में किसी डाक्टर का कर्तव्य मर्ज का इलाज करना होता है न कि रोगी को ही मार देना . इसी प्रकार किसी राज्य की सत्ता को अपराधो को रोकने का सम्भव प्रयास करना चाहिए . हालांकि अपराध मुक्त समाज / राज्य वास्तविकता में होना बिलकुल असम्भव है , ये एक कोरी कल्पना ही हो सकती है . जहा तक अपराधियों को मारने की बात है , देश में कई अपराधो पर कैपिटल पनिशमेंट होने के बावजूद भी वे अपराध कम होने के बजाय बढ़ते ही गये है . इसलिए इन्काउन्टर से अपराध समाप्त हो जायेंगे ये सोचना तर्कसम्मत तो नही है . इन अपराधियों को पकड़ कर उन पर उनके जुर्म की मात्रा के अनुसार अदालत से सजा मिलनी चाहिए और जेल में रह कर उन्हें सुधरने का भी एक अवसर अवश्य मिलना चाहिए . आज का सवाल इसी मुद्दे से जुडा हुआ है . 
क्या इनकाउन्टर करने से समाज अपराध मुक्त हो जाएगा ?

Saturday, 17 February 2018

आँख मारना


सोशल मिडिया से पता चला कि आँख मारना आजकल फिर से काफी वायरल हो गया है . वैसे आँख मारना प्रेम रस के साथ -साथ वीर रस की एक क्रिया मानी जानी चाहिए . आँख मारने के लिए भी हिम्मत तो होनी चाहिए . हालांकि इस कला पर पुरुषो का आधिपत्य रहा है लेकिन कुछ चंचल शोख महिलाये भी इस इस विधा में कुशल होती है . सीधी -साधी सौम्य महिलाये तो पुरुषो से इसी खौफ से नजरे तक नही मिला पाती कि कही उन्हें कोई मनचला आँख न मार दे . मेले और सार्वजनिक समारोहों में इस आँख मारने के विवाद में अक्सर कहा -सुनी देखी जा सकती है . हालांकि एक वक्त वह भी था जब खासतौर पर पुरुष वर्ग इसे लडकियों को छेड़ने या उनसे अपनी प्रेम अभिव्यक्ति को व्यक्त करने के लिए भी इसका सहारा लेते थे . दोनों में अगर सहमती हो गयी तो मुस्कुराहट नही तो सैंडल की मार भी मिल जाती थी . लेकिन यही आँख मारने का काम घर में अगर छोटे बच्चे करते है तो बड़े बुजुर्ग बहुत प्रसन्न होते है . हंसते -हंसते कुछ लोगो के तो आँखों से आंसू तक निकल आते है और पेट में जब तक दर्द नही होता , उनकी हंसी -ठहाका नही रुकती है .

कुछ साल पहले बाबा रामदेव टेलीविजन में योग सिखाते -सिखाते आँख मार जाते थे तब कहा जाता था उनकी आँख में ही कुछ समस्या है . बाबा जी ने भी कभी स्पष्टीकरण नही दिया . लेकिन दर्शक उनके इस कृत्य पर अपनी हंसी आज भी नही रोक पाते है . अनेक हास्य कलाकारों ने तो उनकी नकल उतार कर इस पर कई शो भी कर डाले है . आँख भी बड़ी कमाल की चीज होती है . इसके बगैर कोई शख्स इस फिजा की खूबसूरती का दीदार भी नही कर सकता है . लेकिन कमबख्त चश्मे के कारन इन आखो पर चारदीवारी सी बैठ जाती है . जिनकी नजर कमजोर हो जाती है उन्हें अपनी आँखों की खातिर चश्मे का सहारा लेना ही पड़ता है . 


आँखों से आँखे मिला कर दिल का हाल भी पता चल जाता है . आँख से आंसू न निकलते तो कमबख्त दुःख दर्द भी दिल के अंदर पथरी बन कर बैठ जाते . बात यदि दो आँख तक हो तो फिर भी ठीक है लेकिन सबको पता है तीसरी आँख भी होती है . ये वैसे तो बंद ही रहती है लेकिन जब खुलती है तो सर्वनाश ही होता है . यहाँ आख खुलने और आँख मारने में विरोधाभास है . कही दो आँखों में से एक आँख मारने से कोई घायल होता है तो दूसरी तरफ तीसरी आँख खुलने से खेल ही खत्म हो जाता है . 


मुख्य बात आँख मारने पर वापस आते है , पता नही आँख मारना कोई फूहड़ता है या एक हमारे सामाजिक जीवन की एक अंत : क्रिया , पुरुषो के साथ अब महिलाये भी इस कला में निपुण और निर्भीक हो रही है .