Friday, 26 October 2018

गणेश शंकर विद्यार्थी



























‘मैं हिन्दू-मुसलमान झगड़े की मूल वजह चुनाव को समझता हूं. चुने जाने के बाद आदमी देश और जनता के काम का नहीं रहता.

यह महत्वपूर्ण विचार देश के फतेहपुर जिले के ह्थगाव में ही जन्मे और प्रसिद्ध पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी के है .किन्तु विडम्बना यह है कि आज के बिकाऊ मिडिया के दौर में श्री गणेश जी अपने गृह जिले फतेहपुर ही नहीं वरन पत्रकारिता की दुनिया में भी अनजान हो चुके है .भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय जिन पत्रकारों ने अपनी लेखनी को हथियार बनाकर आजादी की लड़ाईलड़ी, उनमें गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम अग्रणी व उल्लेखनीय है. 

श्री विद्यार्थी जी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 को हुआ था. इनके पिता का नाम श्री जयनारायण था. इनके पिता एक स्कूल में अध्यापक थे और उर्दू व फारसी के अच्छे जानकार थे. विद्यार्थी जी की शिक्षा-दीक्षा मुंगावली (ग्वालियर) में हुई थी.

कलम के धनी विद्यार्थी जी का झुकाव साहित्य की तरफ भी था . उन्होंने हिंदी साहित्य को सम्पन्न बनाने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया . विद्यार्थी जी ने 'प्रभा ' और 'प्रताप ' नामक साप्ताहिक पत्रों का कुशल सम्पादन भी किया . 'प्रताप ' को उन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों की बदौलत देश के स्वतन्त्रता संग्राम का मुखपत्र ही बना दिया . अपने साहित्य और पत्रकारिता से उन्होंने न सिर्फ अंग्रेजी राज का विरोध किया अपितु समाजिक भाईचारा को भी मजबूत किया . उनकी पत्रकारिता कितनी गम्भीर और पेशेवर थी इसकी झलक उनके ही शब्दों में कुछ इस प्रकार है .....

जो कलम सरीखे टूट गये पर झुके नहीं, 
उनके आगे यह दुनिया शीश झुकाती है 
जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गई, 
वह तो मशाल की तरह उठाई जाती है”















विद्यार्थी जी अपने क्रन्तिकारी साहित्य और ईमानदार पत्रकारिता के कारण अंग्रेजो की आँखों में सदैव चुभते रहे . वह कई बार जेल गये . अपनी एक कविता 'सौदा ए वतन ' के कारण अंग्रेजो ने उन पर राजद्रोह का मुकदमा भी लगाया . विद्यार्थी जी ने सामंती शोषण और किसानों के दमन उत्पीड़न का भी जोरदार विरोध किया.उन्होने कानपुर के मिल मजदूरों को उनका वाजिब हक दिलाने की लड़ाई भी काफी प्रभावी ढंग से लड़ी तथा वह उसमें सफल भी रहे.

दरअसल विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे और उन्होंने जीवनभर एकजुटता, कौमी एकता पर जोर दिया. भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद देश भर में जो साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, विद्यार्थी जी ने उन्हें रोकने के लिए पूरी ताकत लगा दी थी लेकिन दंगों को रोकने का प्रयास करते हुए वह कानपुर में राष्ट्रविरोधी ताकतों के शिकार बन गये. जिसके कारण 25 मार्च 1931 को पत्रकारों के इस पुरोधा का दुखद देहान्त हो गया. 

आज जब देश के लोकतंत्र का चौथा खम्भा धराशाई हो चूका है और साम्प्रदायिकता अपने पूरे शबाब पर है ,तब श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी जैसे ईमानदार व देशभक्त पत्रकार की कमी बेहद खल रही है . उनके गृह जनपद फतेहपुर के समस्त निवासियों की तरफ से इस संछिप्त लेख के माध्यम से मै अमर शहीद श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी को शत -शत नमन करता हु .

Tuesday, 11 September 2018

शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन (125 साल बाद )























आज से ठीक 125 वर्ष पहले 11 सितम्बर, 1893 को शिकागो (अमेरिका) में ऐतिहासिक विश्व धर्म सम्मेलन हुआ आयोजित हुआ था . इस सम्मेलन में भारत की ओर से स्वामी विवेकानंद जी ने अपने ऐतिहासिक वक्तव्य के माध्यम से भारत के हिन्दू धर्म का एक उदारवादी चेहरा दुनिया के सामने रखा था. इसी सम्मेलन में विवेकानंद के दिए गए उस चर्चित वक्तव्य की याद में 11 सितम्बर 2018 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद ने भी एक सम्मेलन आयोजित किया है . जाहिर है संघ का आयोजन है तो एजेंडा हिंदुत्व से अलग नही हो सकता है  

संघ के हिंदुत्व और विवेकानन्द के हिंदुत्व में काफी भिन्नता है . स्वामी विवेकानन्द हिन्दू समाज में व्याप्त बुराइयों और जड़ता पर खुल कर बोलते थे . वह सन्यासी ही नही अपितु एक श्रेष्ठ समाजसुधारक भी थे . उन्होंने अपने समय के हिन्दू कट्टरपंथियों और पाखंडी धर्माचार्यो को ललकारते हुए (कास्ट, कल्चर एंड सोशलिज्म) में कहा है- "शूद्रों ने अपने हक मांगने के लिए जब भी मुंह खोला, उनकी जीभें काट दी गई. उनको जानवरों की तरह चाबुक से पीटा गया. लेकिन अब आप उन्हें उनके अधिकार लौटा दो वरना जब वे जागेंगे और आप (उच्च वर्ग) के द्वारा किए गए शोषण को समझेंगे, तो अपनी फूंक से आप सबको उड़ा देंगे. यही (शूद्र) वे लोग हैं, जिन्होंने आपको सभ्यता सिखाई है, और ये ही आपको नीचे भी गिरा देंगे. सोचिए कि किस तरह शक्तिशाली रोमन सभ्यता गॉलों के हाथों मिट्टी में मिला दी गई. सैकड़ों वर्षो तक अपने सिर पर गहरे अंधविास का बोझ रखकर, केवल इस बात पर र्चचा में अपनी ताकत लगाकर कि किस भोजन को छूना चाहिए और किसको नहीं, और युगों तक सामाजिक अत्याचारों के तले सारी इंसानियत को कुचलकर आपने क्या हासिल किया और आज आप क्या है?..आओ पहले मनुष्य बनो और उन पंडे-पुजारियों को निकाल बाहर करो जो हमेशा आपकी प्रगति के खिलाफ रहे हैं, जो कभी अपने को सुधार नहीं सकते और जिनका ह्रदय कभी भी विशाल नहीं बन सकता. वे सदियों के अंधविास और जुल्मों की उपज है. इसलिए पहले पुजारी-प्रपंच का नाश करो, अपने संकीर्ण संस्कारों की काया तोड़ो, मनुष्य बनो और बाहर की ओर झांको, देखो कि कैसे दूसरे राष्ट्र आगे बढ़ रहे हैं." 

स्पष्ट है विवेकानन्द संघ की हिंदुत्व की विचारधारा से बिलकुल मेल नही खाते है किन्तु फिर भी उन्हें संघ के हिंदुत्व के प्रमुख चेहरे के रूप में प्रस्तुत करने के पुरे प्रयास जारी है . यदि, यही विवेकानन्द जी आज कही जीवित होते तो क्या हिंदुत्व की रुढ़िवादी ताकते उन्हें अपना नायक स्वीकार कर पाती ? 


Saturday, 1 September 2018

रामविलास पासवान

रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के पास लोक सभा में 6 सांसद हैं और वह बिहार से भाजपा के सहयोगी दल के रूप में केंद्र की सत्ता में शामिल रहे है .


रामविलास पासवान ने अपनी राजनीति की शुरुआत साल 1969 में डा राम मनोहर लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से की थी. उस वक्त डा लोहिया पहले इंसान थे जिन्होंने आजादी के बाद गैर कांग्रेसवाद का बीज बोया था . इसी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के दम पर 25 साल के नवयुवक राम विलास पासवान पहली बार बिहार विधानसभा पहुंच गए. इसके बाद जब आपातकाल में इंदिरा गांधी के खिलाफ माहौल बनने लगा तो वह जननायक जयप्रकाश नारायण और लोकबन्धु राजनारायण के भी बेहद करीब आ गए और 1977 में रिकॉर्ड वोटों से चुनाव जीतकर लोकसभा भी पहुंच गये . हालांकि रामविलास पासवान ने अपनी राजनीति की शुरुआत तत्कालीन वरिष्ठ समाजवादी नेताओ के मार्गदर्शन में अवश्य की थी किन्तु उनके लम्बे राजनैतिक जीवन में उन समाजवादी आदर्शो का चरित्र कभीदिखाई नही दिया . यही नही वह सत्ता की चाह में अपने सिद्धांत भी बदलते रहे. उनकी कोशिश रही कि खासतौर पर बिहार में उन्हें एक दलित नेता के रूप में जाना जाए . कुछ हद तक वह इसमें कामयाब भी हुए . जिससे वर्ष 1980, 1989, 1996 1998, 1999, 2004 और 2014 के लोकसभा चुनावो में वह अपना चुनाव जीतते रहे है . 

कभी अटल सरकार में सत्ता का सुख लेने वाले रामविलास पासवान ने 2002 में नरेंद्र मोदी और गुजरात दंगों को मुद्दा बनाकर भाजपा का साथ भी छोड़ दिया था , और फिर मनमोहन सरकार में मंत्री भी बन गये. इसके बाद विडम्बना देखिये कि साल 2014 में यही राम विलास पासवान NDA के साथ जाकर उन्ही नरेंद्र मोदी की सरकार भी चलवा रहे है . 

राजनीति में अवसर वादिता का इससे बड़ा उदाहरण और कहा मिलेगा . हालाँकि अब राम विलास पासवान को अपने बेटे चिराग पासवान के कैरियर की चिंता भी सता रही है लेकिन बिहार में उनकी छवि अब न तो अतीत के एक समाजवादी नेता की रह गयी है और न ही किसी कर्मठ दलित नेता की . ऐसे में उन्हें सत्ता का सुख भले ही कुछ और समय तक नसीब होता रहे किन्तु वास्तव में भविष्य में उनकी और पार्टी की राजनैतिक जमीन काफी बंजर ही नजर आ रही है .

अपनी बीमारी से लड़ते हुए 8 अक्तूबर 2020 को 74 वर्षीय राम विलास पासवान जी दुनिया से विदा ले चुके है .

Sunday, 26 August 2018

क्रष्ण, क्रष्णा और राम

भारतीय संस्क्रति के सबसे प्रखर मौलिक चिंतक व समाजवादी राजनेता डा राम मनोहर लोहिया जी कहते है , कृष्ण यादव-शिरोमणि था , केवल क्षत्रीय राजा ही नहीं , शायद क्षत्रीय उतना नहीं था , जितना अहीर. तभी तो अहीरिन राधा की जगह अडिग है ,क्षत्राणी द्रौपदी उसे हटा न पायी. विराट विश्व और त्रिकाल के उपयुक्त कृष्ण बहुरूप था.कृष्ण ने इतनी अधिक मेहनत की उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैं , यदि बनाते भी हैं तो उसके मित्रभेद और कूटनीति की नकल करते हैं , उसका अथक निस्व उनके लिए असाध्य रहता है.इसीलिए कृष्ण हिन्दुस्तान में कर्म का देव न बन सका.कृष्ण ने कर्म राम से ज्यादा किये हैं.कितने सन्धि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी सम्बन्धों के धागे उसे पलटने पड़ते थे . यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था. संसार में एक कृष्ण ही हुआ जिसने दर्शन को गीत बनाया. राम रोऊ है , इतना कि मर्यादा भंग होती है. कृष्ण कभी रोता नहीं. आंखें जरूर डबडबाती हैं उसकी , कुछ मौकों पर , जैसे जब किसी सखी या नारी को दुष्ट लोग नंगा करने की कोशिश करते हैं . वाणी की देवी द्रौपदी से कृष्ण का संबंध कैसा था. क्या सखा – सखी का संबंध स्वयं एक अन्तिम सीढ़ी और असीम मैदान है , जिसके बाद और किसी सीढ़ी और मैदान की जरूरत नहीं ? कृष्ण छलिया जरूर था , लेकिन कृष्णा से उसने कभी छल न किया. शायद वचन – बद्ध था , इसलिए. जब कभी कृष्णा ने उसे याद किया , वह आया. स्त्री – पुरुष की किसलय – मित्रता को , आजकल के वैज्ञानिक , अवरुद्ध रसिकता के नाम से पुकारते हैं . ( प्रस्तुत लेख मूल रूप से डा राम मनोहर लोहिया जी द्वारा ही लिखित है )































कुरु – धुरी की आधार – शिला थी कुरु – पांचाल संधि . आसपास के इन इलाकों का वज्र समान एका कायम करना था सो कृष्ण ने उन लीलाओं के द्वारा किया , जिनसे पांचाली का विवाह पांचों पाण्डवों से हो गया . यह पांचाली भी अद्भुत नारी थी . द्रौपदी से बढ़ कर भारत की कोई प्रखर – मुखी और ज्ञानी नारी नहीं . कैसे कुरु पक्ष के सभी को उत्तर देने के लिए ललकारती है कि जो आदमी अपने को हार चुका है क्या दूसरे को दांव पर रखने की उसमें स्वतंत्र सत्ता है ?

अर्जुन समेत पांचों पांडव उसके सामने फीके थे. यह कृष्णा तो कृष्ण के ही लायक थी. महाभारत का नायक कृष्ण , नायिका कृष्णा. कृष्णा और कृष्ण का संबंध भी विश्व – साहित्य में बेमिसाल है. दोनों सखा – सखी ही क्यों रहे. कभी कुछ और दोनों में से किसी ने होना चाहा ? क्या सखा – सखी का सम्बन्ध पूर्व रूप से मन की देन थी या उसमें कुरु – धुरी के निर्माण और फैलाव का अंश था ? जो हो , कृष्ण और कृष्णा का यह संबंध राधा और कृष्ण के संबंध से कम नहीं , लेकिन साहित्यकारों और भक्तों की नजर इस ओर कम पड़ी है. हो सकता है कि भारत की पूर्व – पश्चिम एकता के इस निर्माता को अपनी ही सीख के अनुसार केवल कर्म , न कि कर्मफल का अधिकारी होना पड़ा , शायद इसलिए कि यदि वह वस्य कर्मफल-हेतु बन जाता , तो इतना अनहोना निर्माता हो ही नहीं सकता था. उसने कभी लालच न की कि अपनी मथुरा को ही धुरी – केंद्र बनाये , उसके लिए दूसरों का हस्तिनापुर ही अच्छा रहा. उसी तरह कृष्णा को भी सखी रूप में रखा , जिसे संसार अपनी कहता है , वैसी न बनाया. कौन जाने कृष्ण के लिए यह सहज था या इसमें भी उसका दिल दुखा था .


कृष्णा अपने नाम के अनुरूप सांवली थी , महान सुंदरी रही होगी. उसकी बुद्धि का तेज , उसकी चकित हरिणी आंखों में चमकता रहा होगा. गोरी की अपेक्षा सांवली, नखशिख और अंग में अधिक सुडौल होती है . राधा गोरी रही होगी. बालक और युवक कृष्ण राधा में एकरस रहा. प्रौढ़ कृष्ण के मन पर कृष्णा छायी रही होगी, राधा और कृष्ण तो एक थे ही. कृष्ण की संतानें कब तक उसकी भूल दोहराती रहेंगी- बेखबर जवानी में गोरी से उलझना और अधेड़ अवस्था में श्यामा को निहारना. कृष्ण – कृष्णा संबंध में और कुछ न हो , भारतीय मर्दों को श्यामा की तुलना में गोरी के प्रति अपने पक्षपात पर मनन करना चाहिए . 


रामायण की नायिका गोरी है. महाभारत की नायिका कृष्णा है. गोरी की अपेक्षा सांवला अधिक सजीव है. जो भी हो , इसी कृष्ण – कृष्णा संबंध का अनाड़ी हाथों फिर पुनर्जन्म हुआ. न रहा उसमें कर्मफल और कर्मफल हेतु त्याग. कृष्णा पांचाल यानी कनौज के इलाके की थी , संयुक्ता भी. धुरी – केन्द्र इन्द्रप्रस्थ का अनाड़ी राजा पृथ्वीराज अपने पुरखे कृष्ण के रास्ते न चल सका . जिस पांचाली द्रौपदी के जरिये कुरु – धुरी की आधार – शिला रखी गयी , उसी पांचाली संयुक्ता के जरिये दिल्ली – कनौज की होड़ जो विदेशियों के सफल आक्रमणों का कारण बना. कभी – कभी लगता है कि व्यक्ति का तो नहीं लेकिन इतिहास का पुनर्जन्म होता है , कभी फीका कभी रंगीला. कहां द्रौपदी और कहां संयुक्ता , कहां कृष्ण और कहां पृथ्वीराज , यह सही है. फीका और मारात्मक पुनर्जन्म , लेकिन पुनर्जन्म तो है ही .



कृष्ण की कुरु – धुरी के और भी रहस्य रहे होंगे. साफ़ है कि राम आदर्शवादी एकरूप एकत्व का निर्माता और प्रतीक था. उसी तरह जरासंध भौतिकवादी एकत्व का निर्माता था. आजकल कुछ लोग कृष्ण और जरासंध युद्ध को आदर्शवाद – भौतिकवाद का युद्ध मानने लगे हैं. वह सही जंचता है ,किंतु अधूरा विवेचन. जरासंध भौतिकवादी एकरूप एकत्व का इच्छुक था. बाद के मगधीय मौर्य और गुप्त राज्यों में कुछ हद तक इसी भौतिकवादी एकरूप एकत्व का प्रादुर्भाव हुआ और उसी के अनुरूप बौद्ध धर्म का . कृष्ण आदर्शवादी बहुरूप एकत्व का का निर्माता था.जहां तक मुझे मालूम है ,अभी तक भारत का निर्माण भौतिकवादी बहुरूप एकत्व के आधार पर कभी नहीं हुआ. चिर चमत्कार तो तब होगा जब आदर्शवाद और भौतिकवाद के मिलेजुले बहुरूप एकत्व के आधार पर भारत का निर्माण होगा.

अभी तक तो कृष्ण का प्रयास ही सर्वाधिक माननीय मलूम होता है , चाहे अनुकरणीय राम का एकरूप एकत्व ही हो.कृष्ण की बहुरूपता में वह त्रिकाल – जीवन है जो औरों में नहीं. कृष्ण यादव-शिरोमणि था , केवल क्षत्रीय राजा ही नहीं , शायद क्षत्रीय उतना नहीं था , जितना अहीर. तभी तो अहीरिन राधा की जगह अडिग है ,क्षत्राणी द्रौपदी उसे हटा न पायी. विराट विश्व और त्रिकाल के उपयुक्त कृष्ण बहुरूप था. राम और जरासंध एकरूप थे , चाहे आदर्शवादी एकरूपता में केन्द्रीयकरण और क्रूरता कम हो , लेकिन कुछ न कुछ केन्द्रीयकरण तो दोनों में होता है. मौर्य और गुप्त राज्यों में कितना केन्द्रीयकरण था , शायद क्रूरता भी.

बेचारे कृष्ण ने इतनी नि:स्वार्थ मेहनत की , लेकिन जन-मन में राम ही आगे रहा है.सिर्फ बंगाल में ही मुर्दे – ” बोलो हरि , हरि बोल ” के उच्चारण से – अपनी आख़री यात्रा पर निकाले जाते हैं , नहीं तो कुछ दक्षिण को छोड़ कर सारे भारत में हिन्दू मुर्दे – ” राम नाम सत्य है ” के साथ ही ले जाये जाते हैं. बंगाल के इतना तो नहीं , फिर भी उड़ीसा और असम में कृष्ण का स्थान अच्छा है. कहना मुशकिल है कि राम और कृष्ण में कौन उन्नीस , कौन बीस है. सबसे आश्चर्य की बात है कि स्वयं ब्रज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहां एक – दूसरे को ‘ जैरामजी ” से नमस्ते करते हैं. सड़क चलते अनजान लोगों को भी यह ” जैरामजी ” बड़ा मीठा लगता है , शायद एक कारण यह भी हो.

राम त्रेता के मीठे , शान्त और सुसंस्कृत युग का देव है.कृष्ण पके , जटिल , तीखे और प्रखर बुद्धि युग का देव है.राम गम्य है. कृष्ण अगम्य है.कृष्ण ने इतनी अधिक मेहनत की उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैं , यदि बनाते भी हैं तो उसके मित्रभेद और कूटनीति की नकल करते हैं , उसका अथक निस्व उनके लिए असाध्य रहता है.इसीलिए कृष्ण हिन्दुस्तान में कर्म का देव न बन सका.कृष्ण ने कर्म राम से ज्यादा किये हैं.कितने सन्धि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी सम्बन्धों के धागे उसे पलटने पड़ते थे . यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था.

इसके यह मतलब नहीं की प्रदेशों के आपसी सम्बन्धों में में कृष्णनीति अब भी चलायी जए.कृष्ण जो पूर्व – पश्चिम की एकता दे गया ,उसी के साथ – साथ उस नीति का औचित्य भी खतम हो गया.बच गया कृष्ण का मन और उसकी वाणी.और बच गया राम का कर्म.अभी तक हिन्दुस्तानी इन दोनों का समन्वय नहीं कर पाये हैं. करें , तो राम के कर्म में भी परिवर्तन आये. राम रोऊ है , इतना कि मर्यादा भंग होती है. कृष्ण कभी रोता नहीं. आंखें जरूर डबडबाती हैं उसकी , कुछ मौकों पर , जैसे जब किसी सखी या नारी को दुष्ट लोग नंगा करने की कोशिश करते हैं .

कैसे मन और वाणी थे उस कृष्ण के.अब भी तब की गोपियां और जो चाहें वे ,उसकी वाणी और मुरली की तान सुन कर रस विभोर हो सकते हैं और अपने चमड़े के बाहर उछल सकते हैं. साथ ही कर्म-संग के त्याग , सुख-दुख,शीत-उष्ण,जय-पराजय के समत्व के योग और सब भूतों में एक अव्यव भाव का सुरीला दर्शन ,उसकी वाणी में सुन सकते हैं . संसार में एक कृष्ण ही हुआ जिसने दर्शन को गीत बनाया.

वाणी की देवी द्रौपदी से कृष्ण का संबंध कैसा था. क्या सखा – सखी का संबंध स्वयं एक अन्तिम सीढ़ी और असीम मैदान है , जिसके बाद और किसी सीढ़ी और मैदान की जरूरत नहीं ? कृष्ण छलिया जरूर था , लेकिन कृष्णा से उसने कभी छल न किया. शायद वचन – बद्ध था , इसलिए. जब कभी कृष्णा ने उसे याद किया , वह आया. स्त्री – पुरुष की किसलय – मित्रता को , आजकल के वैज्ञानिक , अवरुद्ध रसिकता के नाम से पुकारते हैं. यह अवरोध सामाजिक या मन के आन्तरिक कारणों से हो सकता है.

पांचों पाण्डव कृष्ण के भाई थे और द्रौपदी कुरु – पांचाल संधि की आधार- शिला थी. अवरोध के सभी कारण मौजूद थे. फिर भी , हो सकता है कि कृष्ण को अपनी चित्तप्रवृत्तियों का कभी विरोध न करना पड़ा हो. यह उसके लिए सहज और अंतिम संबंध था अगर यह सही है , तो कृष्ण – कृष्णा के सखा – सखी संबंध के ब्योरे पर दुनिया में विश्वास होना चाहिए और तफ़सील से , जिससे से स्त्री – पुरुष संबंध का एक नया कमरा खुल सके. अगर राधा की छटा निराली है, तो कृष्ण की घटा भी. छटा में तुष्टिप्रदान रस है , घटा में उत्कंठा-प्रधान कर्त्तव्य. राधा – रस तो निराला है ही. राधा – कृष्ण एक हैं , राधा – कृष्ण का स्त्री रूप और कृष्ण राधा का पुरुष रूप. भारतीय साहित्य में राधा का जिक्र बहुत पुराना नहीं है , क्योंकि सबसे पहली बार पुराण में आता है ” अनुराधा ” के नाम से. नाम ही बताता है प्रेम और भक्ति का वह स्वरूप , जो आत्म विभोर है , जिससे सीमा बांधने वाली चमड़ी रह नहीं जाती.

आधुनिक समय में मीरा ने भी उस आत्मविभोरता को पाने की कोशिश की.बहुत दूर तक गयी मीरा , शायद उतनी दूर गयी जितना किसी सजीव देह को किसी याद के लिए जाना संभव हो.फिर भी , मीरा की आत्मविभोरता में कुछ गर्मी थी. कृष्ण को तो कौन जला सकता है , सुलझा भी नहीं सकता , लेकिन मीरा के पास बैठने में उसे जरूर कुछ पसीना आये , कम से कम गर्मी तो लगे.राधा न गरम है , न ठंडी , राधा पूर्ण है.मीरा की कहानी एक और अर्थ में बेजोड़ है.पद्मिनी मीरा की पुरखिन थी.दोनों चित्तौड़ की नायिकाएं हैं.करीब ढाई सौ वर्ष का अन्तर है. कौन बड़ी है , वह पद्मिनी जो जौहर करती है या वह मीरा जिसे कृष्ण के लिए नाचने से कोई मना न कर सका. पुराने देश की यही प्रतिभा है. बड़ा जमाना देखा है इस हिन्दुस्तान ने. क्या पद्मिनी थकती – थकती सैंकड़ों बरस में मीरा बन जाती है ? या मीरा ही पद्मिनी का श्रेष्ठ स्वरूप है ? अथवा जब प्रताप आता है , तब मीरा फिर पद्मिनी बनती है. हे त्रिकालदर्शी कृष्ण ! क्या तुम एक ही में मीरा और पद्मिनी नहीं बन सकते ?

राधा – रस का पूरा मजा तो ब्रज – रज में मिलता है. मैं सरयू और अयोध्या का बेटा हूं. ब्रज – रज में शायद कभी न लौट सकूंगा. लेकिन मन से तो लौट चुका हूं.श्री राधा की नगरी बरसाने के पास एक रात रह कर मैंने राधारानी के गीत सुने हैं. कृष्ण बड़ा छलिया था.कभी श्यामा मालिन बन कर , राधा को फूल बेचने आता था.कभी वैद्य बन कर आता था , प्रमाण देने कि राधा अभी ससुराल जाने लायक नहीं है. कभी राधा प्यारी को गोदाने का न्योता देने के लिए गोदनहारिन बन कर आता था. कभी वृन्दा की साड़ी पहन कर आता था और जब राधा उससे एक बार चिपट कर अलग होती थी , शायद झुंझला कर , शायद इतरा कर , तब श्री कृष्ण मुरारी को ही छट्ठी का दूध याद आता था , बैठ कर समझाओ राधारानी को कि वृन्दा से आंखें नहीं लड़ायी.

मैं समझता हूं कि नारी अगर कहीं नर के बराबर हुइ है , तो सिर्फ ब्रज में और कान्हा के पास. शायद इसीलिए आज भी हिन्दुस्तान की औरतें वृन्दावन में जमुना के किनारे एक पेड़ में रुमाल जितनी चुनड़ी बांधने का अभिनय करती हैं. कौन औरत नहीं चाहेगी कन्हैया से अपनी चुनड़ी हरवाना , क्योंकि कौन औरत नहीं जानती कि दुष्ट जनों द्वारा चीर हरण के समय कृष्ण ही उनकी चुनड़ी अनन्त करेगा. शायद जो औरतें पेड़ में चीर बांधती हैं , उन्हें यह सब बताने पर वह लजाएंगी , लेकिन उनके पुत्र पुण्य आदि की कामना के पीछे भी कौन – सी सुषुप्त याद है.

ब्रज की मुरली लोगों को इतना विह्वल कैसे बना देती है कि वे कुरुक्षेत्र के कृष्ण को भूल जायें और फिर मुझे तो लगता है कि अयोध्या का राम मनीपुर से द्वारका के कृष्ण को कभी भुलाने न देगा.जहां मैंने चीर बांधने का अभिनय देखा उसी के नीचे वृन्दावन के गंदे पानी का नाला बहते देखा , जो जमुना से मिलता है और राधा रानी के बरसाने की रंगीली गली में पैर बचा – बचा कर रखना पड़ता है कि कहीं किसी गंदगी में न सन जाये. यह वही रंगीली गली है , जहाँ से बरसाने की औरतें हर होली पर लाठी ले कर निकलती हैं और जिनके नुक्कड़ पर नन्द गांव में मर्द मोटे साफे बांध और बड़ी ढालों से अपनी रक्षा करते हैं.

राधा रानी अगर कहीं आ जाए , तो वह इन नालों और गंदगियों को तो खतम करे ही , बरसाने की औरतों के हाथ में इत्र , गुलाल और हल्के , भीनी महक वाले , रंग की पिचकाली थमाये और नन्द गांव के मरदों को होली खेलने के लिए न्योता दे. ब्रज में महक और नहीं है, कुंज नहीं है , केवल करोल रह गये हैं. शीतलता खतम है. बरसाने में मैंने राधारानी की अहीरिनों को बहुत ढूंढ़ा. पांच – दस घर होंगे. वहां बनियाइनों और ब्राह्मणियों का जमाव हो गया है , जब किसी जात में कोई बड़ा आदमी या बड़ी औरत हुई , तीर्थ – स्थान बना और मंदिर और दुकानें देखते – देखते आयीं , तब इन द्विज नारियों के चेहरे भी म्लान थे , गरीब , कृश और रोगी , कुछ लोग मुझे मूर्खतावश द्विज – शत्रु समझने लगे हैं. मैं तो द्विज – मित्र हूं , इसलिए देख रहा हूं कि राधारानी की गोपियां , मल्लाहिनों और चमाइनों को हटा कर द्विजनारियों ने भी अपनी कांति खो दी है. मिलाओ ब्रज की रज में पुष्पों की महक , दो हिन्दुस्तान को कृष्ण की बहुरूपी एकता , हटाओ राम का एक रूपी द्विज – शूद्र धर्म , लेकिन चलो राम के मर्यादा वाले रास्ते पर , सच और नियम पालन कर .

सरयू और यमुना कर्त्तव्य की नदियां हैं. कर्त्तव्य कभी – कभी कठोर हो कर अन्यायी हो जाता है और नुकसान कर बैठता है.जमुना और चंबल , केन तथा दूसरी जमुना – मुखी नदियां रस की नदियां हैं. रस में मिलन है , कलह मिटाता है. लेकिन लास्य भी है , जो गिरावट में मनुष्य को निकम्मा बना देता है. इसी रसभरी इतराती जमुना के किनारे कृष्ण ने अपनी लीला की , लेकिन कुरु धुरी का केन्द्र उसने गंगा के किनारे ही बसाया. बाद में , हिन्दुस्तान के कुछ राज्य जमुना के किनारे बने और एक अब भी चल रहा है.जमुना क्या तुम कभी बदलोगी , आखिर गंगा में ही तो गिरती हो. क्या कभी इस भूमि पर रसमय कर्त्तव्य का उदय होगा.कृष्ण ! कौन जाने तुम थे या नहीं.कैसे तुमने राधा – लीला को कुरु लला से निभाया. लोग कहते हैं कि युवा कृष्ण का प्रौढ़ कृष्ण से कोई संबंध नहीं. बताते हैं कि महाभारत में राधा का नाम तक नहीं. बात इतनी सच नहीं , क्योंकि शिशुपाल ने क्रोध में कृष्ण की पुरानी बातें साधारण तौर पर बिना नामकरण के बतायी हैं. सभ्य लोग ऐसे जिक्र असमय नहीं किया करते , जो समझते हैं वे , और जो नहीं समझते हैं वे भी. महाभारत में राधा का जिक्र हो कैसे सकता है. राधा का वर्ण्न तो वही होगा जहां तीन लोक का स्वामी उसका दास है. रास का कृष्ण और गीता का कृष्ण एक हैं. न जाने हजारों वर्ष से अभी तक पलड़ा इधर या उधर क्यों भारी हो जाता है ? बताओ कृष्ण ! 


Saturday, 25 August 2018

बी पी मंडल (महामानव)

मंडल आयोग का नाम सभी ने (खासतौर पर पिछड़ा वर्ग ने ) अवश्य सुना है, लेकिन इस आयोग का नाम 'मंडल आयोग' क्यों पड़ा , यह बात शायद बहुत कम लोगो को मालुम होगी . दरअसल वर्ष 2018 बीपी मंडल का जन्मशती वर्ष भी है. इसलिए आइये एक छोटा सा परिचय जान लेते है इस मंडल आयोग और इसके महानायक के बारे में .

मंडल आयोग के महानायक बीपी यानि बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल (यादव ) का जन्म 25 अगस्त, 1918 को बनारस में हुआ था. बीपी मंडल हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान जिस हॉस्टल में रहते थे. वहां पहले अगड़ी कही जाने वाली जातियों के लड़कों को खाना मिलता उसके बाद ही अन्य छात्रों को खाना दिया जाता था. जातीय भेदभाव का यह हाल था कि इस स्कूल में अगड़ी जाती के छात्र बेंच पर बैठते थे और पिछड़े वर्ग के छात्र नीचे जमींन पर . इस अमानवीय भेदभाव के खिलाफ बी पी मंडल ने अपनी आवाज़ उठाई जिससे स्कुल के सभी पिछडे छात्रो को उनका बराबरी का हक मिल गया . 

अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद वह कुछ दिन तक भागलपुर में एक मजिस्ट्रेट के रूप में कार्यरत रहे तत्पश्चात साल 1952 में भारत में हुए पहले आम चुनाव में मधेपुरा से कांग्रेस के टिकट पर बिहार विधानसभा के सदस्य बन गये . कहा जाता है कि बीपी मंडल को राजनीति, विरासत में मिली थी और उनके पिता श्री रास बिहारी मंडल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे थे.

इसके बाद बीपी मंडल साल 1967 में लोकसभा के लिए चुने गए. किन्तु तब तक वह कांग्रेस छोड़कर समाजवादी नेता डा राम मनोहर लोहिया की अगुवाई वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता बन चुके थे.  संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में अपने कुछ मतभेदों के चलते उन्होंने उससे अलग होकर शोषित दल बनाया और कांग्रेस के समर्थन से 1 फरवरी, 1968 को बिहार के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए . उस दौर में पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले किसी शख्स के लिए यह उपलब्धी दुर्लभ ही थी .हालाकि इस महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर उन्हें मात्र 50 दिन तक रहने का ही सौभाग्य प्राप्त हुआ .


उनके नाम पर आधारित ऐतिहासिक 'मंडल आयोग' का गठन मोरारजी देसाई की सरकार के समय 1 जनवरी, 1979 को हुआ था किन्तु इसके बाद मोरार जी देसाई जी की सरकार ही गिर गयी . जिससे इस आयोग ने इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान 31 दिसंबर 1980 को अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट सौंपी . रिपोर्ट सौपने के कुछ साल बाद 13 अप्रैल, 1982 को पटना में पिछडो के इस मसीहा बीपी मंडल की म्रत्यु हो गयी .



जीवन -म्रत्यु तो इस स्रष्टि का नियम है किन्तु महान व्यक्तित्वों को उनके महान कार्यो के बदौलत सदियों और युगों -युगों तक याद किया जाता है . बी पी मंडल के ऐसे ही ऐतिहासिक कार्यो की बदौलत देश में मौजूद 85 % बहुजन को समाज की मुख्य धारा में जीने का सुअवसर प्राप्त हुआ . उनके द्वारा निर्मित मंडल आयोग की रिपोर्ट को जनता दल की सरकार के दौरान लागू कर प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिह भी पिछडो के हिमायती बन गये . इसी मंडल आयोग की बदौलत सभी अन्य पिछड़ा वर्ग(OBC) को नौकरियों में आरक्षण मिला और बाद में मनमोहन सिंह की सरकार के कार्यकाल के दौरान साल 2006 में उच्च शिक्षा में भी यह व्यवस्था प्रारम्भ की गयी  .

मंडल आयोग के कारण पिछडो को सरकारी नौकरियों में आरछ्न मिलना प्रारम्भ हुआ जिससे सदियों से दबी ये सभी कमजोर जातीया भी देश के पिछड़ेपन को दूर कर स्वयम खुशहाल हुई . इसके प्रभाव से समाज में व्याप्त ऊंच -नीच की खाई कुछ कम हुई जिससे सामाजिक भेदभाव में भी कमी आई एवं देश के समग्र विकास हेतु एक मुख्य नीव की स्थापना हुई . आज इसी महान आयोग के कारण पिछडो को नौकरियों और शिछा में आरछ्न का लाभ भले ही मिल गया हो किन्तु अभी इस आयोग में की गई कुछ अन्य अहम सिफ़ारिशों को ज़मीन पर उतारा जाना बाकी है. वास्तव में मंडल आयोग की सिफ़ारिशों में शिक्षा-सुधार, भूमि-सुधार, पेशागत जातियों को सरकारी स्तर पर नई तकनीक और व्यापार के लिए वित्तीय मदद मुहैया कराने से जुड़ी सिफ़ारिशें भी शामिल थी जिनका लागू होना अभी शेष है .