Thursday, 13 April 2017

बाबा साहेब डा भीमराव (सकपाल )अम्बेडकर

बाबा साहब को हमारा देश सविधान निर्माता के रूप में भलीभांति जानता है . संविधान निर्माता डा. भीम राव अंबेडकर जी का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था. अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान के रूप में जन्में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म महार जाति में हुआ था जिसे लोग अछूत और बेहद निचला वर्ग मानते थे. इसके कारण अम्बेडकर को बचपन से ही सामाजिक और आर्थिक भेदभाव का शिकार होना पड़ा . कहा जाता है कि अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव अंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे के कहने पर अंबेडकर ने अपने नाम से सकपाल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम "अंबावडे" पर आधारित था.

डा अम्बेडकर प्रतिभाशाली छात्र थे किन्तु अस्पृश्यता के कारण उन्हें अनेक प्रकार की कठिनाइयो का सामना करना पड़ा . सन १९१३ में गायकवाड शासक ने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय मे जाकर अध्ययन के लिये भीमराव आंबेडकर का चयन किया एवं इसके साथ ही उन्हें ११.५ डॉलर प्रति मास की छात्रवृत्ति भी प्रदान की. न्यूयार्क शहर में आने के बाद, डॉ॰ भीमराव आंबेडकर को राजनीति विज्ञान विभाग के स्नातक अध्ययन कार्यक्रम में प्रवेश मिल गया. यहां शयनशाला मे कुछ दिन रहने के बाद, वे भारतीय छात्रों द्वारा चलाये जा रहे एक आवास क्लब मे रहने चले गए और फिर यहाँ उन्होने अपने एक पारसी मित्र नवल भातेना के साथ एक कमरा ले लिया. १९१६ में, उन्हे उनके एक शोध के लिए पीएच.डी. से सम्मानित किया गया.  इस शोध को अंततः उन्होंने 'इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया'  के रूप में एक पुस्तक में प्रकाशित किया. हालाँकि उनका पहला प्रकाशित कार्य , एक लेख जिसका शीर्षक, भारत में जाति : उनकी प्रणाली, उत्पत्ति और विकास है.  अपनी डाक्टरेट की डिग्री लेकर अम्बेडकर सन १९१६ में लन्दन चले गये जहाँ उन्होने ग्रेज् इन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में कानून का अध्ययन और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट शोध की तैयारी के लिये अपना नाम लिखवा लिया. अगले वर्ष छात्रवृत्ति की समाप्ति के चलते मजबूरन उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ . बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये होने वाले भेदभाव से डॉ॰ भीमराव आंबेडकर दुखी हो गये और अपनी ये  नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे.  उन्हें अपने एक अंग्रेज जानकार मुंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम, के कारण मुंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी. आखिरकार सन १९२०  में कोल्हापुर के महाराजा, अपने पारसी मित्र के सहयोग और अपनी बचत के कारण वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सक्षम हो गये. सन १९२३ में उन्होंने अपना शोध प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी (रुपये की समस्यायें) को पूरा कर लिया. इसके बाद उन्हें लन्दन विश्वविद्यालय से "डॉक्टर ऑफ साईंस" की उपाधि प्रदान की गयी और फिर कानून का अध्ययन पूरा होने के, साथ ही साथ उन्हें ब्रिटिश बार मे बैरिस्टर के रूप में प्रवेश भी मिल गया.  भारत वापस लौटते हुये डॉ॰ भीमराव आंबेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन जारी रखा.  


बाबा साहेब अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये प्रथक निर्वाचिका  अर्थात  (separate electorates) और आरक्षण देने की भी वकालत की. दलितों और पिछडो के एक और मसीहा डा राम मनोहर लोहिया ने भी सदियों से समाज के इस कमजोर तबके को ऊपर उठाने हेतु आरछ्न देने की वकालत की .  समाजवादी नेता और बढ़ -चढ़ कर आजादी की लड़ाई लड़ने वाले डा लोहिया कहते थे , "छोटी जाति को उठाने के लिए सहारा देना पड़ेगा.  जैसे हाथ लुंज हो जाने पर सहारा देते है और तब हाथ काम करने लगता है, उसी तरह इन नब्बे फीसदी दबे हुए लोगों को सहारा देना होगा, उस समय तक जब तक बराबरी में न आ जाए.  इसीलिए, सोशलिस्ट पार्टी कहती है कि 100 में 60 ऊँची जगहें इनको दो जिनमें हरिजन, शूद्र, आदिवासी, पिछड़े , जुलाहा, अनसार धुनिया, औरत बगैरह हैं. हिन्दुस्तान में हुकुमरानों और रियाया के बीच, वर्ग और जनता के बीच एकसानियत का लगभग पूरा अभाव है और हिन्दुस्तान की बुराइयों की जड़ में यही सबसे प्रमुख है." डा अम्बेडकर ने सन १९२० ई में, बंबई से साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की.  यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया था . उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया,और  जिनका अम्बेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गया. अब तक डा अम्बेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली थी और 'बहिष्कृत  हितकारिणी' नामक एक सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था. सन्  १९२६ में, उन्हें बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ . उसके बाद सन १९२७ में डॉ॰ अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया.  उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया.  उन्होंने अस्पृश्य समुदाय को भी शहर की पानी की मुख्य टंकी से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये आन्दोलन चलाया.


 डा अम्बेडकर ने द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध, की कोरेगाँव की लडा़ई के दौरान मारे गये भारतीय सैनिकों के सम्मान में कोरेगाँव विजय स्मारक मे एक समारोह आयोजित किया जहा पर महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये गये . इसी वक्त १९२७ में, उन्होंने अपना दूसरी पत्रिका 'बहिष्कृत भारत' शुरू की . 


डा अम्बेडकर ने अपने बचपन में ही तत्कालीन जाति का दंश झेला था . उन्हें स्कुल में अपनी क्लास के बाहर ही बैठना पड़ता था और पानी भी दूर से ही पिलाया जाता था . इसलिए निम्न जाति का भेदभाव उन्हें कचोटता रहता था . अत : उन्होंने उस वक्त मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की.  शायद इसीलिए वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता महात्मा गाँधी जी के आलोचक बन गये .  डा अम्बेडकर की भाँती समाजवादी महानायक डा राम मनोहर लोहिया भी समाज में प्रत्येक भेदभाव के खिलाफ थे . लोहिया समानता की बाते करते थे . उन्होंने पिछडो और अनुसूचित जातियों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव की तीव्र निंदा की .  डा लोहिया कहते थे जाति और योनि के वीभत्स कटघरों को तोड़ने से बढ़कर और कोई पुण्य कार्य नहीं है.जाति की चक्की बड़ी निर्दयता से चलती है. अगर वह छोटी जातियों के करोड़ों को पीस देती है, तो ऊँची जाति को भी पीसकर सच्ची ऊँची जाति और झूठी ऊँची जाति में विभक्त कर देती है.  डा अम्बेडकर ने महात्मा गांधी पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया. हालांकि महात्मा गांधी ने भी सदैव भेदभाव समाप्त करने की ही बाते कही थी किन्तु डा अम्बेडकर महात्मा गांधी के नजरिये से असहमत ही दिखे . उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो.  उन्होंने कहा कि 'हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ... राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है. उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा.... उनको शिक्षित होना चाहिए... एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है.' इस भाषण में अम्बेडकर ने कांग्रेस और महात्मा गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की शुरूआत की भी आलोचना की . उनकी आलोचनाओं और उनके राजनीतिक काम ने उनको रूढ़िवादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं मे भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया . डॉ॰ भीमराव आंबेडकर की अस्पृश्य समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको तीनों गोलमेज सम्मेलनों में आमंत्रित किया गया   उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई.   जब सवर्ण हिंदूओं द्वारा पूना संधि के कई दशकों बाद भी अस्पृश्यता का नियमित पालन होता रहा तो डा अम्बेडकर का इस मुद्दे पर महात्मा गांधी के साथ विरोधाभाष न्यायोचित साबित हुआ .





डा अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होने दो वर्ष तक कार्य किया और इसके चलते अंबेडकर बंबई में ही बस गये, उन्होने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय मे 50000 से अधिक पुस्तकें थीं. इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई. रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर अंबेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी थी . अम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दु तीर्थ मे जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही. भले ही अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी लडा़ई को भारत भर से समर्थन हासिल हो रहा था पर उन्होने अपना रवैया और अपने विचारों को रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रति और कठोर कर लिया था . उनकी रूढ़िवादी हिंदुओं की आलोचना का उत्तर बडी़ संख्या मे हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी उनकी आलोचना से मिला. 13 अक्टूबर को नासिक के निकट येओला मे एक सम्मेलन में बोलते हुए अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की. उन्होने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया. उन्होने अपनी इस बात को भारत भर मे कई सार्वजनिक सभाओं मे दोहराया .


डा अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो १९३७ में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 15 सीटें भी जीती. उन्होंने अपनी पुस्तक 'जाति के विनाश' भी प्रकाशित की, इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक मे अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की है .

उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये उन्होने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज़?’( शुद्र कौन थे?) के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं. 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध) मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म को कुछ यू लताड़ा......

हिंदू सभ्यता .... जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा. एक सभ्यता के बारे मे और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया जिसे... एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है?

देश के विभाजन के मुद्दे पर उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान की स्थापना के लिये पर्याप्त कारण मौजूद थे? और सुझाव दिया कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के मतभेद एक कम कठोर कदम से भी मिटाना संभव हो सकता था. उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना चाहिये. कनाडा जैसे देशों मे भी सांप्रदायिक मुद्दे हमेशा से रहे हैं पर आज भी अंग्रेज और फ्रांसीसी एक साथ रहते हैं, तो क्या हिंदु और मुसलमान भी साथ नहीं रह सकते. उन्होंने चेताया कि दो देश बनाने के समाधान का वास्तविक क्रियान्वयन अत्यंत कठिनाई भरा होगा. विशाल जनसंख्या के स्थानान्तरण के साथ सीमा विवाद की समस्या भी रहेगी. 

अपने क्रांतिकारी और समानतावादी विचारों के कारण डा अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था . 29 अगस्त 1947 को, डा अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया.  अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की काफी प्रशंसा अर्जित की.  अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है. 
डा अम्बेडकर द्वारा तैयार किये गये संविधान ने संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया. डा अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की . 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया. अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, डा अम्बेडकर ने कहा :

'मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके. वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था.'

1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी. हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी. डा अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये.  मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे. 
सन् 1950 के दशक में भीमराव अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए सीलोन गये. पुणे के पास एक नया बौद्ध  विहार को समर्पित करते हुए, डॉ॰ अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे. 1955 में उन्होने 'भारतीय बौद्ध महासभा' या 'बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया' की स्थापना की. उन्होंने अपने अंतिम महान ग्रंथ, 'द बुद्ध एंड हिज़ धम्म' को 1956 में पूरा किया. यह उनकी मृत्यु के पश्चात सन 1957 में प्रकाशित हुआ था .  14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया.  डॉ॰ अम्बेडकर ने श्रीलंका के एक महान बौद्ध भिक्षु महत्थवीर चंद्रमणी से पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया . इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार पहले दिन लगभग 5,00,000 समर्थको को बौद्ध धर्म मे परिवर्तित किया. अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने विषमतावादी हिन्दू धर्म और हिन्दू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे सदैव के लिए त्याग दिया. उन्होंने दुसरे दिन 15 अक्टूबर को नागपूर में अपने 2,00,000 अनुयायीओं को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी, फिर तीसरे दिन 16 अक्टूबर को उन्होंने 3,00,000 समर्थकों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी.  इस तरह केवल तीन दिन में ही डा अम्बेडकर ने 10 लाख से अधिक लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया.  


डॉ॰ भीमराव आंबेडकर द्वारा 10,00,000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था, उन्होंने 22 शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके. डा अम्बेडकर की ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं.  इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म, जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है. 

डा अम्बेडकर मधुमेह से पीड़ित थे. जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो कमजोर होती दृष्टि से भी ग्रस्त रहे . राजनीतिक मुद्दों से परेशान डा अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया. अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को अम्बेडकर का महापरिनिर्वाण नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गया. 7 दिसम्बर को डा अम्बेडकर का मुंबई में बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें उनके लाखों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया. उनके अंतिम संस्कार के समय उन्हें साक्षी रखकर उनके करीब 10,00,000 अनुयायीओं ने एक साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, सम्भवतः ऐसा विश्व इतिहास में पहिली बार हुआ होगा . मृत्युपरांत अम्बेडकर के परिवार मे उनकी दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर रह गयी थीं जो, जन्म से ब्राह्मण थीं पर उनके साथ ही वो भी धर्म परिवर्तित कर बौद्ध बन गयी थीं. विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम डॉ॰ शारदा कबीर था. डॉ॰ सविता अम्बेडकर की एक बौद्ध के रूप में सन 2002 में मृत्यु हो गई, 1990 में डा अम्बेडकर को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया .






Tuesday, 24 January 2017

जननायक कर्पूरी ठाकुर




समाजवादी नायको की श्रंखला में एक प्रमुख नायक के रूप में श्री कर्पूरी ठाकुर जी का नाम जाना जाता है . कर्पूरी साहब का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जहा जन्मतिथि लिख कर नही रखी जाती थी. कदाचित स्कुल के नामांकन में उनकी जन्मतिथि २४ जनवरी १९२४ अंकित होने के कारण उनका जन्मदिवस २४ जनवरी को ही माना जाता है . कर्पूरी जी का व्यक्तित्व समाजवादी नेताओं की भाँती बहुत ही सहज था . जनता की मदद के लिए वह सदैव हाजिर रहते थे . वह कर्मठ एवं महान कर्मयोगी थे .पिछडो , गरीबो , शोषितों , आदिवासियों , महिलाओं की लड़ाई लड़ने की शुरुआत उन्होंने १९४२ के असहयोग आन्दोलन में कूद कर की थी . वह देशभक्त स्वतन्त्रता सेनानी और समाजवादी क्रांतिकारी थे जिसके कारण उन्हें आजादी से पहले 2 बार और आजादी मिलने के बाद 18 बार जेल भी जाना पड़ा था .


कर्पूरी जी की ईमानदारी के कई किस्से आज भी बिहार में काफी चर्चित हैं. कर्पूरी ठाकुर जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उनके रिश्ते में उनके बहनोई उनके पास नौकरी के लिए गए और कहीं सिफारिश से नौकरी लगवाने के लिए कहा. उनकी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर जी काफी गंभीर हो गए. उसके बाद उन्होंने अपनी जेब से 50 रुपये निकालकर उन्हें दिए और कहा, जाइए, उस्तरा आदि ख़रीद लीजिए और अपना पुश्तैनी धंधा शुरू कर लीजिये. इसी तरह , कर्पूरी ठाकुर जब पहली बार उपमुख्यमंत्री बने या फिर मुख्यमंत्री बने तो अपने बेटे रामनाथ को खत लिखना नहीं भूलते थे . इस ख़त में क्या था, इसके बारे में उनके पुत्र रामनाथ कहते हैं, पत्र में तीन ही बातें लिखी होती थीं- तुम इससे प्रभावित नहीं होना. कोई लोभ लालच देगा, तो उस लोभ में मत आना. मेरी बदनामी होगी. रामनाथ ठाकुर इन दिनों भले राजनीति में हों और पिता के नाम का फ़ायदा भी उन्हें मिला हो, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने अपने जीवन में उन्हें राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ाने का काम नहीं किया. हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने एक संस्मरण में लिखा था , “कर्पूरी ठाकुर की आर्थिक तंगी को देखते हुए देवीलाल जी ने पटना में अपने एक हरियाणवी मित्र से कहा था- कर्पूरीजी कभी आपसे 5-10 हज़ार रुपये मांगें तो आप उन्हें दे देना, वह मेरे ऊपर आपका कर्ज रहेगा. बाद में देवीलाल ने अपने मित्र से कई बार पूछा- भई कर्पूरीजी ने कुछ मांगा किन्तु हर बार मित्र का जवाब होता- नहीं साहब, वे तो कुछ मांगते ही नहीं है. इससे स्पष्ट है कि कर्पूरी जी बेहद ईमानदार और सिद्धांतवादी नेताओ की श्रेणी में आते है .


1948 में आचार्य नरेंद्रदेव एवं श्री जयप्रकाश नारायण के समाजवादी दल में प्रादेशिक मंत्री भी बनने का सौभाग्य जननायक कर्पूरी जी को प्राप्त हुआ. सन् 1967 के आम चुनाव में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में संसोपा संयुक्‍त विधायक दल बड़ी ताकत के रूप में उभरी. 1967 के आम चुनाव में डा राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया गया था . इस चुनाव में कांग्रेस पराजित हुई और बिहार में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी. डा लोहिया की विचारधारा के अनुरूप सत्ता में आम लोगों और पिछड़ों की भागीदारी बढ़ी. कर्पूरी जी इस सरकार में उप मुख्यमंत्री बनाये गये . 


1970 में वह पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने . उसके बाद 1973-77 में वह लोकनायक जयप्रकाश के आंदोलन से जुडे. 1977 में वह काफी समय तक बिहार की राजनीति में समाजवादी विचारों के प्रेरणा पुंज बने रहे . 1977 में वह समस्तीपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से सांसद बने. एक बार फिर वह 24 जून, 1977 को मुख्यमंत्री के पद पर काबिज हुए . तत्पश्चात 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ तो कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में लोक दल बिहार विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरा और कर्पूरी ठाकुर जी उसके मुख्य नेता बने. 

1977 के चुनाव में पहली बार सत्ता में पिछड़ा वर्ग को निर्णायक बढ़त हासिल हुई थी मगर प्रशासन-तंत्र पर उनका नियंतण्र नहीं था. इसलिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग जोर-शोर से की जाने लगी थी .तब कर्पूरी जी ने मुख्यमंत्री की हैसियत से उक्त मांग को संविधान सम्मत मानकर एक फॉर्मूला निर्धारित किया और काफी विचार-विमर्श के बाद उसे लागू भी कर दिया.



1978 में बिहार का मुख्यमंत्री रहते हुए जब उन्होंने पिछड़े वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू किया तो उन्हें काफी अपमान झेलना पड़ा . लोग उनकी मां-बहन-बेटी-बहू का नाम लेकर भद्दी गालियां देते थे . अभिजात्य वर्ग के लोग उन पर तंज कसते हुए कहते - कर कर्पूरी कर पूरा, छोड़ गद्दी, धर उस्तरा. यह तंज इसलिए कि कर्पूरी ठाकुर नाई समुदाय से ताल्लुक रखते थे. 1978 में कर्पूरी ठाकुर की सरकार ने सिंचाई विभाग में 17000 पदों के लिए आवेदन मंगाए थे . लेकिन इसके हफ्ता भर बीतते ही उनकी सरकार गिर गई. लोग इन दोनों बातों का आपस में संबंध मानते हैं. लोगो के अनुसार पहले होता यह था कि बैक डोर से अस्थायी बहाली कर दी जाती थी, बाद में उसी को नियमित कर दिया जाता था. किन्तु एक साथ इतने लोग खुली भर्ती के ज़रिये नौकरी पाएं, यह सरकारी व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे एक वर्ग को मंजूर नहीं था इसलिए कर्पूरी ठाकुर को कुर्सी से जाना पड़ा था .

1952 में कर्पूरी ठाकुर जब पहली बार विधायक बने थे उन्हीं दिनों उनका आस्ट्रिया जाने वाले एक प्रतिनिधिमंडल में चयन हुआ था. उनके पास कोट नहीं था. तो एक दोस्त से कोट मांगा गया. वह भी फटा हुआ था. खैर, कर्पूरी ठाकुर वही कोट पहनकर चले गए. वहां यूगोस्लाविया के मुखिया मार्शल टीटो ने जब देखा कि कर्पूरी जी का कोट फटा हुआ है, तो उन्हें एक नया कोट गिफ़्ट किया गया. आज तो राजनेता अपने महंगे कपड़ों और दिन में कई बार ड्रेस बदलने को लेकर ही चर्चा में आते रहते हैं.

इसी प्रकार 1974 में कर्पूरी ठाकुर के छोटे बेटे का मेडिकल की पढ़ाई के लिए चयन हुआ. पर वे बीमार पड़ गए. दिल्ली के राममनोहर लोहिया हास्पिटल में भर्ती थे. हार्ट की सर्जरी होनी थी. इंदिरा गांधी को जैसे ही पता चला, एक राज्यसभा सांसद को वहां भेजा और उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया . इंदिरा जी ख़ुद भी दो बार मिलने गईं. उन्होंने सरकारी खर्च पर इलाज के लिए अमेरिका भेजने की पेशकश की. किन्तु कर्पूरी ठाकुर को जब पता चला तो उन्होंने कहा कि वह मर जाएंगे पर बेटे का इलाज़ सरकारी खर्च पर नहीं कराएंगे. बाद में जयप्रकाश जी ने कुछ व्यवस्था कर न्यूज़ीलैंड भेजकर उनके बेटे का इलाज़ कराया.

एक बार प्रधानमंत्री चरण सिंह जब उनके घर गए तो घर का दरवाज़ा इतना छोटा था कि चौधरी जी को सर में चोट लग गई. तब पश्चिमी उत्तर प्रदेश वाली खांटी शैली में चरण सिंह जी ने कहा, ‘कर्पूरी, इसको ज़रा ऊंचा करवाओ.’ तो कर्पूरी जी ने कहा ‘जब तक बिहार के ग़रीबों का घर नहीं बन जाता, मेरा घर बन जाने से क्या होगा?’


64 साल की उम्र में 17 फरवरी 1988 को कर्पूरी ठाकुर का निधन दिल का दौरा पड़ने से हो गया .कर्पूरी ठाकुर जी दलित, शोषित,पिछड़े और वंचित वर्ग के उत्थान के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे और संघर्ष करते रहे. उनका सादा जीवन सरल स्वभाव और अदम्य इच्छाशक्‍त‌ि उनके विराट व्यक्‍त‌ित्व की पहिचान थी . कर्पूरी जी के सहज और असाधारण कार्यो वाले व्यक्तित्व को किसी किताब या लेख में कैद करना सम्भव नही है . आज पिछड़े समाज के लोगो को खुद नही मालुम कि ये कर्पूरी ठाकुर कौन थे . त्याग और समाजसेवा से जुड़े जननायक कर्पूरी जी को आज इस देश का जनमानस ही नहीं बल्कि उनका नाई समाज भी भुला बैठा है . 

















Saturday, 31 December 2016

लोकबन्धु राज नारायण


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राजनारायण का कलेजा शेर जैसा व आचरण महात्मा गांधी सरीखा है----डा राम मनोहर लोहिया 




'राज नारायण ' कितना साधारण सा लगता है ये एक आम भारतीय का नाम . लेकिन इस एक आम आदमी के असाधारण कारनामे सुन कर पैरो के नीचे से जमीन खिसक जाती है .जी हा ये वही लोकबन्धु राजनारायण है जिन्हें आज पूरा देश लगभग भूल चूका है. लोकबन्धु राजनारायण एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने अजेय समझी जाने वाली पूर्व प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी को भी रायबरेली के आम चुनाव में होने वाले भ्रष्टाचार पर कोर्ट के द्वारा  मात दी थी . 1971 में वह रायबरेली से लोकसभा का चुनाव सत्ता के इशारे पर इंदिरा गांधी जी से हार गए थे . जब कि राज नारायण जी को इस चुनाव में अपनी जीत का पूरा भरोसा था . कार्यकर्ताओ से जानकारी करने पर पता चला कि प्रधानमन्त्री के इशारे पर इस चुनाव में खूब धांधली हुई है सो उन्होंने इस चुनाव को रद्द करने के लिए इलाहाबाद हाइकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल कर दी , एक अजेय प्रधानमन्त्री के खिलाफ चुनावी हार के बाद अदालत में याचिका ....... लोग उन पर खूब हंसे. लेकिन जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा का ऐतिहासिक फैसला आया, तो एक नया इतिहास बन गया. ये बेईमानी का चुनाव रद्द हो गया . दुबारा मतों की गिनती हुई और राजनारायण जी विजयी घोषित हुए . अपनी इस हार पर खीझ कर आयरन लेडी कही जाने वाली इंदिरा गांधी जी ने पुरे देश में आपातकाल लगा दिया .आगे इसी आपातकाल के फैसले के बाद लोकनायक जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में ऐसा जबर्दस्त उबाल आया कि देश में भूचाल आ गया था और लोकतंत्र ने तानाशाही को परास्त किया था .


ऐसे स्वभाव के फक्कड़ लोकबन्धु जी का जन्म २३ नवम्बर १९१७ को वाराणसी की मोतिकोट गाव में एक भूमिहार ब्राह्मण जमीदार परिवार में हुआ था व महाराजा चेत सिंह व बलवंत सिंह उनके वशंज थे जो त्यागी भूमिहार थे. उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एमए एलएलबी पास किया. परिवार के लोग उन्हें सरकारी अदालत में देखना चाहते थे पर राजनारायण जी को जनता की अदालत पसंद थी .एक जमीदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद भी वह जमीदारी सामंतशाही के सख्त खिलाफ थे .शिछा लेने के बाद उन्होंने आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया. भारत छोड़ों आंदोलन में उनकी सक्रियता को देखते हुए अंग्रेज सरकार ने उन पर 5 हजार रुपए का इनाम घोषित किया था. आजादी के बाद वे आचार्य नरेंद्र देव, राममनोहर लोहिया की समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. 


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कुछ लोगो के अनुसार वह एक कबीरपंथी थे . सही मायने में वह एक समाजवादी नेता थे . क्रांतिकारी होने के साथ साथ वह एक महान समाज सुधारक भी थे . हरिजनों के मंदिरों में प्रवेश करने हेतु उन्होंने मुखर संघर्ष किया . राजनारायण जी के अनुसार भगवान् सबके है ,वह केवल ब्राह्मनो के ही नहीं है .काशी के विश्वनाथ मंदिर में पंडो के घोर विरोध के बावजूद उन्होंने जुलुस निकाल कर हरिजनों को मंदिर में प्रवेश दिलाया .हालांकि इस संघर्ष में काफी मार- पीट हुई थी . राजनारायण जी के दाढ़ी के बालो को भी पंडो द्वारा नोचा गया किन्तु राजनारायण जी जिस उद्देश्य को ठान लेते थे उसे पूरा कर के ही दम लेते थे . वे छुआ छुत जैसी कुप्रथाओं से समाज को मुक्त कराना चाहते थे . सही मायने में वे एक अछुतोद्धारक भी थे . 




१९४२ में अंग्रेजो के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अंग्रेजी सरकार ने उनके ऊपर ५०००/- रूपये का इनाम घोषित कर दिया था .इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस वक्त वह कितने मुखर और प्रभावशाली क्रांतिकारी रहे होंगे. राजनारायण जी ने डा लोहिया की पार्टी " सोशलिस्ट पार्टी " से अपना नाता जोड़ा और समाजवादी आन्दोलन के प्रचार के लिए अपने साथियों के साथ पुरे देश में भ्रमण किया . वह मुम्बई भी गये . वहा रह रहे उत्तर भारतीयों को उन्होंने समझाया की छः एकड़ से कम के किसानो की लगान कांग्रेस सरकार से अगर माफ़ करवानी है तो इसे वोट न दे और समाजवादी पार्टी को वोट दे. उनका आन्दोलन जबरदस्त था .मुम्बई में समाजवादी पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली थी .असल में वह एक समता मूलक समाज की स्थापना चाहते थे . अन्याय से लड़ने को सदैव तत्पर रहते थे .वह समाजवाद के लिए पूर्णतया समर्पित थे और कहते थे कि जिसे अपना घर फुकना हो वो हमारे साथ आये यानी घर के नाम पर कोई बहाना नहीं चलेगा . वह अपने साथ गुड- चना रखते थे और जब भोजन का समय नहीं मिलता तो उसी गुड चने से ही अपना काम चलाते थे .उनके अन्याय के खिलाफ लड़ने का जज्बा देख कर भ्रष्ट सरकारी अफसर भी उनसे कापते थे .


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देश को आजादी मिलने के बाद भी बनारस के बनिया बाग़ में ब्रिटेन की महारानी की मूर्ति स्थापित थी जो की देश की गुलामी की प्रतीक थी . उस मूर्ति को हटाने की बात से राजनारायण जी भी सहमत थे किन्तु सरकारी पुलिस से कौन भिड़ता . राजनारायण जी ने खुद इसे अंजाम देने का संकल्प किया . भारी पुलिस सुरछा के बावजूद वह जुलुस के साथ उस मूर्ति को तोड़ने निकले . पुलिस को चकमा देकर वे मूर्ति के पास पहुच ही गए . पुलिस उनके पीछे उन्हें पकड़ने की कोशिश जब तक करती तब तक लोकबन्धु जी ने धक्का मार कर पराधीनता की प्रतीक बनी उस मूर्ति को मिटटी में मिला दिया . लोकबन्धु जी गिरफ्तार हुए पुलिस ने डंडे भी चलाए पर इस क्रांतिकारी ने तो अपना आन्दोलन पूरा कर ही लिया था . बनारस में इसी स्थान को " लोकबन्धु राजनारायण पार्क " के नाम से जाना जाता है . 


भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव में भ्रष्टाचार और अनियमितता का मुद्दा होने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा दायर करने वाला वाक्या तो हर कोई जानता ही है . मुख्य न्यायधीश जगमोहन सिन्हा ने चुनावी भ्रष्टाचार में इंदिरा गाँधी को दोषी करार दिया था . इस मुकदमे में इंदिरा जी की हार हुई थी और राजनारायण जी की जीत .इसी हार से खीझ कर इंदिरा जी ने पुरे देश में आपात काल लगा दिया था . १९७५ में आपात काल में जेल से रिहा होने के बाद १९७७ में रायबरेली से ही राजनारायण जी ने भारी मतों से चुनाव जीता .


राजनारायण जी के व्यक्तित्व में हनुमान जी के समान तेज था. डा लोहिया के जीवित रहते उन्होंने कई ऐतिहासिक सत्याग्रह व आंदोलन किए थे. उदाहरण के लिए 956 में काशी विश्वनाथ मंदिर में हरिजन प्रवेश आंदोलन, अंग्रेजी हुकूमत की महारानी विक्टोरिया की काशी में लगी मूर्ति का भंजन आंदोलन, गरीबों को रोटी दिलाने के लिए विधानसभा में सत्याग्रह, जो जमीन को जोते-बोए, उसको जमीन का मालिक बनाने के लिए सत्याग्रह इत्यादि . डा लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी में लोकबन्धु जी प्रमुख नेता बन कर उभरे . मधु लिमये और मामा बालेश्वर जी के साथ इनकी अच्छी खासी जमती थी . जनता पार्टी की सरकार में लोकबन्धु को 'स्वास्थ्य मंत्री ' का कार्यभार सौपा गया . जिसे उन्होंने बड़ी ईमानदारी से निभाया . राजनारायण जी काफी सम्पन्न घराने से थे और उनके पास 800 बीघा जमीन थी लेकिन उसे भी उन्होंने दलितों में बांट दिया था .



लोकबन्धु बहुत ही संकल्पवान और गंभीर शक्शियत वाले थे .लखनऊ में एक बार एक सभा जिसमे डा लोहिया के साथ कई वरिष्ठ समाजवादी थे उसका संचालन करते हुए उनके लिए एक शोक संदेश आया , जो की उनके ज्येष्ठ पुत्र गोपाल जी के निधन का था , तार में उनसे अविलम्ब घर आने को लिखा हुआ था . किन्तु वह दुखद सन्देश उन्हें देने की हिम्मत कोई नही कर पा रहा था . ये बात डा लोहिया को बतायी गयी . डा लोहिया ने वह तार उन्हें दिखाया और बनारस तु्रनत जाने को कहा . पर ये क्या ......लोकबन्धु जी ने वह तार अपनी जेब में रख लिया और सभा का संचालन करते रहे . कार्यवाही में कोई बाधा नहीं आने दी और न ही वे तनिक भी विचलित हुए . सभा विसर्जन के बाद उनसे लोगो ने शिकायत की ,आप गए क्यों नहीं ? ये सुन कर लोकबन्धु बोले ,” देश में रोज हजारो बच्चे मर रहे है ...कुछ भूख से ..कुछ बिमारी से मर रहे है ..उनकी म्रत्यु पर आप लोग तनिक भी दुःख नहीं करते ,मेरे लड़के के निधन पर आप लोग क्यों इतना दुखित हो रहे है ? क्या गरीबो के बच्चे ,बच्चे नहीं होते ? ये सुन कर लोग अवाक हो गए . वास्तव में लोकबन्धु एक लोह्पुरुष ही थे और जनमानस के बीच रमे हुए थे .वह डा लोहिया के बहुत ही नजदीक थे . डा लोहिया उन्हें शेर दिल और गाँधी जी की नीतियों पर चलने वाला शख्स कहते थे .वह लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में रहे . १९७७ से १९८० तक मोरार जी की सरकार में वह स्वास्थ्य मंत्री भी रहे .

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लोकबन्धु राजनारायण जी अपने सम्पूर्ण ६९ वर्ष के जीवनकाल में ८० बार जेल गए .उन्होंने कुल १७ वर्ष जेल में बिताए जिसमे से तीन वर्ष अंग्रेजी राज में और १४ वर्ष कांग्रेस राज में . राजनारायण आम जनता के नायक थे . वह समाजवाद को मानने वाले एक महान व्यक्तित्व थे . ३१ दिसम्बर १९८८ को डा राम मनोहर लोहिया अस्पताल ,नई दिल्ली में २३:५५ मिनट पर जब उन्होंने अपना शरीर त्यागा तो ये दुखद समाचार आग की तरह पुरे देश में फ़ैल गया . देश में शोक लहर व्याप्त हो गयी .किसान ,शिछ्क ,मजदुर ,वकील सभी अपना काम धंधा छोड़ कर वाराणसी उनकी शव यात्रा में पहुच गये . लगभग पूरा वाराणसी ही शव यात्रा में शामिल हुआ . जब ‘ मणिकारणिका घाट ‘ पर उनका अंतिम संस्कार हुआ तो चारो और ‘लोकबन्धु राजनारायण अमर रहे ‘ के नारे गूंज उठे .समाजवादी आन्दोलन के इस योधा की कहानी मिडिया बताये या न बताए पर उनकी चर्चा गावो में खेतो के खलिहानों ,चौपालों में ,आम जनमानस में लोक कथाओं की तरह सुनी सुनाई जाती है . राजनारायण जी के पीछे उनके तीन पुत्र श्री राधेमोहन जी , श्री जयप्रकाश जी ,श्री ओमप्रकाश जी है . 


डा राम मनोहर लोहिया उनके आदर्श व प्रेरणा, दोनों ही थे. उनके प्रखर समाजवादी विचारों को साकार करने में लोकबन्धु जीवनर्पयंत लगे रहे.  डा लोहया को अपना सब कुछ मानने वाले राजनीति के इस फक्कड संत लोकबन्धु के पास भी अपनी म्रत्यु के समय बैंक खाते में मात्र 1450 रुपए ही थे. देश में स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद भी राजनारायण धन -दौलत की जगह जनता के सेवक थे . लोकबन्धु का सम्पूर्ण जीवन लोकतंत्र की एक किताब है .लोकबन्धु जी के बारे में डा. लोहिया ने एक बार कहा था- उनका कलेजा शेर जैसा व आचरण महात्मा गांधी सरीखा है. अगर इस देश में 3-4 और राजनारायण मिल जाएं तो यहां कभी तानाशाही लागू ही नहीं हो सकती है.डा लोहिया कहते थे कि जब तक राजनारायण जिन्दा है तब तक इस देश में लोकतंत्र मर नही सकता है .


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राजनारायण बनाम इंदिरा गाँधी 
लोकबन्धु के बारे में मुलायम सिह जी के विचार