Saturday, 23 June 2018

काशीराम



डा अम्बेडकर के बाद दलित जनसमूह में सबसे बडा राजनैतिक कद यदि किसी अन्य राजनेता का है तो वह और कोई दूसरा शख्स नही बल्कि बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक काशीराम जी का है. कहा जाता है काशीराम जी ने अपना घर त्यागने से पहले परिवार के लिए एक चिट्ठी छोड़ दी थी जिसमे उन्होंने लिखा था, ‘अब कभी वापस नहीं लौटूंगा’, और वे सच में वापस कभी अपने घर नहीं लौटे. परिवार के सदस्यों की मृत्यु पर भी वे अपने घर नहीं गए. परिवार के लोग कभी लेने आए भी तो उन्होंने जाने से इनकार कर दिया. इससे उनके काफी द्रढ़ निश्चयी होने का भी पता चलता है .

काशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पिर्थीपुर बुंगा ग्राम, खवसपुर,जिला रूपनगर पंजाब में हुआ था . 1958 ई में स्नातक की पढाई करने के बाद काशीराम जी ने डीआरडीओ से बतौर सहायक वैज्ञानिक के रूप में अपना कैरियर प्रारम्भ किया . यहा नौकरी करते हुए डा अंबेडकर जयंती पर सार्वजनिक छुट्टी को लेकर हुए विवाद ने नौकरी से उनका मोह भंग कर दिया .इसके बाद कांशीराम जी ने अपनी नौकरी छोड़कर ख़ुद को सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष में झोंक देने का मन बना लिया . इसके संकल्प हेतु उन्होंने नौकरियों में लगे अनुसूचित जातियों -जनजातियों, पिछड़े वर्ग और धर्मांतरित अल्पसंख्यकों के साथ मिलकर 'बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एंप्लायीज फेडरेशन' (बामसेफ़) की स्थापना की. 

कांशीराम दलितों के साथ हो रहे सामाजिक भेदभाव से काफी आहत थे . इसलिए वह दलित बिरादरी को डा अम्बेडकर और डा राम मनोहर लोहिया की सामाजिक समानता की विचारधारा तक लाना चाहते थे . वह दलितों के साथ होने वाले अपमान और शोषण बर्दाश्त नहीं कर पाते थे. कहा जाता है कि एक बार कांशीराम रोपड़ जिले के एक ढाबे में गए थे . वहां उन्होंने खाना खा रहे कुछ ज़मींदारों को अपनी शेख़ी बघारते हुए सुना कि किस तरह उन्होंने खेतों में काम कर रहे दलितों को सबक सिखाने के लिए उनकी जम कर पिटाई की है. ये सुन कर कांशीराम का ख़ून खौल उठा और वो इतने गुस्से में आ गये कि उन्होंने एक कुर्सी उठाकर उसी से उन ज़मीदारों की पिटाई करनी शुरू कर दी .

समय के साथ -साथ राजनीति के अनुभवो से सीख लेते हुए सन 1981 में कांशीराम जी ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति की शुरुआत की जिसे आज डीएस4 के नाम से भी जाना जाता है. इसी राह पर चलते हुए उन्होंने सन 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का गठन कर दिया . कांशीराम कहते थे कि दलित और दूसरी पिछड़ी जातियों की संख्या भारत की जनसंख्या की 85 फ़ीसदी है, लेकिन उनके ऊपर 15 फ़ीसदी सवर्ण जातियाँ सदियों से शासन कर रही हैं. इसलिए वह देश में बहुजन समाज को सत्ता में लाना चाहते थे . उन्हें पता था यह काम काफी मुश्किल है लेकिन असम्भव भी नही है . उनका मानना था कि लोकतंत्र में जिनकी संख्या ज़्यादा होती है उनको शासक होना चाहिए. इसीलिए उन्होंने एक नारा लगाया था 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी.' इसी तरह बहुजन की लड़ाई लड़ते हुए उन्होंने एक और नारा दिया था 'जो बहुजन की बात करेगा, वो दिल्ली पर राज करेगा'."

कांशीराम जी ने 1988 में इलाहाबाद से लोकसभा का उपचुनाव लड़ा था .लेकिन इस उपचुनाव में उनकी हार हुई . किन्तु वह उस समय के कद्दावर नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे मज़बूत प्रतिद्वंदी के ख़िलाफ़ 68000 से अधिक वोट करने में सफल रहे. राजनीति के माहोल में उन दिनों उन्ही की तरह इटावा से डा राम मनोहर लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले और किसानो के नेता मुलायम सिह यादव भी काफी दिनों से संघर्षरत थे . समान विचारों और पिछडो का राजनैतिक वजूद बनाने की इच्छा ने दोनों नेताओ को 1993 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सुनहरा अवसर प्रदान किया . काशीराम जी की बसपा ने मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन कर लिया . इस गठजोड़ ने इन दोनों पार्टियों को उत्तर प्रदेश में एक राजनैतिक जीवन प्रदान किया . उत्तर प्रदेश में समाजवादी नेता मुलायम सिह यादव बसपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपनी लोकसभा सीट इटावा से काशीराम को जिता कर पहली बार संसद तक पहुचाया .

काशीराम अपने सहयोगी मायावती को अपना उत्तराधिकारी मानते थे . इसलिए बसपा की कमान भी उन्होंने मायावती को दे दी . मायावती सख्त स्वभाव की मानी जाती है . काशीराम के साथ उनके रिश्तो पर काफी संशय बना रहा . मायावती के स्वभाव के कारण सपा और बसपा का साथ ज्यादा दिनों तक नही चला . फिर जिस मनुवाद के खिलाफ काशीराम आजीवन लड़ाई लड़ते रहे , उन्ही मनुवादी शक्तियों के गोद में  बसपा बैठती रही . कभी दलितों और पिछडो की लड़ाई को अपना आराध्य मानने वाली बसपा मायावती की जिद के कारण मनुवादी कही जाने वाली भाजपा की सरकार ही बनवाती रही . अपनी खुद की पार्टी में काशीराम मूक दर्शक ही बने रहे .

एक बार प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने काशीराम जी से राष्ट्पति बनने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने कहा कि वह राष्ट्रपति की जगह प्रधानमंत्री बनना पसंद करेंगे. उनका मतलब स्पष्ट था कि राष्ट्रपति बन कर वह चुपचाप नहीं बैठना चाहते है .वह सत्ता का बंटवारा चाहते थे. जिसके लिए वह पंजाबी के गुरुकिल्ली शब्द का इस्तेमाल करते थे, जिसका अर्थ था सत्ता की कुंजी. उनका मानना था कि ताकत पाने के लिए सत्ता पर कब्ज़ा ज़रूरी है. 

साल 2003 में कांशीराम जी गंभीर रूप से बीमार हो गए. उस समय उनकी उत्तराधिकारी मायावती ने उनका ख़्याल रखा हालांकि इस पर काफी विवाद भी हुआ जब उन्होंने कांशीराम के परिवार वालों को उनसे मिलने नहीं दिया. उनके आखिरी दिन काफी बुरे रहे . एक बार जब वह ट्रेन से कही जा रहे थे तभी उनका ब्रेन हैमरेज हो गया. जब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया तो उन्हें स्मृतिलोप हो चुका था. वह लोगों को पहचान नही सकते थे. मायावती उन्हें अपने घर ले गईं. जिसका कांशीराम के भाइयों ने काफी विरोध किया और वो एक बड़ी लड़ाई में फंस गए. मायावती उन्हें अपने यहां रखना चाहती थीं और उनके परिवार वाले उन्हें अपने यहां ले जाना चाहते थे. बीमारी से जूझते हुए 9 अक्टूबर 2006 को वह इस संसार से विदा हो गये .

Friday, 22 June 2018

अमरीश पुरी




मोगैम्बो खुश हुआ !!


ये लोकप्रिय संवाद हिंदी फिल्म के किस प्रशंसक ने नही सुना होगा . हमारी हिंदी फिल्मो की यह परम्परा है कि अगर कोई फ़िल्मी संवाद लोकप्रिय होता है तो उसे बोलने वाला कलाकार भी उसके साथ अमर हो जाता है . आज ही के दिन यानि 22 जून 1932 को हिंदी फिल्मो के मशहूर विलेन मोगैम्बो उर्फ़ अमरीश पूरी जी का जन्म हुआ था . कहा जाता है कि अमरीश पुरी, अनुभवी अभिनेता और गायक के.एल सहगल के चचेरे भाई थे.

सिनेमा के परदे पर अमरीश पूरी का अभिनय काफी दमदार रहता था . कई फिल्मो में तो वह फ़िल्मी हीरो पर भी भारी पड़ते नजर आते थे . एक्टिंग के नजरिये से वह काफी मंझे हुए कलाकार थे .






















कहा जाता है कि अमरीश पूरी एक्टिंग से पहले राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ के सदस्य के तौर पर कार्य करते थे किन्तु 30 जनवरी 1948 को राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति अमरीश पुरी की निष्ठा लड़खड़ाने लगी, और उन्होंने चुपचाप खुद को संघ की सक्रिय भागीदारी से अलग कर लिया. इस राष्ट्रीय त्रासदी की दिल दहला देने वाली घटना ने न सिर्फ उन्हें स्तब्ध किया था , बल्कि अंदर से तोड़ ही दिया था . जिसके बाद वह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ गये और फिल्मो में अमरीश पुरी बतौर विलेन बेहद कामयाब हुए . अपनी अभिनय कला से लोगो का मनोरंजन करते हुए 12 जनवरी 2005 को 72 साल की उम्र में इस दुनिया से विदा हो गये .




शेक्सपियर ने कहा था कि यह दुनिया भी एक रंगमंच है जिसमे हर शख्स अपनी -अपनी भूमिका को जी रहा है . अमरीश पूरी के जीवन में भी उनकी जिन्दगी के अनेक रंग नजर आते है . किन्तु जो रंग सबसे अधिक गहरा है , वह यह कि उन्होंने हिंदी फिल्मो में एक कामयाब विलेन बन कर अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ दिए . वास्तव में हिंदी फिल्मो के इस मोगैम्बो ने अपनी अभिनय कला से अपने सभी प्रसंशको को बेहद खुश कर रखा था . उनके जाने के बाद हिंदी फिल्मो में विलेन की भूमिका निभाने वाले तमाम अभिनेता उनके जैसी प्रभावशाली छाप अभी भी नही छोड़ सके है .








Thursday, 7 June 2018

वामपंथ और दछिणपंथ


राजनीति में वृहद और व्यापक रूप से राजनैतिक दलों के मुद्दे तो अक्सर बदलते ही रहते है लेकिन एक बात है जो अपरिवर्तित रहती है , वह है उन दलों की विचारधारा . मुख्य रूप से राजनीति में 2 विचारधाराए है जिनसे विचारों की अनेक शाखाओ का विस्तार होता रहा है . इन 2 विचारधाराओ को हम द्छिणपंथी और वामपंथी के नामो से अक्सर सुनते रहते है . आखिर क्या है ये दक्षिणपंथी और वामपंथी . आइये एक नजर इन दोनों की विषय -वस्तु पर डालते है . 
दक्षिणपंथी

ये राजनीतिक दल मूलतः नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के समर्थक होते है, जो बाज़ार को राज्य के नियंत्रण से मुक्त रखने की बात करते हैं, ये निजीकरण के हिमायती बनते हैं किन्तु सामाजिक मुद्दों व धर्म में अनुदारवादी रवैया अपनाते हैं और सदियों से चली आ रही रुढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहते है. धार्मिक मसलो में इनके विचार कट्टर होते है . ये संस्कृति के नाम पर राष्ट्रवाद को आगे बढाते हैं. ऐसे दलों का सामाजिक आधार मुख्यतः उच्च व मध्य वर्ग (व्यापारी वर्ग) का एक बड़ा हिस्सा होता है.
वामपंथी 

ये राजनीतिक दल समानता , विकास और समाजवाद पर बल देते है . ये गरीबों, मजदूरों, कृषकों व आम जनता के हितैषी तथा निजीकरण, बड़े उद्योगपतियों के बिलकुल विरोधी होने के साथ नवउदारवादी नीतियों के घोर विरोधी भी होते हैं. ये सामाजिक बदलाव / सुधार तथा आर्थिक लोकतंत्र के प्रति अपनी कड़ी प्रतिबद्धता रखते है. ऐसे राजनीतिक दल चाहते हैं कि बाज़ार का संचालन राज्य स्वयं करे क्योंकि बाज़ार कमज़ोर वर्ग का शोषण करता है, जिसे राज्य द्वारा विशेष नियमो से ही वापस मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है. अत: वामपंथ सकारात्मक समतावाद में विश्वास रखता है. इन दलों का सामाजिक आधार व समर्थन गरीब व वंचित वर्ग ही सामान्यत: करते है.





Saturday, 5 May 2018

कार्ल मार्क्स



जर्मन दार्शनिक व अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स का नाम किसी पहचान का मोहताज नही है . जो लोग अन्याय, गैर-बराबरी और शोषण को खत्म होते देखना चाहते हैं उनके लिए आज का दिन यानी 5 मई बहुत ही ख़ास है. इस दिन कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ था और आज उनका 200वां जन्मदिन है.


मार्क्स के क्रांतिकारी विचारो का ही ये परिणाम था कि सोवियत संघ, साम्यवादी चीन, पूर्वी यूरोप सहित दुनिया भर में समाजवादी क्रांतियों से अनेक समाजवादी सरकारों का गठन हुआ. हालांकि मार्क्स की आदर्श परिकल्पना को ये समाजवादी सरकारे हकीकत में नही बदल सकी जिसके फलस्वरूप धीरे -धीरे दुनियाभर में समाजवाद कमजोर होता गया .इसके बावजूद आज भी कई देशो में समाजवादी सरकारे शासन चला रही है . 

मार्क्स ने आम जनता का चिन्तन कर अनेक राजनैतिक और आर्थिक विचारधाराए प्रस्तुत की . उन्होंने वैज्ञानिक समाजवाद के साथ वर्ग संघर्ष की व्याख्या भी प्रस्तुत की . 'दास कैपिटल ' पूंजीवाद पर लिखी उनकी एक सर्वोत्तम पुस्तक है . मार्क्स ने उस सर्वग्राही पूंजीवाद के ख़िलाफ़ दार्शनिक तरीक़े तर्क रखे, जिसने पूरी मानव सभ्यता को ग़ुलाम बना लिया. उन्होंने पूंजीवादी समाज में 'वर्ग संघर्ष' की बात की है और बताया है कि कैसे अंततः संघर्ष में सर्वहारा वर्ग पूरी दुनिया में बुर्जुआ वर्ग को हटाकर सत्ता पर कब्ज़ा कर लेगा. वास्तव में 20वीं शताब्दी में मज़दूरों ने रूस, चीन, क्यूबा और अन्य देशों में शासन करने वालों को उखाड़ फेंका और निज़ी संपत्ति और उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लिया. मजदूरों के हितो की लड़ाई लड़ते हुए सन 1864 में लंदन में 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' की स्थापना में भी मार्क्स ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी .

मार्क्स का मानना था कि बाज़ार को चलाने में किसी अदृश्य शक्ति की भूमिका नहीं होती. बल्कि वो कहते हैं कि मंदी का बार बार आना तय है और इसका कारण पूंजीवाद में ही निहित है.मार्क्स के सिद्धांत का एक अहम पहलू है- 'अतिरिक्त मूल्य.' ये वो मूल्य है जो एक मज़दूर अपनी मज़दूरी के अलावा पैदा करता है. मार्क्स के मुताबिक़, समस्या ये है कि उत्पादन के साधनों के मालिक इस अतिरिक्त मूल्य को ले लेते हैं और सर्वहारा वर्ग की क़ीमत पर अपने मुनाफ़े को अधिक से अधिक बढ़ाने में जुट जाते हैं. इस तरह पूंजी एक जगह और कुछ चंद हाथों में केंद्रित होती जाती है और इसकी वजह से बेरोज़गारी बढ़ती है और मज़दूरी में गिरावट आती जाती है. 

साल 1848 में, जब कार्ल मार्क्स कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिख रहे थे, तब उन्होंने बाल श्रम का जिक्र किया था. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ के साल 2016 में जारी आंकड़ों के मुताबिक आज भी दुनिया में 10 में से 1 बच्चा बाल श्रमिक है. आज यदि बहुत सारे बच्चे कारखाना को छोड़कर स्कूल जा रहे हैं तो यह कार्ल मार्क्स की ही देन है. मार्क्स के अनुसार अधिकांश समय आपको आपकी मेहनत के हिसाब से पैसे नहीं दिए जाते और आपका शोषण किया जाता है .इसलिए मार्क्स चाहते थे कि हमारी ज़िंदगी पर हमारा खुद का अधिकार हो, हमारा जीना सबसे ऊपर हो. वो चाहते थे कि हम आज़ाद हो और हमारे अंदर सृजनात्मक क्षमता का विकास हो.उन्होने अन्याय और भेदभाव से लड़ने के लिए एकजुट होकर संगठित विरोध करने की बात कही . 19वीं शताब्दी में. हालांकि उस समय सोशल मीडिया नहीं था फिर भी वो पहले शख़्स थे जिन्होंने इस तरह के सांठगांठ की व्याख्या की थी.उन्होंने उस समय सरकारों, बैंकों, व्यापारों और उपनिवेशीकरण के प्रमुख एजेंटों के बीच सांठगांठ का अध्ययन किया. कार्ल मार्क्स ने मीडिया की ताक़त महसूस की थी. लोगों की सोच प्रभावित करने के लिए यह एक बेहतर माध्यम था. इन दिनों हम फेक़ न्यूज़ की बात करते हैं, लेकिन कार्ल मार्क्स ने इन सब के बारे में पहले ही बता दिया था. 

मार्क्स का कहना था ,दार्शनिकों ने अब तक दुनिया की व्याख्या की है जब कि सवाल उसे बदलने का है. दुनिया भर में मानवता के लिए वैचारिक क्रांति के बीज बोने वाले कार्ल मार्क्स ने 14 मार्च 1883 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया .

Monday, 16 April 2018

हास्य अभिनय के बेताज बादशाह -चार्ली चैपलिन
















पूरी दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन की शानदार अदाकारी पर अपनी हंसी रोक पाया होगा. चार्ली चैपलिन एक ऐसी शख्सियत का नाम है जिसने पूरी दुनिया के लोगो को अपनी अदाकारी से खूब हंसाया . जिस किसी ने भी चार्ली चैपलिन की फिल्मो को देखा होगा वह अपनी जिन्दगी का कुछ वक्त तो जरुर ही दुःख दर्द को भूल ही गया होगा . 



लोकप्रिय कलाकार चार्ली चैपलिन का जन्म 16 अप्रैल 1889 को लंदन में हुआ था. उनका असली पूरा नाम चार्ल स्पेंसर चैपलिन था. उनके पिता एक गायक और अभिनेता थे और उनकी माँ, एक गायक और अभिनेत्री थी. चार्ली चैपलिन के माता-पिता में तालमेल न होने के कारण उनके बचपन में ही उन दोनों को अलग होना पड़ा . इसके पश्चात उनकी मां ने अपना मानसिक संतुलन भी खो दिया . विषम पारिवारिक हालातो में आगे चल कर 13 साल की उम्र में चार्ली चैपलिन की पढ़ाई भी छूट गई.
























चार्ली चैपलिन ने बेहद कम उम्र में ही स्टेज ऐक्टर और कमीडियन के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था. बाद में, महज 19 साल की उम्र में उन्हें एक अमेरिकन कंपनी ने साइन कर लिया और वह अमेरिका चले गए. अमेरिका से चार्ली ने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की और 1918 तक आते-आते वह पूरी दुनिया भर में काफी लोकप्रिय हो चुके थे. 

चार्ली चैपलिन की पहली फिल्म "मेकिंग अ लिविंग' 1914 में आई ', ये फिल्म एक साइलेंट फिल्म थी. इसके बाद उनकी पहली फुल लेंग्थ फीचर फिल्म 'द किड' 1921 में आई थी. चार्ली ने अपने जीवन में दोनों विश्व युद्ध देखे थे और जिस समय दुनिया युद्ध की विभीषिका झेल रही थी तब वह लोगों को हंसा रहे थे. चार्ली चैपलिन ने एक बार कहा था, 'मेरा दर्द किसी के हंसने की वजह हो सकता है, पर मेरी हंसी कभी भी किसी के दर्द की वजह नहीं होनी चाहिए.'



















साल 1940 में आई उनकी फिल्म 'द ग्रेट डिक्टेटर' काफी विवादों में रही थी. इस फिल्म में चार्ली ने अडोल्फ हिटलर का किरदार निभाया था. बाद में अमेरिका में उनके ऊपर कम्यूनिस्ट होने के आरोप भी लगाए गए और उनके ऊपर FBI की जांच बिठा दी गई. इसके बाद चार्ली चैपलिन ने अमेरिका छोड़ दिया और स्विट्जरलैंड में जाकर बस गए थे . 

चार्ली चैपलिन का पारिवारिक जीवन भी काफी उतार -चढाव से भरा रहा . उन्होंने अपनी जिंदगी में कुल 4 शादियां की थीं. इन शादियों से उनके 11 बच्चे थे. उन्होंने पहली शादी 1918 में मिल्ड्रेड हैरिस से की थी लेकिन यह शादी 2 साल ही चली. इसके बाद उन्होंने लिटा ग्रे, पॉलेट गॉडर्ड और 1943 में 18 साल की उना ओनील से शादी की. उस समय चार्ली 54 साल के थे. चार्ली की ये शादियां काफी विवादों के घेरे में रही थीं.

मशहूर साइंटिस्ट अल्बर्ट आइंसटीन और ब्रिटेन की महारानी के साथ -साथ दुनिया भर के तमाम महत्वपूर्ण लोग चार्ली चैपलिन के प्रशंसक थे. हालांकि खुद चार्ली भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महानायक महात्मा गांधी जी से काफी प्रभावित थे. इसलिए वह महात्मा गांधी का बहुत सम्मान करते थे.


















पूरी दुनिया को हंसाने वाले इस हंसी के जादूगर चार्ली चैपलिन की म्रत्यु 25 दिसम्बर 1977 में हुई . कहा जाता है कि मृत्यु के बाद कुछ लोगों ने उनका शव ही चुरा लिया था. उनका शव उनके परिवार से फिरौती मांगने के उद्देश्य से चुराया गया था. किन्तु बाद में उनका शव बरामद कर लिया गया और पुनह चोरी से बचाने के लिए उसे 6 फीट कंक्रीट के नीचे दफनाया गया.
















चार्ली चैपलिन हास्य अभिनय की दुनिया के सबसे प्रसिद्ध कलाकारों में से एक होने के अलावा अमेरिकी सिनेमा के एक महत्वपूर्ण फिल्म निर्माता और संगीतकार भी थे. वह मूक फिल्म युग के सबसे रचनात्मक और प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक थे जिन्होंने अपनी फिल्मों में अभिनय, निर्देशन, पटकथा, निर्माण और अंततः संगीत तक दिया.