Monday, 22 April 2019

विश्व प्रथ्वी दिवस



























विश्व प्रथ्वी दिवस सबसे पहले 1970 में मनाया गया था. पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों को बचाने और दुनिया भर में पर्यावरण के प्रति जागरुकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 22 अप्रैल को विश्व प्रथ्वी दिवस मनाया जाता है. दरअसल वर्ष 2015 में हुए पेरिस समझौते के तहत दुनिया के 195 देश इस पर सहमत हुए थे कि वैश्विक औसत तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस से आगे न बढ़ने दिया जाए. बल्कि कोशिशें होनी हैं कि इस बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री तक ही सीमित कर दिया जाए. इसके बावजूद , 2014, 2015, 2016, 2017 और 2018 अब तक के सबसे गर्म 4 साल घोषित हो चुके हैं. 

लेकिन सबसे बड़ा बदलाव समुद्र में हो रहा है जहां पानी की मात्रा और इसका दायरा दोनों बढ़ रहे हैं. पानी का तापमान बढ़ने पर वह फैलने और नतीजतन ज्यादा जगह घेरने लगता है. वैज्ञानिक भाषा में इसे थर्मल एक्सपैंशन या तापीय प्रसार कहते हैं. उधर, बढ़ती गर्मी के चलते ध्रुवीय इलाकों की बर्फ तेजी से पिघल रही है. अगर यह प्रक्रिया नहीं रुकी तो इसके परिणाम विनाशकारी होंगे . 

बढ़ते वैश्विक तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणाम दुनिया के हर हिस्से में देखे जा रहे हैं. यूरोप के कई देशों में लू चलना और दक्षिण एशिया सहित तमाम इलाकों में अचानक भारी बारिश के चलते बाढ़ की घटनाओं में बढ़ोतरी इसका उदाहरण हैं. उधर विकास की अंधी दौड़ ने प्रथ्वी के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है . दुनिया भर में औद्योगिक इकाइयों के कचरे से बढ़ रहा प्रदुषण और तापमान यदि थमा नही तो यह जल्द ही प्रथ्वी पर मौजूद समस्त जीवन को तहस -नहस कर देगा . आज महसूस हो रही असाधारण गर्मी और अचानक मौसम का बदलता मिजाज धरती के बढ़ रहे तापमान के कारण ही घटित हो रहा है .





Thursday, 4 April 2019

मार्टिन लूथर किंग जूनियर (अमेरिका का गाँधी )



























22 मार्च, 1959 को मांटगोमरी में महात्मा गांधी के ऊपर अपने प्रवचन में किंग जूनियर ने कहा था, ‘दुनिया गांधी जैसे लोगों को पसंद नहीं करती. कितना आश्चर्य है, नहीं? वे ईसा मसीह जैसे लोगों को भी पसंद नहीं करते. वे लिंकन जैसे लोगों को भी पसंद नहीं करते. उन्होंने गांधी को मार डाला- उस आदमी को जिसने भारत के लिए सब कुछ किया. ...क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि ईसामसीह और गांधी दोनों की हत्या शुक्रवार के दिन की गई और अब्राहम लिंकन की हत्या भी तो बिलकुल उन्हीं कारणों से हुई जिन कारणों से गांधी जी को गोली मारी गई. लेकिन तब किसे पता था कि करीब 9 साल बाद 4 अप्रैल, 1968 को खुद किंग जूनियर की हत्या भी उन्हीं कारणों से हो जायेगी , जिन कारणों से उनके मुताबिक ईसा मसीह, लिंकन और गांधी मार डाले गए थे . महज 39 साल की कम उम्र में ही इंसानियत और भाईचारे की लड़ाई लड़ते हुए मरकर वह इस दुनिया में हमेशा के लिए अमर हो गए.

मार्टिन लूथर किंग जूनियर का जन्म 15 जनवरी 1929 को अटलांटा अमेरिका में हुआ था . उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में नीग्रो समुदाय के प्रति होने वाले भेदभाव के विरुद्ध सफल अहिंसात्मक आंदोलन का संचालन किया. सन्‌ 1955 में कोरेटा से उनका विवाह हुआ, और अमेरिका के दक्षिणी प्रांत अल्बामा के मांटगोमरी शहर में डेक्सटर एवेन्यू बॅपटिस्ट चर्च में प्रवचन देने हेतु बुलाया गया . इसी वर्ष मॉटगोमरी की सार्वजनिक बसों में काले-गोरे के भेद के विरुद्ध एक महिला श्रीमती रोज पार्क्स ने गिरफ्तारी दी थी . इसके बाद ही डॉ॰ किंग ने प्रसिद्ध बस आंदोलन चलाया था .

पूरे 381 दिनों तक चले इस सत्याग्रही आंदोलन के बाद अमेरिकी बसों में काले-गोरे यात्रियों के लिए अलग-अलग सीटें रखने का प्रावधान खत्म कर दिया गया था . बाद में उन्होंने धार्मिक नेताओं की मदद से समान नागरिक कानून आंदोलन अमेरिका के उत्तरी भाग में भी चलाया . उन्हें सन्‌ 64 में विश्व शांति के लिए सबसे कम् उम्र में नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया. 'टाइम' पत्रिका ने उन्हें 1963 का 'मैन ऑफ द इयर' चुना. वह महात्मा गांधीजी के अहिंसक आंदोलन से बेहद प्रभावित थे. गांधीजी के आदर्शों पर चलकर ही डॉ॰ किंग ने अमेरिका में इतना सफल आंदोलन चलाया, जिसे अधिकांश गोरों का भी समर्थन मिला. वह अमेरिका के एक आन्दोलनकारी (ऐक्टिविस्ट) एवं अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिक अधिकारों के संघर्ष के प्रमुख नेता थे. उन्हें अमेरिका का गांधी भी कहा जाता है क्योकि उनके अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रयत्नों से अमेरिका में नागरिक अधिकारों के क्षेत्र मेंक्रांतिकारी प्रगति हुई.



सन्‌ 1959 में उन्होंने भारत की यात्रा की। डॉ॰ किंग ने अखबारों में कई आलेख लिखे. 'स्ट्राइड टुवर्ड फ्रीडम' (1958) तथा 'व्हाय वी कैन नॉट वेट' (1964) उनकी लिखी दो पुस्तकें हैं. सन्‌ 1957 में उन्होंने साउथ क्रिश्चियन लीडरशिप कॉन्फ्रेंस की स्थापना की. मार्टिन लूथर किंग जूनियर अक्सर कहा करते थे 'हम वह नहीं हैं, जो हमें होना चाहिए और हम वह नहीं हैं, जो होने वाले हैं, लेकिन खुदा का शुक्र है कि हम वह भी नहीं हैं, जो हम थे.' 



4 जुलाई, 1965 को अमेरिका हर साल की तरह अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा था. मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी हमेशा की तरह अटलांटा के उसी चर्च में प्रवचन दे रहे थे, जिसमें कभी उनके पिता प्रवचन किया करते थे. अक्सर बोलते-बोलते किंग जूनियर को भारत और महात्मा गांधी का कोई प्रसंग याद आ ही जाता था और उस दिन भी ऐसा ही हुआ, लेकिन उस दिन का प्रसंग श्रोताओं के लिए थोड़ा हिला देने वाला था. किंग जूनियर ने कहा, ‘मुझे याद है जब मैं और श्रीमती किंग भारत में थे तो एक दोपहर हम भारत के सुदूर दक्षिणी राज्य केरल के त्रिवेंद्रम शहर गए. उस दोपहर मुझे वहां एक स्कूल में बोलना था. वह अपने देश के हाई स्कूल जैसा ही था. और इस स्कूल में बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी भी थे जो पहले अछूत कहे जाने वाले लोगों के बच्चे थे. प्रिंसिपल ने मेरा परिचय दिया और परिचय के आखिर में कहा - ‘बच्चों, अब मैं आपके सामने प्रस्तुत करना चाहूंगा संयुक्त राज्य अमेरिका के एक साथी अछूत को.’ एक पल के लिए तो मैं थोड़ा भौचक्का रह गया और खीज भी गया कि अब मुझे अछूत के नाम से बुलाया जाएगा...’

..लेकिन फिर मैंने इस सच्चाई के बारे में सोचना शुरू किया. मेरे 2 करोड़ से अधिक भाई-बहन अभी भी इस दौलतमंद समाज में गरीबी के एक घुटनभरे पिंजरे में घुट रहे हैं. मैंने इस सच्चाई के बारे में सोचना शुरू किया कि मेरे दो करोड़ से अधिक भाई बहन अभी भी हमारे देश के बड़े शहरों में चूहों से भरी, असहनीय मलिन-बस्तियों में रहने को मजबूर हैं, बिना सुविधा वाले स्कूलों में जा रहे हैं, उनके मनोरंजन की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं. और फिर मैंने खुद से कहा- ‘हां, मैं एक अछूत हूं. और संयुक्त राज्य अमेरिका का हर नीग्रो एक अछूत है.’

उन्होंने छूआछूत उन्मूलन में गांधी जी के योगदान को याद करते हुए कहा था , ‘छूआछूत के खिलाफ सबसे पहला काम गांधी ने यह किया कि एक ‘अछूत’ लड़की को अपनी बेटी के रूप में गोद ले लिया. उन्होंने उसे अपने आश्रम में अपने साथ रखा. उन्होंने अपने जीवन से दिखाया कि छूआछूत को जाना ही होगा. ...एक दिन महात्मा गांधी उठ खड़े हुए और अपने देशवासियों से कहा - तुम इन अछूतों का शोषण कर रहे हो. भले ही ब्रिटेन की दासता से निजात पाने के लिए हम जी-जान से लड़ रहे हैं, लेकिन हम अपने ही इन लोगों का शोषण कर रहे हैं और हम उनसे उनका आत्मत्व और आत्म-सम्मान छीन रहे हैं. गांधी जी ने कहा- मैं तब तक भोजन ग्रहण नहीं करूंगा जब तक सवर्णों के नेता अछूतों के नेता के साथ आकर मुझे यह नहीं कहते कि छूआछूत समाप्त होगा और मंदिरों के दरवाजे अछूतों के लिए खोल दिए जाएंगे.’

ईसामसीह के प्रेम और महात्मा गाँधी की अहिंसात्मक सामाजिक लड़ाई से प्रेरित होकर मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका में चमड़ी के भेदभाव के खिलाफ जो आन्दोलन किया ,उसमे वह सफल रहे . किन्तु सभी महापुरुषों की तरह बहुत कम उम्र में ही ( ४० वर्ष ) 4 अप्रैल 1968 को इस महामानव की गोली मारकर हत्या कर दी गई . किन्तु अपनी जान देकर किंग मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका के रंगभेद और चमड़ी के सामाजिक भेदभाव को खत्म कर अश्वेतों को जीने का अधिकार दिला दिया .







Tuesday, 26 March 2019

नोर्मन बोरलाग


























नार्मन बोरलॉग का जन्म अमेरिका में आयोवा के एक सामान्य परिवार में हुआ था. अपनी विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान उन्होंने दुनिया भर में भुखमरी की वजह से होने वाली मौतों पर दुःख का अनुभव महसूस करना शुरू किया. 

उन्होंने गेहूं की उन किस्मों के विकास का काम शुरू किया जो रोग प्रतिरोधी थीं और जिनकी उत्पादकता पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती थी. उनकी मेहनत रंग लाई और सन 1963 तक उनकी ईजाद की हुई नई किस्मों का योगदान मैक्सिको के कुल गेहूं उत्पादन में 95 फीसदी तक हो गया था और ये उत्पादन इतना बढ़ा कि बाद में मैक्सिको गेहूं का निर्यातक भी बन गया.

दुनिया भर में अब उनके इस अद्भुत काम की चर्चा होने लगी . सत्तर के दशक की शुरुआत में भारत में भयंकर अकाल पड़ा था. जिससे भुखमरी की समस्या खड़ी होने को आ गयी . उस समय नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन को यह जानकारी थी कि एक लैटिन अमेरिकी देश मैक्सिको में बोरलाग चमत्कार कर रहे है. समस्या ग्रस्त भारत में भी बोरलॉग के काम का लाभ लेने हेतु उन्होंने इस महान क्रषि वैज्ञानिक को बुलावा भेजा .

बोरलाग भारत आये और उन्होंने यहाँ आकर फिर चमत्कार किया . इससे अकाल से जूझ रही भुखमरी की समस्या भी खत्म हो गयी . बोरलॉग की ईजाद की गई गेहूं की नई किस्में ऊंची उत्पादकता से युक्त और रोग प्रतिरोधी थी . गेहूं के इन दानों ने कुछ ही सालों में भारत को इस छेत्र में आत्मनिर्भर कर दिया . देश को गेहू अमेरिका से मंगाना पड़ता था लेकिन गेहू की इन नई किस्मो ने जल्द ही भारत को गेहू का निर्यातक भी बना दिया .

इसके बाद नार्मन बोरलाग ने धान की भी कुछ नयी उत्पादक किस्मो का आविष्कार किया . कहा जाता है कि उनका यह मानना था कि अगर पौधे की लंबाई कम कर दी जाए, तो इससे बची हुइ ऊर्जा उसके बीजों यानी दानों में लगेगी, जिससे दाना ज्यादा बढ़ेगा, जिससे कुल फसल उत्पादन बढ़ेगा. बोरलॉग ने छोटा दानव (सेमी ड्वार्फ) कहलाने वाले एक किस्म के बीज (गेहूं) का आविष्कार किया था . हालांकि उनके कीटनाशक व रासायनिक खादों के अत्यधिक इस्तेमाल और जमीन से ज्यादा पानी सोखने वाली फसलों वाले प्रयोग की अनेक पर्यावरणवादियों ने कड़ी आलोचना की. लेकिन वह दुनिया को भुखमरी से निजात दिलाने के लिए जीन संवर्धित फसल के पक्ष में भी रहे. उनका मत था कि भूख से मरने की बजाय जीएम (Gene Modified) अनाज खाकर मर जाना कहीं ज्यादा अच्छा है. 

देश के प्रसिद्ध क्रषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन ने बोरलॉग के बारे में कहा था, ‘नॉर्मन बोरलॉग भूख से मुक्त दुनिया की इंसानी तलाश का जीवंत प्रतीक थे. उनका जीवन ही उनका संदेश है.’ नॉर्मन बोरलॉग को 1970 में नोबेल पुरस्कार मिला था. 12 सितम्बर 2009 को 95 साल की उम्र में नॉर्मन बोरलॉग का निधन हो गया. दुनिया भर के गरीब लोग जिन्हें बोरलाग ने भुखमरी से बचाया ,वे सभी अनन्तकाल तक उनके आभारी रहेंगे .

Thursday, 21 March 2019

होली में रंगो का प्रारम्भ कब से


























वसंत ऋतु में फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली मनाने के पीछे कुछ किवदंतिया अवश्य है लेकिन आज यह महापर्व रंगो का महात्यौहार ही माना जाता है . कहा जाता है होली की प्राचीनता का वर्णन जैमिनि के पूर्वमिमांसा सूत्र और कथक ग्रहय सूत्र से लगाया जा सकता है. होलिका दहन के पीछे तो प्रहलाद और होलिका से जुडा एक किस्सा काफी प्रसिद्ध है किन्तु होली में रंगो की शुरुआत क्यों और कैसे हुई , इसके बारे में जानते है .


पौराणिक कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि राछ्सी पूतना ने बालक श्री कृष्ण को मारने का प्रयास किया था , किन्तु उल्टा श्री कृष्ण ने ही पूतना का वध कर दिया .इस पूतना वध के उपलक्ष्य में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की थी . पौराणिक कथाओ के अनुसार इसके बाद गोपियों और ग्वालो ने एक दूसरे के साथ रंग खेला. इस प्रकार रंग खेलने की शुरुआत श्री कृष्ण जी ने ही प्रारम्भ की थी. आज भी व्रन्दावन की होली सबसे विशेष होती है .


हालांकि उस समय होली के रंग पलाश के फूलों से बनते थे जो त्वचा के लिए बहुत अच्छे होते थे क्योंकि उनमें कोई रसायन नहीं होते थे लेकिन आज के समय में रंग के नाम पर हानिकारक रसायन का उपयोग किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए काफी खतरनाक होते है . होली में रंगो के साथ अबीर और गुलाल का प्रयोग भी होता है . हर्ष और उल्लास के माहोल में लोग अपने पुराने गिले -शिकवे भूल कर एक -दुसरे से गले मिलते है . गाँव के खेतो में सरसों के पीले -पीले सुंदर खेत होली के रंगो की शोभा में समा बाँध देते है . रंगो की फुहार के बीच लोग ढोलक झांझ और मंजीरे के साथ फाग गाते है . मनोरंजन के साथ -साथ खान -पान का भी अपना अलग मजा होता है . होली में लोग गुझिया ,पापड़ और चिप्स खासतौर पर चखते है . हालाँकि आपको जानकर हैरानी होगी गुझिया तुर्की और अफगानिस्तान जैसे देशों से भारत में आई है अर्थात भारत में गुझिया बनाने का समय मुगल काल के आस -पास का ही होना चाहिए .

मुगल काल में होली को ईद-ए-गुलाबी कहा जाता था. प्रमाण के मुताबिक, कई मुगल बादशाहों ने भी होली खेली थी. भारत अनेक संस्क्रतियो से युक्त देश है . इसलिए यहाँ के आम -जीवन में भी कई रंग -रूप नजर आते है . 






Wednesday, 20 March 2019

जेल का खौफ



















आज हमारे लोग जेल जाने से बहुत खौफ खाते है . उन्हें बताया भी यही गया है कि जेल अपराधियों के लिए ही बनी होती है . लोगो को जेल की चक्की में आटा पीसना पड़ता है .उन्हें यहाँ तमाम यातनाओ से भी रूबरू होना पड़ता है .लेकिन जेल केवल अपराधियों के लिए ही है ,ये भी एकदम से सत्य बात तो नहीं है.मसलन कई बार कुछ बेगुनाह लोग भी जेल में ठूस दिए जाते है . जेल यानी कारागार का सम्बन्ध देश की आजादी और स्वतन्त्रता सेनानियों के साथ भी जडा हुआ है . बल्कि जेल का सम्बन्ध तो भगवान श्री क्रष्ण जी से भी जुडा हुआ है . हमारे लोग अगर जेल नहीं गये होते तो शायद हमारा देश आजाद नही होता . क्रष्ण का जन्म यदि जेल में नही होता तो शायद कंस के आतंक से लोगो को मुक्ति भी नही मिलती. जेल के बारे में आज के जैसा खौफ पहले कम था या ज्यादा , यह पता नही लेकिन लोग जेल जाने को अपने संघर्ष का पर्याय मानते थे . शायद इसीलिए देश के लोकतंत्र पर खतरे के बादल आये जरुर लेकिन आखिर उन्हें जाना पड़ा. 

आज के नवयुवक में वह धार नही है . उसे या तो पढाई के बोझ ने घायल कर दिया है या फिर वह मनोरंजन के साधनों में लिप्त रह कर जन -जीवन से कोसो दूर हो गया है . बिगड़ी हुई व्यवस्था को सुधारने में किसे रूचि है . पढ़ -लिख कर हर कोई पैसा कमाना चाहता है . क्या करे , अब जीवन चक्र ही ऐसा बन चूका है . बगैर पैसे के जीवन बेजान हो चूका है . लेकिन कितना पैसा कोई कमाएगा , खर्च बेहिसाब हो गया है .महंगाई से बचे तो बीमारिया नही छोड़ेगी . आख़िरकार पैसे की खोज में इंसान के जीवन का मोल 2 पैसे का हो गया है . अपने भविष्य के लिए इंसान नम्बर 2 की कमाई को भी ज्यादा मेहनत की कमाई कहता है . कुछ लोग जो खानदानी रईस या राजा -रजवाड़े है उनकी बात अलग है . उन्हें इस जंजाल से छुट मिली है जिसके लिए उन्हें अपने बाप -दादाओ का ऋणी होना चाहिए . बात जेल की थी ,वही आते है .सत्ता का अहंकार बहुत पुरानी बात है और आज तक जीवंत है . अब सवाल है कि सत्ता के अहंकार से या फिर बिगड़ी हुई व्यवस्था के सुधार के खिलाफ जेल कौन जाएगा . जेल अपराधियों के लिए सुधार गृह है तो क्रान्तिकारियो के लिए उनका घर . मगर साहब जेल का खौफ तो चल ही रहा है , और जेलों से लोहा लेने वाले लोग मुट्ठी भर ही है . इसलिए किसी महा परिवर्तन की उम्मीद भी नही कीजिये .