Tuesday, 12 November 2019

गुरु नानक





























सज्जन लोग उजड़ने पर जहाँ भी जायेंगे वहां अपनी सज्जनता से उत्तम वातावरण का निर्माण करेंगे. परंतु दुष्ट और दुर्जन व्यक्ति जहाँ विचरण करेगा वहां, अपने आचार-विचार से वातावरण दूषित करेगा.----गुरुनानक 


उपरोक्त विचार एक प्रसंग में गुरुनानक जी ने व्यक्त किया था . नानक जी का कहने का भाव यही था कि दुनिया भर के सज्जन या अच्छे इंसानों को किसी एक स्थान पर सीमित नही रहना चाहिए ,बजाय इसके उन्हें समाज में चल रही बुराइयों को समाप्त करने हेतु चारो तरफ फ़ैल जाना चाहिए . अच्छे लोगो की बेरुखी से समाज में गलत विचारो का बोलबाला हो जाता है . समय की कसौटी पर गुरु नानक देव जी की यह बात सौ प्रतिशत सही है . 

बालक नानक का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गाँव में कार्तिकी पूर्णिमा को 1469 में एक खत्री परिवार में हुआ था. इनके पिता का नाम लाला कल्याण राय था जिन्हें लोग मेहता कालू के नाम से जानते थे और माता का नाम तृप्ता देवी था. इनके जन्मस्थान तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया.

बाल्यकाल से ही नानक प्रतिभासम्पन्न एव विशिष्ट स्वभाव से युक्त थे . वह समस्त सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे. पढ़ने लिखने में भी इनका मन नहीं लगता था और 7 -8 साल की उम्र में ही स्कूल छूट गया . इसके बाद नानक अपना समय आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे. 

नानक के पिता मेहता कालू अपने बेटे नानक को भी पढ़ा -लिखा कर अपनी ही तरह एक मुनीम बनाना चाहते थे और सांसारिक जीवन में कैद कर देना चाहते थे . इसी क्रम में नानक का विवाह बालपन मे 16 वर्ष की आयु में गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्खनी से कर दिया गया .विवाह के बाद भी नानक का अध्यात्म के प्रति मोह नहीं गया और गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए 32 वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म हुआ. इसके 4 वर्ष पश्चात् दूसरे पुत्र लखमीदास का भी जन्म हुआ. दोनों लड़कों के जन्म के उपरांत 1507 में नानक अपने परिवार की जिम्मेदारियों को अपने श्वसुर पर छोड़कर मरदाना, लहना, बाला और रामदास के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पडे़. अपने भ्रमण काल में वह अफगानिस्तान , फारस और अरब भी गए . वह अपनी यात्राओ के दौरान घूम -घूम कर लोगो को मानवता की सीख देते . वह समस्त सामाजिक कुरीतियों का विरोध करते थे और मूर्ति पूजा के स्थान पर सीधे परमात्मा की उपासना को प्रमुख मानते थे . इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये हैं. ये भक्ति काल का दौर था जब हिंदू और मुसलमान दोनों मज़हबों से लोग उकताने लग गये थे. तब स्त्रियों की हालत भी काफी बदतर थी. ऐसे विकट समय में नानक वास्तव में हिन्दू और मुसलमान दोनो धर्मो के मतावलम्बियो के मध्य की खाई भर रहे थे और इसी राह पर चलते हुए उन्होंने दोनों धर्मों के बीच से होते हुए ‘सिख’ धर्म की स्थापना की. अपने अनुयाइयो को नानक ने एकेश्वरवाद का सिद्धांत दिया. उन्होंने ईश्वर को निरंकार माना, उसे एक रौशनी माना. उन्होंने कहा ईश्वर एक गूंज है जो अनहद-नाद के समान पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ है.

नानक ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे. पर उनके लिखे 976 दोहे, बाणियां जिनमें हिंदी, फ़ारसी, अरबी लफ़्ज़ों का इस्तेमाल है . इनमें कही बातों में वेद, पुराण, कुरान, योग-शास्त्र, पतंजलि सबका सार है. डॉक्टर गोपाल सिंह की पुस्तक ‘सिखों का इतिहास’ के अनुसार ‘जब नानक 13 साल के हुए थे तो पिता द्वारा यज्ञोपवीत संस्कार में जनेऊ पहनने से इंकार कर दिया था . नानक ने कहा मुझे वो धागा पहनना है जो न ख़राब हो, न जले, न मिटटी में मिले. इंसान अपने कर्मों से जाना जाए न कि किसी धागे से.’ जाहिर है नानक की विचारधारा आडम्बर रहित होकर समत्वयुक्त और किसी समयकाल से परे थी . बाद में उन्होंने लोगों की धारणाओं, अंध-मान्यताओं पर अक्सर सवाल उठाये. बनारस में उन्होंने पंडितों को नदी में खड़े होकर पूर्व की दिशा की ओर जल अर्पित करते देखा. पूछने पर मालूम हुआ कि वे लोग अपने पूर्वजों का पिंड दान कर रहे थे. नानक ये देखकर पश्चिम की तरफ़ जल अर्पित करने लग गए. जब पंडितों ने उनसे पूछा, तो कहा - ‘वो क्या है कि मेरे खेत पश्चिम दिशा की तरफ हैं, मैं उन्हें पानी दे रहा हूं’. कुछ इसी तरह उन्होंने मक्का की तरफ पैर रखकर सोते हुए टोके जाने पर कहा - ‘मेरे पैर उस तरफ़ कर दो जहां मक्का न हो.’ इसी प्रकार समाज में महिलाओं की बदहाली पर भी उन्होंने बहुत कुछ लिखा और कहा भी.


कहा जाता है कि एक समय गुरु नानक देव और उनका चेला मरदाना अमीनाबाद गए. वहां पर एक गरीब किसान लालू नें उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया. उसने यथा शक्ति रोटी और साग इन दोनों को भोजन के लिए दिए. तभी गाँव के अत्याचारी ज़मींदार मलिक भागु का सेवक वहां आया. उसने कहा मेरे मालिक नें आप को भोजन के लिए आमंत्रित किया है.बार-बार मिन्नत करने पर गुरु नानक लालू की रोटी साथ ले कर मलिक भागु के घर चले.मलिक भागु नें उनका आदर सत्कार किया. उनके भोजन के लिए उत्तम पकवान भी परोसे. लेकिन उससे रहा नहीं गया. उसने पूछा कि, आप मेरे निमंत्रण पर आने में संकोच क्यों कर रहे थे? उस गरीब किसान की सूखी रोटी में ऐसा क्या स्वाद है जो मेरे पकवान में नहीं. इस बात को को सुन कर गुरु नानक नें एक हाथ में लालू की रोटी ली और, दूसरे हाथ में मलिक भागु की रोटी ली, और दोनों को दबाया. उसी वक्त लालू की रोटी से दूध की धार बहने लगी, जब की मलिक भागु की रोटी से रक्त की धार बह निकली. गुरु नानक देव बोले-
भाई लालू के घर की सूखी रोटी में प्रेम और ईमानदारी मिली हुई है. तुम्हारा धन अप्रमाणिकता से कमाया हुआ है, इसमें मासूम लोगों का रक्त सना हुआ है. जिसका यह प्रमाण है. इसी कारण मैंने लालू के घर भोजन करना पसंद किया.
यह सब देख कर मलिक भागु उनके पैरों में गिर गया और, बुरे कर्म त्याग कर अच्छा इन्सान बन गया. इस प्रकार नानक समाज में अनैतिक रीती -रिवाजो को समाप्त करने हेतु सदैव प्रयत्नशील रहे और गरीबो को सम्मान देने की वकालत करते रहे .

जीवन के अंतिम दिनों में नानक जी की ख्याति बहुत बढ़ गई और यह सिख धर्म के प्रथम गुरु के रूप में स्थापित हो गये . अपने धर्म के माध्यम से समाज को मानवता की सेवा का संदेश देते रहे इन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला भी उसमें बनवाई. इसी स्थान पर आश्वन कृष्ण 10 , संवत् 1597 (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को गुरु नानक देव ने अपने लौकिक देह का त्याग कर दिया . करतारपुर सिखों के लिए काफी महत्वपर्ण स्थान है. किन्तु देश के विभाजन के बाद हिन्दू -मुस्लिमो को जोड़ने वाले इस गुरु के अनुयाई भी अपने गुरु के देहावसान स्थान पर जाने हेतु दो देशो की सीमाओं में कैद हो गये . सम्भवतः गुरु नानक की विचारधारा उनके सिख धर्म में तो समा गई किन्तु उसके बाहर वह भाईचारा बनाने में कामयाब न हो सकी . जिसके फलस्वरूप उनके बाद पुनह हिन्दू - मुस्लिम व्यापक टकराव शुरू हो गया . 

मृत्यु से पहले गुरु नानक देव जी ने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से सिख धर्म के दुसरे गुरु के रूप में विख्यात हुए .
सत श्री अकाल .

Thursday, 7 November 2019

बहादुर शाह जफर

कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिए, 
दो गज ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में.
अपने आखरी वक्त में अपने वतन यानि हिंदुस्तान की दो गज जमीन की चाह रखने वाला यह शख्स अबू जफर उर्फ़ बहादुर शाह जफर था . बहादुर शाह जफर मुग़ल वंश का आखरी शासक था . 11 मई 1857 का वह ऐतिहासिक दिन जब दिल्ली में तमाम विद्रोहियों ने लगभग 80 साल के हो चुके बहादुर शाह जफर से हिंदुस्तान का बादशाह बन कर अंग्रेजो को चुनौती देने की दरख्वास्त की तब वह उम्र के ऐसे पड़ाव में था कि उसके लिए यह फैसला लेना काफी कठिन रहा होगा . लेकिन फिर भी जफर ने विद्रोहियों की दरखास्त कबुल की और विद्रोहियों का लीडर बन गया . अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह का नेत्रत्व लेते ही विद्रोह की क्रांति चारो तरफ आग सी फ़ैल गयी . इस विद्रोह में न मालुम कितने अंग्रेजो को मौत की नीद सुला दिया गया लेकिन यह लड़ाई इतनी आसान तो नही थी . बूढ़े शहंशाह जफर ने जान लिया कि ताकतवर अंग्रेजो के खिलाफ यह लड़ाई ज्यादा दिनों तक नही चल सकेगी . 

अंततः वही हुआ , 19 सितम्बर 1857 को अंग्रेजी फ़ौज दिल्ली के लाल किले में पहुच गयी . कितनी अजीब विडम्बना थी कि इस अंग्रेज फ़ौज में सिख इन्फैंट्री के जवान थे .इन सिक्खों को देखकर बूढ़े शहंशाह को यह जरुर याद आया होगा कि ये वही सिक्ख है जिनके पुरखो गुरु तेगबहादुर और गुरु गोविन्दसिंह के परिवार और उनके समर्थको को उसके खुद के पुरखो औरंगजेब वगैरह ने इस्लाम नही स्वीकारने के कारण मौत के घाट उतार दिया था . तो अब इन सिक्खों से क्या छमा याचना की जाए . इसलिए किसी प्रकार वह परिवार सहित लाल किले से बाहर निकल गया . इधर किले में घुसते ही अंग्रेज और सिक्ख सैनिको ने धुंआधार मार -काट कर डाली . लाल किले में शहंशाह बहादुर शाह जफर के नही मिलने से अंग्रेज अफसर हडसन ने आस -पास के इलाको की भी नाकेबंदी कर दी . जिसके बाद हुमांयू के मकबरे में परिवार सहित छिपे जफर को घेर लिया गया . दोनों तरफ से शर्ते रखी गयी और अंततः इस शर्त पर कि अंग्रेज बहादुर शाह जफर और उसके परिवार को अपमानित नही करेंगे , हिंदुस्तान के इस आखरी शहंशाह ने खुद को अंग्रेजो के हवाले कर दिया . लेकिन अंग्रेजो की जुबान कभी खरी नहीं थी सो बहादुर शाह जफर को कैद कर लिया गया और उसके बेटो को अपमानित कर गोली मार दी गयी .

जफर पर अंग्रेजो ने मुकदमा चलाया . अदालत और जज दोनों अंग्रेजी थे सो फैसला भी अंग्रेजो के हक़ में होना था . अदालत में कहा गया कि बहादुर शाह जफर जो कि हिंदुस्तान का मुसलमान है , उसने दुनिया के अन्य मुसलमानों से मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ बगावत की है . इस तरह से बूढ़े जफर को दोषी करार दिया गया . अंग्रेज चाहते तो जफर को तुरंत गोली मारने की सजा दे सकते थे लेकिन उन्हें बाकी विद्रोहियों में भी खौफ भरना था . इसलिए उन्होंने एक बूढ़े शहंशाह को उसके वतन से दूर जेल में कैद रखने की सजा सुना दी . 7 अक्तूबर 1858 को यह खबर बूढ़े शहंशाह को सुना दी गयी लेकिन यह नही बताया गया कि कहा ले जाया जायेगा . इसके बाद उसे कलकत्ता होते हुए रंगून ले जाया गया जहा की एक कोठरी नुमा जेल में उसे कैद कर दिया गया . 

























यही कोठरी मुग़ल वंश के अंतिम शहंशाह और हिंदुस्तान की 1857 की क्रांति के लीडर रहे बहादुरशाह जफर की आखरी मंजिल साबित हुई . इस काली कोठरी में अपने जख्मो को याद कर बूढ़े जफर की आँखों का पानी सुख गया . असल में हिंदुस्तान के इस आखरी ट्रेजडी किंग को अपने आखरी वक्त में साथ देने के लिए कोई न मिला . अपने गमो को वह जेल की दीवारों पर अपने नाखुनो से लिखता गया और अपनी आखरी इच्छा को पूरा किये बगैर आज के दिन 07 नवम्बर 1862 को इस दुनिया से चला गया . अपने वतन की मिटटी में दफन होने के लिए दो गज जमींन की उसकी चाह अधूरी ही रह गयी . शायद दुनिया के इतिहास में ये पहला वाकया होगा जब एक शहंशाह को मौत के बाद उसके ही वतन की दो गज जमीन भी न मिल सकी . शंहशाह बहादुर शाह जफर को उसकी मौत के बाद रंगून में ही जेल की उसी कोठरी के पीछे दफना दिया गया , जहा वह अपने आखरी वक्त तक कैद था . आजादी के बाद आज भी उसकी कब्र हिंदुस्तान में अपने पुरखो की कब्र के बगल में दो गज जमींन मिलने से महरूम है . 


Sunday, 6 October 2019

व्रत और उपवास








सामान्यतौर पर व्रत और उपवास को एक ही अर्थ हेतु प्रयुक्त किया जाता है किन्तु आध्यात्मिक द्रष्टिकोण से व्रत और उपवास में अंतर है . व्रत के बारे में धारणा है कि इंसान द्वारा किसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु दिनभर के लिए निराहार अर्थात अन्न या जल या अन्य भोजन का त्याग व्रत कहलाता है. दुसरे शब्दों में किसी कार्य को पूरा करने का संकल्प लेना भी व्रत कहलाता है अथवा संकल्पपूर्वक किए गए कर्म को भी व्रत कहा जाता है . वास्तव में उपवास करना व्रत का ही एक अंश है और इसे व्रत का एक संछिप्त रूप माना जाता है . प्रचलित मान्यताओ और आध्यात्मिक साहित्यों के अनुसार व्रत 3 प्रकार के होते है -नित्य, नैमित्तिक और काम्य. 

जिस व्रत का आचरण सर्वदा के लिए आवश्यक है और जिसके न करने से मानव दोषी होता है उसे नित्यव्रत कहा जाता है. जैसे सत्य बोलना, पवित्र रहना, इंद्रियों का निग्रह करना, क्रोध न करना, अश्लील भाषण न करना और परनिंदा न करना आदि नित्यव्रत माने जाते हैं. इसी प्रकार किसी प्रकार के पातक (नरक में गिरानेवाला पाप ) के हो जाने पर या अन्य किसी प्रकार के निमित्त के उपस्थित होने पर चांद्रायण (चंद्रमा की कलाओं के हिसाब से आहार को घटाने-बढ़ाने का व्रत ) स्वरूप जो व्रत किए जाते हैं वे नैमिक्तिक व्रत कहलाते हैं. तीसरा व्रत काम्य व्रत है जो किसी प्रकार की कामना विशेष से प्रोत्साहित होकर संपन्न किए जाते हैं जैसे - पुत्रप्राप्ति के लिए राजा दिलीप ने जो गोव्रत किया था वह काम्य व्रत है. हिन्दू धर्म में पुरुषों एवं स्त्रियों के लिए पृथक् व्रतों का नियम भी देखने को मिलता है हालाँकि कुछेक व्रत दोनों के लिए समान है. 

यदि व्रत के आचरण और तौर -तरीको की बात करे तो प्रत्येक व्रत के एक निश्चित समय भी निर्धारित किया गया है उदाहरणस्वरूप सत्य और अहिंसा व्रत का पालन करने का समय यावज्जीवन अर्थात जीवन भर माना गया है . उसी प्रकार कुछ अन्य व्रतों के लिए भी समय निर्धारित है. महाव्रत जैसे व्रत 16 वर्षों में पूर्ण होते हैं. वेदव्रत और ध्वजव्रत की समाप्ति 12 वर्षों में होती है. पंचमहाभूतव्रत, संतानाष्टमीव्रत, शक्रव्रत और शीलावाप्तिव्रत 1 वर्ष तक किया जाता है. अरुंधती व्रत वसंत ऋतु में होता है. चैत्रमास में वत्सराधिव्रत, वैशाख मास में स्कंदषष्ठीव्रत, ज्येठ मास में निर्जला एकादशी व्रत, आषाढ़ मास में हरिशयनव्रत, श्रावण मास में उपाकर्मव्रत, भाद्रपद मास में स्त्रियों के लिए हरितालिकव्रत, आश्विन मास में नवरात्रव्रत, कार्तिक मास में गोपाष्टमीव्रत, मार्गशीर्ष मास में भैरवाष्टमीव्रत, पौष मास में मार्तंडव्रत, माघ मास में षट्तिलाव्रत और फाल्गुन मास में महाशिवरात्रि के व्रत प्रमुख हैं. तिथि पर आश्रित रहनेवाले व्रतों में एकादशी व्रत, वार पर आश्रित व्रतों में रविवार को सूर्यव्रत, नक्षत्रों में अश्विनी नक्षत्र में शिवव्रत प्रमुख है .भक्ति और श्रद्धा की इच्छनुसार कभी भी किए जानेवाले व्रतों में सत्यनारायण व्रत प्रमुख है. 

व्रत रखने का औचित्य मुख्य रूप से आध्यात्मिक ही है . प्राचीन काल में अक्सर ऋषि -मुनि ईश्वर साधना हेतु कठिन तप और व्रत रखते थे . इस दौरान वह निराहार रहते थे . कालान्तर में ईश्वर से पुन्य या इच्छा प्राप्ति हेतु की जाने वाली साधना व्रत के रूप में परिवर्तित हो गयी होगी . समय के साथ इसके तौर -तरीको में बदलाव आता रहा है . मसलन जब लोगो ने व्रत और उपवास हेतु निराहार रहने के स्थान पर कुछ खाने का विकल्प तलाशा होगा तो पुरोहितो ने फल -फूल का मार्ग बता दिया होगा . फल -फूल के पीछे सात्विक्क भोजन ग्रहण करने का उद्देश्य रहा होगा क्यों कि तामसी भोजन ग्रहण करने के पश्चात सात्विक विचारो का लोप हो सकता है . इसलिए हमारे भोजन का सम्बन्ध कही न कही हमारे विचारो और स्वभाव से अवश्य होता है . हालांकि आजकल तो किसी व्रत के लिए भोजन के रूप में अनेक प्रकार के फल से लेकर तमाम मिठाइया और कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन भी उपलब्ध है .आज बहुत से लोग व्रत में साधारण नमक के स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग भी कर लेते है किन्तु कुछ साधक व्रत के कड़े नियमो का पालन करते हुए किसी भी नमक का प्रयोग अनुचित मानते है .ऐसे में प्रश्न उठता है कि कौन सही है और कौन गलत है ? क्या वास्तव में किसी व्रत से किसी प्रकार के भोजन का कोई सम्बन्ध होता है ? इसके उत्तर में एक घटना का सन्दर्भ इस प्रकार से लिया जा सकता है . 


गौतम बुद्ध के जीवन पर लिखी एक किताब में उनके कठिन उपवास का जिक्र किया गया है. बुद्ध ने संबोधि पाने के लिए सालों तक कुछ नहीं खाया. इस प्रक्रिया के तहत उन्होंने शुरू में अन्न कम किया, फिर कुछ दिन फल खाए और उसके बाद वे भी छोड़ दिए. ऐसा उपवास करने से उनके पैर बांस जैसे पतले हो गए, रीढ़ की हड्डी रस्सी की तरह दिखाई देने लगी, सीना ऐसा हो गया जैसे किसी मकान की अधूरी छत हो और आंखें ऐसी धंस गई जैसे कुएं में पत्थर खो जाता है. कुल मिलाकर वे एक चलता-फिरता कंकाल बन चुके थे. फिर भी उन्हें वह ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ जिसकी तलाश थी. यह एक उदाहरण है जो बताता है कि सिर्फ खाना-पीना छोड़ देने से न भगवान मिलते हैं, न ज्ञान.

कुछ डाक्टरों के अनुसार भी भोजन का त्याग करने से शरीर में बीमारियों का जन्म हो सकता है , वही दूसरी तरफ कहा जाता है कि व्रत के दौरान भोजन त्यागने से शरीर के अंदर के हानिकारक पदार्थ बाहर निकल जाते है और शारीरिक अंगो को थोडा आराम मिलता है . जो भी हो आज व्रत और उपवास के स्वरूपों में काफी बदलाव आ चूका है . आज यह आध्यात्मिक कम और भौतिक ज्यादा नजर आते है . व्रत और उपवास करने वाले इन भक्तो की इस कमजोरी का फायदा बाजार और उनके मालिको ने भी खूब उठाया है जिसके कारण फलाहारी पिज्जा और बर्गर भी परोस दिए गये हैं. जाहिर है अब व्रत में श्रद्धा और संकल्प के स्थान पर खानापूर्ति और व्यवसाय भी चल रहे है .




Wednesday, 11 September 2019

विनोबा भावे





















यु तो इस देश में जमीन की लड़ाई का इतिहास काफी पुराना है और भारत जैसे शांति प्रिय देश में जमीन की लड़ाई ने महाभारत का युद्ध तक करवा दिया था . किन्तु आज के हिंसाप्रिय और अराजक माहोल में लोग इस बात को एकदम भूल चुके है कि कभी कुछ समाजसेवियों के आह्वाहन पर इसी भारत में लोगों ने अपने ही गांव-समाज की जमीने भूमिहीन लोगों के लिए दान में दे दी थी .

आज़ादी के बाद भारत के सामने एक सबसे बड़ा प्रश्न जमीन के बंटवारे का भी था. जहा एक तरफ राजे-रजवाड़ों से लेकर जमींदारों और बड़े भूमिपतियों के पास बेहिसाब जमीनें थीं, तो दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता भूमिहीन थी. जहां एक ओर जमींदारी उन्मूलन और भू-हदबंदी जैसे सरकारी प्रयास चल रहे थे, वहीं दूसरी ओर अनेक स्थानों में बंदूक के जरिए जमीन और संपत्ति छीन लेने का खूनी-संघर्ष भी चल रहा था. ऐसे विकट समय में विनोबा भावे आगे आये और उन्होंने भूदान आन्दोलन का सूत्रपात किया . 

विनोबा को अपने अहिंसा और प्रेमपूर्ण आन्दोलन की बदौलत लगभग 42 लाख एकड़ जमीन भूदान में मिल गयी . उन्होंने इसमें से 15 लाख तो तत्काल ही भूमिहीनों में बांट दी . कहा जाता है कि भूदान आंदोलन में मिली जमीनों में से 10 लाख एकड़ जमीन आज भी बिना बंटे ही सरकारी राजस्व विभाग की फाइलों में धूल फांक रही है. वास्तव में आज यह विश्वास करना भी काफी कठिन है कि जिस जमीन के कारण भाई-भाई का सिर काटता है, गोलियां चलती हैं, जिसके लिए लोग सारा जीवन कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटते बिता देते हैं, वह जमीन लोगों ने विनोबा को प्रेम से दे दी थी और विनोबा ने इसमें से ज्यादातर जमीनें हरिजनों और आदिवासियों के बीच बांट दी थी . 

इस तरह जमीन के असमान और एकतरफा अधिकार को काफी हद तक विनोबा ने समान अधिकार में बदल दिया . विनोबा के भूदान ने लोगो को इतना प्रभावित किया कि लोग ग्राम दान तक करने लगे . ग्राम दान यानी पुरे गाव की जमीन का ही दान . इस मुहीम से प्रभावित होकर लोकनायक जयप्रकाश ने अपना जीवन दान करने की बात कह दी और पूंजीवादियो से उद्योग दान की सिफारिश भी की . 

विनोबा ने कितनी भी मेहनत से गरीबो को जमीने दिलवाई हो , लेकिन आज के दबंग और रसूखदार लोग जमीनों को हडप कर उनका व्यवसाय भी शुरू कर दिया है और भूदान के स्थान पर भू माफिया हो गया है . 










Sunday, 1 September 2019

पेरियार ललई सिंह यादव



कर्मवीर ललई सिंह यादव जी का जन्म 1 सितम्बर 1911 को ग्राम कठारा रेलवे स्टेशन-झींझक, जिला कानपुर देहात के एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ था. उनके पिता चौधरी गुज्जू सिंह यादव एक कर्मठ आर्य समाजी थे एवं माता श्रीमती मूलादेवी, उस क्षेत्र के जनप्रिय नेता चौधरी साधौ सिंह यादव की पुत्री थी. 

ललई सिंह यादव जी ने सन् 1928 में हिन्दी के साथ उर्दू विषय लेकर हाईस्कूल पास किया. वह सन् 1929 से 1931 तक फाॅरेस्ट गार्ड के पद पर कार्यरत रहे एवं सन 1931 में ही इनका विवाह श्रीमती दुलारी देवी जी के साथ सम्पन्न हुआ. तत्पश्चात सन 1933 में वह सशस्त्र पुलिस कम्पनी जिला मुरैना (म.प्र.) में कान्स्टेबिल के पद पर भर्ती हो गये . अपनी सिपाही की नौकरी से समय निकाल कर वह अपनी उच्च शिछा -दीछा भी सम्पन्न करते रहे और सन् 1946 में नान गजेटेड मुलाजिमान पुलिस एण्ड आर्मी संघ ग्वालियर के अध्यक्ष चुने गए. नौकरी में रहते हुए उन्होंने तत्कालीन सिपाहियो की दशा पर ‘‘सिपाही की तबाही’ नामक एक पुस्तक लिखी, जिसने समस्त सिपाहियों को क्रांति के पथ पर चलने का आह्वान किया. इस प्रकार अंग्रेजी राज के खिलाफ इन्होंने आजाद हिन्द फौज की तर्ज पर ग्वालियर राज्य की आजादी के लिए जनता तथा सरकारी कर्मचारियों को संगठित कर पुलिस और फौज में हड़ताल करवाई एवं समस्त जवानों से कहा कि 
बलिदान न सिंह का होते सुना, 
बकरे बलि बेदी पर लाए गये।
विषधारी को दूध पिलाया गया,
केंचुए कटिया में फंसाए गये।
न काटे टेढ़े पादप गये,
सीधों पर आरे चलाए गये।
बलवान का बाल न बांका भया
बलहीन सदा तड़पाये गये। 
हमें रोटी कपड़ा मकान चाहिए,


आखिरकार अंग्रेजी हुकूमत ने 29.03.1947 को ग्वालियर स्टेट्स के स्वतंत्रता संग्राम के सिलसिले में पुलिस व सेना में हड़ताल कराने के आरोप धारा 131 भारतीय दण्ड विधान (सैनिक विद्रोह) के अंतर्गत साथियों सहित उन्हें राज-बन्दी बना लिया और 06.11.1947 को स्पेशल क्रिमिनल सेशन जज ग्वालियर ने उन्हें अध्यक्ष हाई कमाण्डर ग्वालियर नेशनल आर्मी होने के कारण 5 वर्ष स-श्रम कारावास तथा 5 रूपये अर्थ दण्ड का सर्वाधिक दण्ड भी सुना दिया . जेल की सजा होने के बाद अंततः देश आजाद होने पर वह दिनांक 12.01.1948 को अपने सभी साथियों सहित जेल से रिहा हुये. 

एक ईमानदार स्वतन्त्रता सेनानी और क्रन्तिकारी विचारो के कारण उन्हें अन्याय बिलकुल बर्दास्त नही था फिर वह चाहे किसी भी स्वरूप में क्यों न हो . इसी लिए हिन्दू शास्त्रों में व्याप्त घोर अंधविश्वास और पाखण्ड के खिलाफ वह विद्रोह कर बैठे . हिन्दू धर्म में मनुवाद और ब्राह्मणवाद से उपजे शोषण पर वह काफी दुखी थे और ऐसी स्थिति में इन्होंने यह धर्म छोड़ने का भी मन बना लिया. वह समाज में व्याप्त सामजिक विषमता के घोर खिलाफ थे और समस्त मानव जाति के प्रति समता और बन्धुत्व का व्यवहार चाहते थे . उनका कहना था कि सामाजिक विषमता का मूल, वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था, स्मृति और पुराणों से ही पोषित है. सामाजिक विषमता का विनाश सामाजिक सुधार से नहीं अपितु इस व्यवस्था से अलगाव में ही समाहित है. 

तभी इन्हें यह अहसास हुआ कि देश की अशिछित जनता को जागरूक करने एवं विचारों के प्रचार- प्रसार का सबसे सबल माध्यम साहित्य ही है अत; साहित्य प्रकाशन की ओर भी इनका विशेष ध्यान गया. उन्होंने ‘अशोक पुस्तकालय’ नाम से प्रकाशन संस्था स्थापित की और अपना प्रिन्टिंग प्रेस लगाया, जिसका नाम ‘सस्ता प्रेस’ रखा . इसके पश्चात उन्होंने 5 नाटक लिखे- (1) अंगुलीमाल नाटक, (2) शम्बूक वध, (3) सन्त माया बलिदान, (4) एकलव्य, और (5) नाग यज्ञ नाटक. गद्य में भी उन्होंने 3 पुस्तके लिखीं – (1) शोषितों पर धार्मिक डकैती, (2) शोषितों पर राजनीतिक डकैती, और (3) सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो? 

एशिया के सुकरात कहे जाने वाले दक्षिण भारत के महान क्रान्तिकारी पैरियार ई. व्ही. रामस्वामी नायकर जी के उस समय उत्तर भारत में कई दौरे हो रहे थे जिनसे ललई सिंह यादव जी उनके सम्पर्क में आये. सम्पर्क होने पर पेरियार द्वारा लिखित ‘‘रामायण ए ट्रू रीडि़ंग’’ में उन्होंने विशेष अभिरूचि दिखाई. इसके बाद दोनों सामजिक क्रान्तिकारियो में इस पुस्तक के प्रचार प्रसार की, सम्पूर्ण भारत विशेषकर उत्तर भारत में करने पर विशेष चर्चा हुई. समस्त उत्तर भारत में इस पुस्तक के हिन्दी में प्रकाशन की अनुमति पैरियार रामास्वामी नायकर जी ने ललईसिंह यादव जी को 01-07-1968 को दे दी. जिसके बाद ललईसिंह यादव जी द्वारा इसे 'सच्ची रामायण' के हिन्दी स्वरूप में 01-07-1969 को प्रकाशित किया गया . इसके प्रकाशन से सम्पूर्ण उत्तर पूर्व तथा पश्चिम् भारत में एक तहलका सा मच गया. जिससे उ.प्र. सरकार द्वारा 08-12-1969 को इस पुस्तक को प्रतिबंधित कर इसके जब्ती का आदेश प्रसारित हो गया . सरकार के अनुसार यह पुस्तक भारत के कुछ नागरिक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर चोट पहुंचाने तथा उनके धर्म एवं धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने के लक्ष्य से लिखी गयी थी . 

इस प्रतिबन्ध और साहित्यिक दमन के विरूद्ध प्रकाशक ललई सिंह यादव जी ने हाई कोर्ट इलाहाबाद में क्रमिनल मिसलेनियस एप्लीकेशन 28-02-1970 को प्रस्तुत किया . कोर्ट में तीन जजों की स्पेशल बैंच इस केस के सुनने के लिए बनाई गई . जिसमे अपीलांट (ललईसिंह यादव) की ओर से निःशुल्क एडवोकेट श्री बनवारी लाल यादव और सरकार की ओर से गवर्नमेन्ट एडवोकेट तथा उनके सहयोगी श्री पी.सी. चतुर्वेदी एडवोकेट व श्री आसिफ अंसारी एडवोकेट की बहस दिनांक 26, 27 व 28 अक्टूबर 1970 को लगातार 3 दिन तक सम्पन्न हुई. जिसमे 19-01-71 को माननीय जस्टिस श्री ए. के. कीर्ति, जस्टिस के. एन. श्रीवास्तव तथा जस्टिस हरी स्वरूप ने बहुमत से निर्णय दिया कि -

1. गवर्नमेन्ट आफ उ.प्र. की पुस्तक ‘सच्ची रामायण’ की जब्ती की आज्ञा निरस्त की जाती है. 
2. जब्तशुदा पुस्तकें ‘सच्ची रामायण’ अपीलांट ललईसिंह यादव को वापिस दी जाये. 
3. गर्वन्र्मेन्ट आफ उ.प्र. की ओर से अपीलांट ललई सिंह यादव को 300 का हर्जाना खर्च भी दिया जाए . 

अभी ललई सिंह यादव द्वारा प्रकाशित ‘सच्ची रामायण’ का प्रकरण चल ही रहा था कि उ.प्र. सरकार की 10 मार्च 1970 की स्पेशल आज्ञा द्वारा 'सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें' नामक पुस्तक जिसमें डाॅ. अम्बेडकर के कुछ भाषण थे तथा 'जाति भेद का उच्छेद' नामक पुस्तक 12 सितम्बर 1970 को चौधरी चरण सिंह की सरकार द्वारा जब्त कर ली गयी. इसके लिए भी ललई सिंह यादव ने श्री बनवारी लाल यादव एडवोकेट, के सहयोग से मुकदमें की पैरवी की. मुकदमें की जीत से ही 14 मई 1971 को उ.प्र. सरकार की इन पुस्तकों की जब्ती की कार्यवाही निरस्त कराई गयी और सभी पुस्तके जनता को उपलब्ध हो सकी. इसी प्रकार ललई सिंह यादव द्वारा लिखित पुस्तक ‘आर्यो का नैतिक पोल प्रकाश’ के विरूद्ध 1973 में मुकदमा चला दिया गया और यह मुकदमा उनके जीवन पर्यन्त चलता रहा.

पुस्तक 'सच्ची रामायण' समेत अन्य पर हाई कोर्ट में हारने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी किन्तु वहां भी अपीलांट उत्तर प्रदेश सरकार क्रिमिनल मिसलेनियस अपील नम्बर 291/1971 ई. निर्णय सुप्रीम कोर्ट आफ इण्डिया, नई दिल्ली दि. 16-9-1976 ई. के अनुसार अपीलांट की हार हुई अर्थात् रिस्पांडेण्ट श्री ललई सिंह यादव की जीत हुई. यहाँ फुलबैंच में माननीय सर्वश्री जस्टिस पी. एन. भगवती जस्टिस वी. आर. कृष्णा अय्यर तथा जस्टिस मुर्तजा फाजिल अली मौजूद थे . 


महान क्रान्तिकारी पैरियार ई. व्ही. रामास्वामी नायकर जो गड़रिया (पाल-बघेल) जाति के थे, अचानक वह 20 दिसम्बर 1973 की सुबह इस लोक से विदा हो गये. उनकी मृत्यु के पश्चात् एक विशाल सभा में चेन्नई में ललईसिंह यादव जी को एक व्याख्यान हेतु बुलाया गया था. श्री रामास्वामी नायकर पेरियार जी की श्रद्धांजलि सभा में दिये गये इनके भाषण पर दक्षिण भारतीय श्रोता मुग्ध हो गये और इनके भाषण की समाप्ति पर 3 नारे लगाये गये. 

1 . अब हमारा अगला पैरियार
2 . पैरियार ललई सिंह
3 . पैरियार ललई सिंह



इस घटना के बाद से ही इनके नाम के पूर्व पैरियार शब्द का शुभारम्भ हुआ. दक्षिण भारत में पैरियार शब्द जाति वादी नहीं अपितु स्वच्छ निष्पक्ष-निर्भीक अथवा सागर के अर्थों में प्रयोग किया जाने वाला सम्मान सूचक शब्द है. शोषित पिछड़े समाज में स्वाभिमान व सम्मान को जगाने तथा उनमें व्याप्त अज्ञान, अंधविश्वास, जातिवाद तथा ब्राह्मणवादी परम्पराओं को ध्वस्त करने के उद्देश्य से वह लघु साहित्य के प्रकाशन की धुन में अपनी 59 बीघे की जमीन कौडि़यों के भाव बेच प्रकाशन के कार्य में आजीवन जुटे रहे और अंत में एक कर्मयोगी की तरह 7 फरवरी 1993 को उन्होंने इस दुनिया से अंतिम विदा ले ली.

देश के पिछड़े और शोषित समाज की लड़ाई आजीवन लड़ने के बावजूद भी आज पेरियार ललई सिंह यादव जी का नाम गुमनामी के अँधेरे में खोया हुआ है . उनके क्रन्तिकारी विचारो के तेज और बहुमूल्य साहित्य को तलाशना भी एक दुरूह कार्य बन चूका है जिसका दोष इस देश की  मनुवादी ताकतों के साथ -साथ थोडा -बहुत बहुजन को भी दिया जाना चाहिए . काश बहुजन समाज अपने इस महापुरुष के संघर्ष को संजो कर आगे बढ़ पाता तो उसमे कही न कही क्रन्तिकारी वैचारिक बदलाव अवश्य नजर आता .