Thursday, 24 November 2016

नोट बंदी और काला धन

देश भर में ८ नवम्बर को प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा ५०० और १००० के नोटों को अचानक बंद कर दिए जाने की घोषणा की गयी . प्रधानमन्त्री जी ने अपनी इस मुहीम के पीछे देश में मौजूद समस्त काले धन को जड़ से समाप्त करने की बात कही है . सरकार द्वारा एक झटके में अचानक इतना बड़ा फैसला लेने के बाद इस पर पुरे देश की जनता का अचम्भे में पड जाना स्वाभाविक है . हालांकि देश में नोट बंदी का ये पहला मामला नही है और इससे पहले भी १९४६ और १९७८ में १००० मूल्य से ज्यादा के नोटों पर तत्कालीन सरकारों ने रोक लगा दी थी . लेकिन बाद में १९८७ में पहले ५०० और फिर २००१ में १००० के नए नोट प्रारम्भ किये गये .नोटों की डिजाइन और उनकी सुरछा प्रणाली में समय -समय पर थोड़े -बहुत परिवर्तन भी होते रहे  है .


वर्तमान समय में लागू नोटबंदी का देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा ? क्या इससे देश में मौजूद समस्त कालाधन सरकार को प्राप्त हो जाएगा ? क्या सरकार के इस कदम से राष्ट्रविरोधी ताकतों के हौसले पस्त हो जायेगे ? क्या इससे देश में मौजूद महंगाई में कमी आएगी ? क्या इससे देश में मौजूद भ्रष्टाचार कुछ कम होगा ? क्या इस नोट बंदी से सत्तारूढ़ भाजपा को कुछ कुछ राजनैतिक लाभ या हानि होगी ? आखिरकार देश की जनता को इस नोट बंदी से क्या फायदा या नुक्सान होने वाला है , आइये इस पर एक नजर डालते है :-

तमाम अर्थ शास्त्रियों के अनुसार ५०० और १००० के पुराने नोट समाप्त करने तथा २००० के नए बड़े नोट चालु करने से बाजार में मौजूद केवल ३ प्रतिशत काला धन ही बाहर आ पायेगा . सवाल उठता है कि फिर बाकी का काला धन कहा है ? अर्थशास्त्रियो के अनुसार ये कालाधन सोना -चांदी , हीरे -जवाहरात , जमीन जायदाद आदि के रूप में मौजूद होता है . इसी काले धन से विदेशो में होटल ,जमींन -जायदाद भी खरीदे जाते है . देश का काफी काला धन विदेशी बैंको में जमा रहता है . स्पष्ट है कि ऐसे धन को वापस लाना मुश्किल ही है . अधिकाँश काला धन भ्रष्ट राजनेताओ ,घुसखोर नौकरशाहों , टैक्स चोरी करने वाले व्यापारियों आदि के पास होता है जिसे वे सब नोट के रूप में नही रखते है . इसलिए मात्र ५०० और १००० रुपयों के नोट को बंद कर अगर सरकार ये सोचती है कि बाजार में मौजूद समस्त कालाधन उसके पास आ जाएगा तो ये उसकी नासमझी ही कही जायेगी .


वही इन नोटों को जमा करने के बाद जनता को उसके बदले में समुचित कैश उपलब्ध करवाना भी सरकार के लिए काफी मुश्किल काम होगा . सरकार भले ही अपनी मुहीम को कालाधन पर प्रहार कहती हो लेकिन बड़े कोर्पोरेट घरानों पर जिस तरह से उसकी मेहरबानी हो रही है उससे उसकी नीयत पर भी बड़े सवाल खड़े हो रहे है . मसलन अम्बानी ,अदानी और विजय माल्या समेत देश के अनेक कोर्पोरेट का हजारो करोड़ का कर्ज माफ़ करना सरकार को कटघरे में खड़ा करता है . आज जहा देश में किसान कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या को विवश है , उस नाजुक दौर में किसानो के कर्ज न माफ़ करके बड़े कोर्पोरेट घरानों को कर्जमाफी देना किसी लिहाज से सराहनीय कदम नही कहा जा सकता है . वही सरकार अपने वायदे के मुताबिक़ विदेशो में जमा अरबो -खरबों रूपये का काला धन वापस देश में लाने पर बिलकुल खामोश है .  ये वही काला धन है जिसे प्रधानमन्त्री मोदी विदेशो से लाकर हर भारतीय के खाते में १५ -१५ लाख रूपये देने की बाते कहते थे . इससे इस विदेशी काले धन के अपार भंडार के बारे में समझा जा सकता है . वही दूसरी तरफ चुनाव आयोग द्वारा सभी राजनैतिक पार्टियों को मिलने वाले चुनावी चंदे या पार्टी फंड की जानकारी देने पर राजनैतिक पार्टिया कितनी जिम्मेदार है , ये किसी से छिपा हुआ भी नही है . अब तो राजनैतिक पार्टियों को २० हजार तक के चुनावी चंदे का कोई हिसाब देंना भी अनिवार्य नही रह गया है . इस तरह से काले धन के स्रोतों और उसके सफेद धन में परिवर्तन होने की राह में समस्त राजनैतिक पार्टियों स्वयम ही लापरवाह नजर आती है .

नोट बंदी के इस एका एक अचानक हुए फैसले से भले ही काले धन को रखने वाले लोग परेशान हुए हो लेकिन इनके साथ -साथ देश की समस्त जनता भी पिसी जा रही है . देश का इनकम टैक्स विभाग और तमाम सरकारी मशीनरी देश में मौजुद काले धन का यदि पता नही लगा सकती है तो इसकी सजा निर्दोष जनता को देना कहा का न्याय कहा जाएगा ? बैंको में लगने वाली भीड़ मेलो से भी बड़ी नजर आती है . अपने पैसो के लिए लोग रात -दिन लाइनों में लग रहे है . किसी का अपना बीमार है तो दवा के लिए पैसो का इंतजाम हेतु लाइन में लगना पड रहा है तो किसी की लड़की की शादी है तो उसे भी बैंक में चक्कर लगाने के बावजूद अपना पैसा नही मिल पा रहा है . लाइनों में खड़े -खड़े न जाने कितने बुजुर्ग काल के गाल में समा गये . महिलाओं के जीवन भर की घरेलू बचत दलालों के हत्थे चढ़ गयी . मासूम बच्चे समय से दवा नही मिलने से मौत के आगोश में समा गये . व्यापारी अपनी बोनी के लिए भी तरस गये . ये अनेक ऐसी घटनाए सरकार के नोट बंदी के फैसले को अदूरदर्शी और नासमझ बताती है . ये तो एकदम साफ़ है कि सरकार ने पर्याप्त मात्रा में नए नोट छापे बगैर पुराने नोट भी जमा करवा लिए . जनता को होने वाली इस भीषण असुविधा के कारण सरकार जनता का कोपभाजन भी बन रही है . सरकार के नोट बंदी के इस फैसले का देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा लेकिन फिलहाल जनता सरकार के इस कदम को लाइनों में लग -लग के कोस रही है . अब तो कुछ चुटकुले भी बन रहे है :-

***************************************************************************

बच्चे क्या कर रहे हैं आजकल ?
बड़ा बेटा SBI में, उसकी पत्नी AXIS में
छोटा बेटा PNB में, उसकी पत्नी HDFC में और बेटी YES बैंक में है .
अच्छा-अच्छा ! सब सेटल हो गए ?”
नहीं, लाइन में लगे हैं सब ……………
**************************************************************************

उम्मीद है कि सरकार जल्द ही ५०० और १००० के नए नोटों को जनता तक पहुचायेगी ताकि फौरी तौर पर लगने वाली लाइन से जनता को निजात मिले . वही दूसरी तरफ फर्जी नोटों के स्रोतों पर भी सरकार कड़ी नजर रखे वरना केवल नोट बंदी से ही कालेधन की लड़ाई लड़ना असम्भव होगा . सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण बात ये है कि सरकार विदेशो में जमा काले धन के भण्डार को वापस भारत लाने में अपनी अहम् जिम्मेदारी निभाये . अन्यथा ये नोट बंदी 'सोनम गुप्ता बेवफा है ' की पहेली ही बन कर रह जायेगी .







Tuesday, 8 November 2016

जिन्दगी -एक पहेली या कुछ और



जिन्दगी और मौत . ये दो सबसे जटिल पहेली है इस दुनिया की . मौत के बारे में हम अगले ब्लॉग में कुछ चर्चा करेंगे . आज जिन्दगी को जानने की कोशिश करते है . 'जिन्दगी ' इस दुनिया का सबसे जीवंत शब्द है . क्यों कि जिन्दगी या जीवन बहुत अनमोल है . इसकी कोई कीमत नही है . ये जिन्दगी कहा से आती है और कहा चली जाती है ये किसको पता है ? इस जिन्दगी को समझना सरल भी है और काफी जटिल भी है . सरल इसलिए है कि आप दिमाग पर जोर बिलकुल मत दीजिये बस जिन्दगी को उसकी मर्जी पर छोड़ दीजिये . वही जिन्दगी कितनी जटिल है इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि इस मासूम जीवन को सभालते -सभालते लोगो की पूरी जिन्दगी गुजर जाती है लेकिन फिर भी उन्हें नही मालुम चलता है कि आखिर ये जिन्दगी है क्या ? तो आइये आज हम कुछ महान शायरों और गीतकारो से जानते है कि जिन्दगी के बारे में उनके क्या विचार है  :-

मशहूर शायर ग़ालिब कहते है 

'उम्र भर ग़ालिब यही भूल करता रहा 
धुल चेहरे पर थी मगर आइना साफ़ करता रहा .'

मधुशाला के हरिवंश राय बच्चन जी कहते है 

छोटे से जीवन में कितना प्यार करु ,पीलू हाला .
आने के साथ जगत में, कहलायेगा जाने वाला .
स्वागत के साथ, विदा की होती देखी तैयारी 
बंद लगी ,होने खुलते ही , मेरी जीवन मधुशाला ..

जनाब फिराक गोरखपुरी जी कहते है 

बहुत पहले से उन कदमो की आहट जान लेते है .
तुझे ऐ! जिन्दगी हम दूर से पहचान लेते है 
तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातो में 
हम ऐसे में तेरी यादो की , चादर तान लेते है .

श्री पद्म सिह शर्मा जी कहते है 

जिन्दगी कटु सत्य है सपना नही है 
खेल इसकी आग में , तपना नही है 
कौन देगा साथ इस भूखी धरा पर 
जबकि अपना श्वास भी अपना नही है !

श्री मती कांता शर्मा जी ने कहा है 

सांस की हर सुमन है, वतन के लिए 
जिन्दगी ही हवन है , वतन के लिए 
कह गयी फासियो में फंसी गर्दने 
यह हमारा नमन है , वतन के लिए !

अनवर साहब फरमाते है कि 

जिन्दगी एक नशे के सिवाय कुछ नही
तुमको पीना न आये तो मै क्या करु !

बालीवुड के गीतकारो के अनुसार 
मशहूर गीतकार शैलेन्द्र जी को लीजिये .उनकी नजरो में जिन्दगी एक सफर है 


ज़िंदगी एक सफ़र है सुहाना
यहाँ कल क्या हो किसने जाना 
हँसते गाते जहाँ से गुज़र
दुनिया की तू परवाह न कर
मुस्कुराते हुए दिन बिताना
यहाँ कल क्या हो किसने जाना
हाँ ज़िंदगी एक सफ़र ...
मौत आनी है आएगी इक दिन
जान जानी है जाएगी इक दिन
ऐसी बातों से क्या घबराना
यहाँ कल क्या हो किसने जाना
हाँ ज़िंदगी एक सफ़र ... 

चाँद तारों से चलना है आगे
आसमानों से बढ़ना है आगे
पीछे रह जाएगा ये ज़माना
यहाँ कल क्या हो किसने जाना


गीतकार इन्दीवर भी कहते है 


ज़िंदगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
है ये कैसी डगर चलते हैं सब मगर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
ज़िंदगी को बहुत प्यार हमने किया
मौत से भी मुहब्बत निभायेंगे हम
रोते रोते ज़माने में आये मगर
हँसते हँसते ज़माने से जायेँगे हम
जायेँगे पर किधर है किसे ये खबर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
ऐसे जीवन भी हैं जो जिये ही नहीं
जिनको जीने से पहले ही मौत आ गयी
फूल ऐसे भी हैं जो खिले ही नहीं
जिनको खिलने से पहले फ़िज़ा खा गई
है परेशां नज़र थक गये चाराग़र
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
है ये कैसी डगर चलते हैं सब मगर
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
ज़िन्दगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र
कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं

गीतकार योगेश जिन्दगी को एक पहेली मानते है 
ज़िंदगी ...
कैसी है पहेली, हाए
कभी तो हंसाये
कभी ये रुलाये
ज़िंदगी ...
कभी देखो मन नहीं जागे
पीछे पीछे सपनों के भागे
एक दिन सपनों का राही
चला जाए सपनों के आगे कहाँ
ज़िंदगी ...
जिन्होने सजाए यहाँ मेले
सुख-दुख संग-संग झेले
वही चुनकर ख़ामोशी
यूँ चली जाए अकेले कहाँ
ज़िंदगी ...

आनन्द बक्षी जी जिन्दगी के सफर को कुछ यु बयान करते है 


ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं मगर
पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं
कुछ लोग जो सफ़र में बिछड़ जाते हैं
वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं
उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
ज़िन्दगी के सफ़र में ...
आँख धोखा है, क्या भरोसा है
आँख धोख है, क्या भरोसा है सुनो
दोस्तों शक़ दोस्ती का दुश्मन है
अपने दिल में इसे घर बनाने न दो
कल तड़पना पड़े याद में जिनकी
रोक लो रूठ कर उनको जाने न दो
बाद में प्यार के चाहे भेजो हज़ारों सलाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
ज़िन्दगी के सफ़र में ...

प्रसिद्ध फिल्मकार सावन कुमार जिन्दगी को एक गीत मानते है 
ज़िंदगी प्यार का गीत है, इसे हर दिल को गाना पड़ेगा
ज़िंदगी ग़म का सागर भी है, हंसके उस पार जाना पड़ेगा
ज़िंदगी बेवफ़ा है तो क्या, अपने रुठे हैं हमसे तो क्या
हाथ में हाथ ना हो तो क्या, साथ फिर भी निभाना पड़ेगा
ज़िंदगी ...
ज़िंदगी एक मुसकान है, टूटे दिल की कोई आस है
ज़िंदगी एक बनवास है, काट कर सबको जाना पड़ेगा
ज़िंदगी ...
है अभी दूर मंज़िल तो क्या, रास्ता भी है मुश्किल तो क्या
रात तारों भरी न मिले तो, ग़म का दीपक जलाना पड़ेगा
ज़िंदगी ...


 जिन्दगी के कितने आयाम है इसके कितने रंग -रूप है 
ये कैसा सफर है ये कैसा ख़्वाब है 
ये कैसी मधुशाला है ये कैसा गीत है
जिन्दगी कुछ नही है और सब कुछ है .
जिन्दगी की आखिर क्या परिभाषा दी जाए
कोई एक-दो  नही, हजारो हो सकती है  . 
जीवन अनमोल है , इसे जी भर कर जियो 
जियो और जीने दो 

किसी शायर ने कहा है-
जिन्दगी जिदादिली का नाम है ,
मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते है !






Saturday, 5 November 2016

मीडिया के एक चैनेल पर प्रतिबन्ध

आजाद भारत में शायद ये दूसरी बार मीडिया के किसी एक चेनेल पर कोई सरकारी प्रतिबन्ध हुआ है . सम्भवतः मिडिया पर देश में पहला प्रतिबन्ध १९७५ के आपातकाल के दौरान लगा था . इसलिए एक बार फिर से लोगो के मस्तिष्क में आपातकाल आने के विचार आ रहे है . इस विचार मंथन के पीछे 'विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी' को सरकार द्वारा रोकने की एक कोशिश माना जा रहा है . ये तो सर्वमान्य तथ्य है कि विचारों के आदान -प्रदान से ही मिडिया आगे बढ़ता है . किन्तु ये भी सच है कि आज देश के  मीडिया की छवि भी १९७५ के दौरान की नही रही है . आज मीडिया पर भी बिकाऊ पछ्पाती और झूठी खबरों को दिखाने के आरोप लगते आये है .
लोकतंत्र में मीडिया को रोकना बिलकुल अलोकतांत्रिक कदम माना जाता है . इसलिए सरकार किसी चेनेल को प्रतिबंधित करने के बजाय कोई अन्य कार्यवाही करे तो वह बेहतर होगा . सरकार हो चाहे मिडिया ,ये सभी लोकतंत्र पर ही आश्रित है और लोकतंत्र की सुरछा के लिए जिम्मेदार भी है .