Thursday, 26 July 2018

मोब लिचिंग (भीड़ द्वारा हत्या ) (Mob Lynching)

Mob Lynching अर्थात भीड़ द्वारा हत्या . आजकल देश में 'मोब लिचिंग' नामक इस नये शब्द का प्रयोग काफी ज्यादा किया जा रहा है हालांकि इस देश की सांस्क्रतिक विरासत के नजरिये से यह शब्द बिलकुल मेल नही खाता है किन्तु फिर भी पिछले कई सालो से भीड़ द्वारा की जा रही अनेक हिंसात्मक घटनाओ से यह नया शब्द हमारी आधुनिक संस्क्रती के साथ जुड़ सा गया है . यदि देश के गौरवशाली इतिहास में झाँका जाए तो हमारी  संस्क्रति 'विश्व बन्धुत्व ' और 'वसुधैव कुटुम्बकम ' के उच्चकोटि के दर्शनो से युक्त रही है किन्तु आज संचार के माध्यमो के काफी व्यापक होने के कारण अनेक वैश्विक घटनाओं ने बाकी दुनिया के साथ -साथ हमारी संस्क्रती पर भी अपना काफी असर छोड़ा है . इन प्रभावों में अनेक अच्छाईयो के साथ -साथ थोड़ी - बहुत बुराइया भी शामिल होती है . इसलिए कभी पूरी दुनिया को विश्व शान्ति का अमर संदेश देने वाला भारत आज मोब लिचिंग के दुष्प्रभावो मे अब खुद ही कैद हो गया है .

अमेरिका में मोब लिचिंग के शिकार 



वास्तव में मोब लिचिंग शब्द की उत्पति दुनिया के सबसे प्राचीन लोकतान्त्रिक देश अमेरिका में मानी जाती है . ऐसा अनुमान है कि 'मोब लिंचिंग' शब्द का अविष्कार 2 अमेरिकियों चार्ल्स लिंच और विलियम लिंच के नाम पर 1782 ई के आस -पास हुआ होगा . कहा जाता है कि 1861 के अमेरिका में गृह युद्ध (सिविल वार ) के दौरान अश्वेत लोगो को श्वेत अमेरिकियों द्वारा मामूली अपराधो के लिए इस मोब लिचिंग से मार दिया जाता था . अनेक अफ़्रीकी नीग्रोस को श्वेत अमेरिकियों द्वारा भीड़ की शक्ल में फांसी पर लटका दिया गया था . यहाँ तक कि इस प्रक्रिया में हत्या के शिकार ज्यादातर लोग अदालत तक भी नही पहुच पाते थे . वास्तव में मोब लिंचिंग का उद्देश्य भी यही था कि लोगो को अदालत में अपना पछ रखने से पहले ही मार दिया जाए . सम्भवतः यहाँ पर श्वेत अमेरिकी लोगो का एक वर्ग अश्वेतों पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहता था जिसके लिए उन्होंने मोब लिचिंग को ही अपना हथियार बनाया हुआ था . इस प्रकार इस मोब लिंचिंग शब्द के पीछे कही न कही अमेरिकी नस्लवाद की अवधारणा भी छिपी हुई है . 



देश में कुछेक भीड़ द्वारा जब कानून को अपने हाथ में लेकर किसी व्यक्ति को सजा दी गयी ,तो इसे मोब लिचिंग कहा गया . वास्तव में यह लोकतंत्र को भीड़तन्त्र में बदलने का एक असफल प्रयास है . हालाँकि यह भीड़ भी कई तरह की होती है . मसलन एक सामूहिक भीड़ प्राक्रतिक आपदाओ और किसी भी प्रकार के सामजिक और आर्थिक अन्याय से संघर्ष करने हेतु सशक्त विकल्प मानी जाती है तो दूसरी तरफ इसी भीड़ को यदि उन्माद से जोड़ दिया जाए तो फिर यह दंगा -फसाद और तोड़ -फोड़ के कार्यो में भी लिप्त हो जाती है . ऐसी भीड़ का कोई एक चेहरा नही होता है , इसलिए वास्तविक अपराधी को पकड़ना काफी दुष्कर होता है . देश में ऐसी भीड़ द्वारा कुछ लोगो को पीट - पीट कर भी मार दिया गया है .भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार ,"किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा ही वंचित किया जाएगा ,अन्यथा नही ." इस प्रकार एक लोकतान्त्रिक देश में भीड़ द्वारा जारी ये हमले उसकी जनता की व्यक्तिक स्वतंत्रता और उसके मूल अधिकारों का हनन है .


मोब लिचिंग में प्राक्रतिक , विधिक और लोकतान्त्रिक नियमो का उल्लंघन होता है . उन्मादी भीड़ पीड़ित व्यक्ति की कोई बात नही सुनती और उसे अपना पछ भी नही रखने देती है . इस प्रकार यह भीड़ एक प्रकार की अतार्किक और अनैतिक हिंसा को जन्म देती है . देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली में सभी नागरिक देश के संविधान से बंधे हुए है इसलिए उन सभी से यह उम्मीद की जाती है कि वह कानून का पालन भी करेंगे . किन्तु यदि किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया भी है तो उसे अदालत में कानून के अनुसार सजा मिलेगी . ध्यान रहे इस महान देश में प्रत्येक नागरिक को सुचना का अधिकार ही नही वरन अपने विचारो के स्वतन्त्रता की आजादी भी हासिल है . 

भारत में मोब लिंचिंग की पहली घटना नागालैंड के दीमापुर में वर्ष 2015 में बताई जाती है जिसमे एक बलात्कार के आरोपी को भीड़ द्वारा मार डाला गया था . किन्तु गौ -रछा के नाम पर मोब लिंचिंग तो अब काफी आम हो गयी है . एक रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष 2014 से लेकर 2018 तक लगभग 45 लोग मोब लिंचिंग के कारण अपनी जान से हाथ धो चुके है . वास्तव में, इस देश में इससे पूर्व भी भीड़ द्वारा सामूहिक होकर दलितों और पिछडो पर अत्याचार करने की सैकडो घटनाये हो चुकी है . अत : मोब लिचिंग जाती ,धर्म और नस्ल विभिन्न स्तरों पर अवसर देख कर करवाई जाती है और यह तो एक घोर विडम्बना ही है कि आज इक्कसवी सदी में भी देश के अंदर मात्र कुछ अफवाहों पर ही मोब लिचिंग की घटनाओं को अंजाम दे दिया जाता है . इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे पर सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने हेतु एक सशक्त कानून बनाने का निर्देश दिया है .


















Saturday, 21 July 2018

आर्य समाज और दयानन्द सरस्वती


आर्य समाज एक हिन्दू सुधार आंदोलन है जिसकी स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती (मूलशंकर ) ने 1875 में बंबई में की थी. दयानन्द जी की जन्मभूमि गुजरात थी . कहा जाता है आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ और प्रगतिशील. इसलिए आर्य समाज को श्रेष्ठ और प्रगतिशील विचारधारा का समाज कहा जा सकता है . 


मूलशंकर जी के जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गम्भीरता से सोचने पर विवश कर दिया . एक बार उनके बचपन में शिवरात्रि की एक घटना है. शिवरात्रि के दिन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर गया हुआ था. वहा सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वह जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे. किन्तु उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं. यह देख कर वह बहुत आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए.

इसी तरह अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वह  जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे जिससे उनके माता पिता चिन्तित रहने लगे. तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया लेकिन बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वह सत्य की खोज में निकल पड़े. फाल्गुन कृष्ण संवत्1875 में शिवरात्रि के दिन उनके जीवन में एक नया मोड़ आया और उन्हें नया बोध प्राप्त हुआ . वह घर से निकल पड़े और यात्रा करते हुए गुरु विरजानन्दके पास पहुंचे. गुरुवर ने उन्हें पाणिनी व्याकरण, पातंजल-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग आदि का विस्तृत अध्ययन कराया. इसके बाद दयानन्द जी ने देश भर में अनेक स्थानों की यात्रा की. उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर 'पाखण्ड खण्डिनी पताका' फहराई व अनेक विद्वानों से शास्त्रार्थ भी किए. दयानन्द तत्कालीन प्रचलित सभी धर्मों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन करते थे , चाहे वह सनातन धर्म हो या इस्लाम हो या ईसाई धर्म हो. कहा जाता है कि दयानन्द 'स्वराज्य' के प्रथम सन्देशवाहक थे और 1857 की लड़ाई की प्रेरणा स्रोत भी . लोकमान्य तिलक और लाला लाजपत राय उनके मुख्य अनुयायी माने जाते है .








दयानन्द जी की मृत्यु जिन परिस्थितियों में हुई, उससे संदेह होता है कि इसमें निश्चित ही अग्रेजी सरकार या कुछ हिन्दू चरमपंथियो की सांठ-गाँठ रही होगी . दयानन्द जी की मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन सन्ध्या के समय हुई थी. मान्यता है कि उन दिनों वह जोधपुर नरेश महाराज जसवन्त सिंह के निमन्त्रण पर जोधपुर गये हुए थे. वहां उनके नित्य प्रवचन होते थे और यदाकदा महाराज जसवन्त सिंह जी उनके चरणों में बैठकर उनके प्रवचन सुनते थे . एक बार दयानन्द जी राज महल में गए, वहां पर उन्होंने नन्हीं नामक एक वेश्या का अनावश्यक हस्तक्षेप महाराज जसवन्त सिंह पर देखा. उन्हें यह उपयुक्त नही लगा अत: उन्होंने महाराज को उनके राजधर्म के बारे में समझाया . जिस पर महाराज ने भी बड़ी विनम्रता से उनकी यह बात स्वीकार कर ली और नन्हीं से सम्बन्ध तोड़ लिए. इससे नन्हीं, दयानन्द जी के खिलाफ हो गई और उसने उनके रसोइए कलिया उर्फ जगन्नाथ को अपनी तरफ मिला कर उनके दूध में पिसा हुआ कांच डलवा दिया. किन्तु थोड़ी ही देर बाद दयानन्द जी के पास आकर उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और क्षमा मांगने लगी . उदार-हृदय दयानन्द जी ने उसे छमा कर राह-खर्च और जीवन-यापन के लिए 500 रुपए देकर वहां से विदा कर दिया ताकि पुलिस उसे परेशान न कर सके . इसके बाद जब दयानन्द जी को जोधपुर के अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो वहां सम्बन्धित चिकित्सक भी शक के दायरे में आ गया . उस चिकित्सक पर आरोप था कि वह औषधि के नाम पर दयानन्द जी को हल्का विष पिलाता रहा जिससे बाद में जब दयानन्द जी की तबियत बहुत खराब होने लगी तो उन्हें अजमेर के एक अस्पताल में लाया गया किन्तु तब तक काफी विलम्ब हो चुका था और दयानन्द जी को बचाया नहीं जा सका. 


दयानन्द जी के सभी अनुयायी आर्य समाजी व शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते थे तथा मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, झूठे कर्मकाण्ड व अंधविश्वासों को अस्वीकार करते थे. आर्य समाज की मान्यताओं के अनुसार फलित ज्योतिष, जादू-टोना, जन्मपत्री, श्राद्ध, तर्पण, व्रत, भूत-प्रेत, देवी जागरण, मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्रा मनगढ़ंत एवं वेद विरुद्ध हैं. आर्य समाज सच्चे ईश्वर की पूजा करने को कहता है, यह ईश्वर वायु और आकाश की तरह सर्वव्यापी है, वह अवतार नहीं लेता, वह सब मनुष्यों को उनके कर्मानुसार फल देता है. उसका ध्यान घर में किसी भी एकांत में हो सकता है. आर्य समाज ने छुआछूत व जातिगत भेदभाव का भी विरोध किया तथा स्त्रियों व शूद्रों को भी यज्ञोपवीत धारण करने व वेद पढ़ने का अधिकार दिया था. कहा जाता है 24 घंटे में 18 घंटे समाधि में रहने वाले योगिराज दयानंद ने लगभग 8 हजार किताबों का मंथन कर अद्भुत और क्रांतिकारी 'सत्यार्थ प्रकाश' की रचना की थी .अपने इस महाग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' में दयानन्द जी ने सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन किया था .


कहा जाता है कि भारत के 80 प्रतिशत स्वतन्त्रता सेनानी आर्य समाज को मानते थे . श्रेष्ठ और प्रगतिशील विचारो से युक्त होने के कारण शिरोल नामक एक अंग्रेज ने आर्य समाज और सत्यार्थ प्रकाश को ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें खोखली करने वाला करार दे दिया था . वास्तव में आर्य समाज ने हिन्दू धर्म में एक नयी चेतना का आरंभ किया था और समाज सुधार की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण रोल भी अदा किया था .

आर्य समाज के कमजोर होते ही देश में पाखंड ,झूठ और आडम्बरो का बोलबाला बढ़ता गया जिससे धर्म की आड़ में भ्रष्टाचार भी काफी फलता -फूलता गया . आज के दौर में दुनिया के सभी धर्म खुद को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने में लगे हुए है जिससे धार्मिक भ्रष्टाचार भी चरम पर है . धर्मो की इस प्रतिस्पर्धा ने उन्हें हिंसक होने को भी विवश कर दिया है . इन वैश्विक घटनाचक्रो से भारत भी अब अलग नही रहा . आज देश में धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति उन सभी झूठी परम्पराओ को भी पाल -पोष रही है जिनके विरुद्ध दयानन्द के आर्य समाज ने अपनी आवाज बुलंद की थी . किन्तु अब तो हालत कुछ ऐसी हो गयी है कि आर्य समाजी स्वयम ही कट्टरपंथी हिंसक भीड़ के शिकार बन रहे है . समाज में भाईचारा समाप्त होता जा रहा है  और कभी देश के स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान देने वाले इन समाज सुधारक आर्य समाजियों के बलिदान और स्वराज के सपने भी धुंधले होते जा रहे है .


Friday, 29 June 2018

संघर्ष

(ओशो, अष्‍टावक्र: महागीता, भाग-1, प्रवचन-12)


मैंने सुना है, एक किसान परमात्मा से बहुत परेशान हो गया. कभी ज्यादा वर्षा हो जाए कभी ओले गिर जाएं, कभी पाला पड़ जाए कभी वर्षा न हो, कभी धूप हो जाए फसलें खराब होती चली जाएं, कभी बाढ़ आ जाए और कभी सूखा पड़ जाए . आखिर उसने कहा कि सुनो जी, तुम्हें कुछ किसानी की अक्ल नहीं, हमसे पूछो! परमात्मा कुछ मौज में रहा होगा उस दिन. उसने कहा, अच्छा, तुम्हारा क्या खयाल है? उसने कहा कि एक साल मुझे मौका दो, जैसा मैं चाहूं वैसा मौसम हो. देखो, कैसा दुनिया को सुख से भर दूं धन—धान्य से भर दूं!

परमात्मा ने कहा, ठीक है, एक साल तेरी मर्जी होगी, मैं दूर रहूंगा. स्वभावत: किसान को जानकारी थी. काश, जानकारी ही सब कुछ होती! किसान ने जब धूप चाही तब धूप मिली, जब जल चाहा तब जल मिला, बूंद भर कम—ज्यादा नहीं, जितना चाहा उतना मिला. कभी धूप, कभी छाया, कभी जल—ऐसा किसान मांगता रहा और बड़ा प्रसन्न होता रहा; क्योंकि गेहूं की बालें आदमी के ऊपर उठने लगीं. ऐसी तो फसल कभी न हुई थी. कहने लगा, अब पता चलेगा परमात्मा को! न मालूम कितने जमाने से आदमियों को नाहक परेशान करते रहे. किसी भी किसान से पूछ लेते, हल हो जाता मामला. अब पता चलेगा.

गेहूं की बालें ऐसी हो गईं, जैसे बड़े—बड़े वृक्ष हों. खूब गेहूं लगे. किसान बड़ा प्रसन्न था. लेकिन जब फसल काटी, तो छाती पर हाथ रख कर बैठ गया. गेहूं तो भीतर थे ही नहीं, बालें ही बालें थीं. भीतर सब खाली था. वह तो चिल्लाया कि हे परमात्मा, यह क्या हुआ? परमात्मा ने कहा, अब तू ही सोच, क्योंकि संघर्ष का तो तूने कोई मौका ही न दिया. ओले तूने कभी मांगे ही नहीं. तूफान कभी तुमने उठने न दिया. आंधी कभी तूने चाही नहीं. तो आंधी , अंधड़, तूफान, गड़गड़ाहट बादलों की, बिजलियों की चमचमाहट. तो इनके प्राण संगृहीत न हो सके. ये बड़े तो हो गए लेकिन पोचे हैं.

संघर्ष आदमी को केंद्र देता है. नहीं तो आदमी पोचा रह जाता है. इसलिए तो धनपतियों के बेटे पोचे मालूम होते हैं. जब धूप चाही धूप मिल गई, जब पानी चाहा पानी; न कोई अंधड़, न कोई तूफान. तुम धनपतियों के घर में कभी बहुत प्रतिभाशाली लोगों को पैदा होते न देखोगे—पोचे! गेहूं की बाल ही बाल होती है, गेहूं भीतर होता नहीं. थोड़ा संघर्ष चाहिए. थोड़ी चुनौती चाहिए.

*ओशो, अष्‍टावक्र: महागीता, भाग-1, प्रवचन-12*

Thursday, 28 June 2018

कबीर दास 'मगहर का संत '



15 वी शताब्दी में अपनी सीधी -साधी जुबान से दुनिया के आडम्बरो और पाखंडो के खिलाफ उन पर प्रहार करने वाले संतो की श्रेणी में कबीर दास जी को जाना जाता है . कबीर दास जी का जन्म 1398 ई में काशी में हुआ था . हालांकि उनका जन्मस्थान विवादित है . उनके जन्म के बारे में प्रचलित मान्यता यह है कि वह काशी के पास एक तालाब के किनारे पाए गये थे और उनका पालन -पोषण नीरू व नीमा नाम के जुलाहा दम्पति ने किया था .

कबीर दास जी के गुरु रामानन्द जी थे . किन्तु कहा जाता है कि रामानन्द जी कबीर को अपना शिष्य स्वीकार नही करना चाहते थे . जबकि कबीर रामानन्द जी को ही अपना गुरु बनाना चाहते थे . इसलिए उन्होंने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु एक योजना बनाई . कबीर दास जी जानते थे कि रामानन्द जी प्रत्येक दिन भोर में गंगा स्नान हेतु जाते है . अतः कबीर दास जी घाट की सीढियों पर अँधेरे में ही लेट गये . भोर समय जब गंगा स्नान को जाते हुए अनजाने में रामानन्द जी का पैर कबीर के ऊपर पड़ गया तो उनके मुख से अचानक 'राम -राम ' का शब्द निकल गया . बस इसी 'राम -राम 'को कबीर ने गुरु मन्त्र मान लिया .



कबीर दास जी सादा जीवन जीते थे . कुछ लोगो की धारणा के अनुसार कबीर दास जी विवाहित थे एवं उनके दो संताने भी थी . वह अपनी सामाजिक जीविका चलाने के लिए जुलाहे का ही कर्म करते थे . वह धर्म से ज्यादा कर्मो के सिद्धांत पर यकीन करते थे . उस समय धर्म के आडम्बर काफी चरम पर थे , किन्तु कबीर दास जी ने हिन्दू -मुस्लिम दोनों ही धर्मो की अनेक कुरीतियों पर खुल कर प्रहार किया . वह ईश्वर के अवतार , मन्दिर , मस्जिद ,मूर्ति पूजा , रोजा आदि के एकदम खिलाफ थे . उनका कहना था कि ,

पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार। 
वा ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार।।

यानि की पत्थर पूजने से यदि प्रभु की प्राप्ति हो जाए तो वह पहाड़ की पूजा करने के लिए भी तैयार है . इसकी अपेछा वह पत्थर के रूप में उस चक्की की तारीफ़ करते है जो अनाज को पीसती है और पूरी दुनिया का पेट पालती है . कबीर दास जी अंधविश्वास से कोसो दूर है . वह सभी धर्मो के अलग -अलग ईश्वर के बजाय एक ही ईश्वर को मानते थे .वह शांति प्रिय थे . उन्हें अहिंसा , सत्य ,सदाचार आदि से प्रेम था किन्तु सामाजिक ऊंच -नीच ,जांत -पांत , धर्मो की लड़ाई , कट्टरता और किसी भी प्रकार के भेदभाव से सख्त नाराजगी थी .वास्तव में कबीर दास जी अपने समय के सबसे बड़े समाज सुधारक , सामजिक चिंतक और समाजवादी विचारों से ओत -प्रोत थे . वह इंसानों के बीच में प्रेम और भाईचारा देखना चाहते थे . 

कबीर दास जी ज्ञान की गंगा थे . उनका ईश्वर निर्गुण था . वह राम की आराधना अवश्य करते थे किन्तु उनके राम , दशरथ नन्दन राम न होकर पूरी दुनिया के सर्वव्यापी राम है . उनके राम दुनिया के कण -कण में व्याप्त है . वास्तव में उनके राम , रमता राम है . उनके राम सगुण -निर्गुण के भेद से परे है .उनका मानना था कि ईश्वर को किसी नाम , रुप, गुण और काल की सीमा में नही बाँधा जा सकता है . कबीर दास जी की भक्ति निर्गुण ब्रह्म के साथ काफी सहज ,सरल और वास्तविकता से भरी हुई है . 


कबीर दास जी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कभी भी कागज और पेन नही छुआ था .उनके ज्ञान और भक्ति के प्रवचनों को उनके शिष्यों ने ही सुन कर ही लिखा था . उनके दोहों से बना 'बीजक ' ऐसा ही एक ग्रन्थ है .कबीर दास जी भक्ति की ज्ञानाश्रयी शाखा से आते है इसलिए उनके दोहों और शब्दों में ज्ञान का अकूत भंडार है . उन्होंने अपने उपदेशो और लोकव्यवहार से समाज में सदैव सत्य की महिमा को बताने का काम बखूबी किया है . धर्म के बारे में उनकी बाते धर्म के अनेक ठेकेदारों को पसंद नही आई , अत: हिन्दू -मुस्लिम दोनों धर्मो के ठेकेदारों ने उन्हें काफी परेशान किया . लोगो की मान्यता ( काशी में मरने पर स्वर्ग और मगहर में मरने पर नरक मिलता है) , को चुनौती देते हुए वह अपने अंतिम दिनों में मगहर चले गये थे . कहा जाता है कि यही पर इन्होने 119 वर्ष की अवस्था में 1494 ई में अपना लौकिक शरीर त्याग दिया .

आज जब समाज में झूठ , पाखंड , भ्रष्टाचार ,धार्मिक कट्टरता और भेदभाव का बोलबाला है तो कबीर दास जी के दोहे उनकी तपस्या को सार्थक करते हुए जन -जागरण कर रहे है .


Monday, 25 June 2018

विश्वनाथ प्रताप सिह



1975 के आपातकाल से लड़ने के लिए संयुक्त समाजवादी पार्टी और जनसंघ समेत कई पार्टियों के नेताओ को मिलाकर लोकनायक जयप्रकाश जी ने जनता पार्टी का सूत्रपात किया था . इसी जनता पार्टी ने मोरारजी देसाई के नेत्रत्व में 1980 तक केंद्र में सरकार चलाई थी . किन्तु कुछ आंतरिक मतभेदों और विपछी साजिशो के कारण यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नही कर सकी . लेकिन इस जनता पार्टी की सरकार ने सामाजिक समानता हेतु देश के संविधान की मंशा के अनुरूप पहली बार सामाज में पिछड़ों की पहचान हेतु सन 1979 में 'मंडल आयोग' को बैठा दिया था और श्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल को इसका अध्यक्ष बना दिया था . इसी मंडल आयोग ने ही सरकारी नौकरियों में पिछडे़ वर्गों के लोगों के लिए 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की मांग की थी. तब अपने लगभग 3 साल के छोटे किन्तु शानदार कार्यकाल के जरिये इस सरकार ने कई जनहित के कार्य किये थे . जनता पार्टी की सरकार जाने के बाद हुए आम चुनावों में इंदिरा गाँधी ने एक बार फिर से देश की कमान संभाल ली . 

असल में उस दौर में आजादी के बाद कांग्रेस की निरंकुशता पर नकेल डालने वालो में समाजवादी नेता अग्रणी थे . चाहे डा राम मनोहर लोहिया रहे हो या जयप्रकाश या फिर राजनारायण, सभी ने कांग्रेस को लोकतंत्र की ताकत दिखलाई . किन्तु 1979 में लोकनायक जयप्रकाश की म्रत्यु के बाद जनता पार्टी की सरकार भी 1980 में गिर गयी थी और फिर धीरे -धीरे इसके दिग्गज नेता भी बिखर गये . वर्ष 1980 से 1984 तक इंदिरा गांधी अपनी शहादत तक कांग्रेस की प्रधानमन्त्री बनी रही . उनकी शहादत के बाद 1984 में जो आम चुनाव हुए उसमे उनके पुत्र राजीव गांधी को देश का प्रधानमन्त्री बनने का सुअवसर प्राप्त हुआ .

विश्वनाथ प्रताप सिह के बारे में चर्चा करने से पहले यह एक अत्यंत आवश्यक रुपरेखा थी. अब बात मांडा के राजा की करते है . असल में राजा विश्वनाथ प्रताप सिह राजीव गांधी मंत्रीमंडल में वित्त मंत्री हुआ करते थे और उनके रहते ही विवादित बोफोर्स का सौदा तय हुआ था . इसी बोफोर्स काण्ड को हवा में उछाल कर वी पी सिह दुनिया की नजरो में सत्यवादी हरिश्चन्द्र बन गये थे . कभी वी. पी. सिंह ने चुनावी जनसभाओं में दावा किया था कि बोफोर्स तोपों की दलाली की रक़म एक 'लोटस' नामक विदेशी बैंक में जमा कराई है और वह सत्ता में आने के बाद पूरे प्रकरण का ख़ुलासा कर देंगे. ये तो ईश्वर ही जानता होगा कि इस सौदे में गांधी परिवार संलिप्त था कि नहीं , किन्तु उस दौर में बोफोर्स ने वी पी सिह को रातो रात देश का सबसे ईमानदार नेता अवश्य बना दिया.




कहा जाता है वी पी सिह मांडा के राजा के दत्तक पुत्र थे . छात्र राजनीति के बाद वह कांग्रेस पार्टी से जुड़े और उत्तर प्रदेश की कांग्रेसी राजनीति में मुख्यमंत्री बनने के बाद केंद्र की राजनीति में लाये गये . बोफोर्स मुद्दे के कारण 1987 में कांग्रेस से निष्काषित होने के बाद एक तरफ वी पी सिह बोफोर्स का मुद्दा गरमा रहे थे और दूसरी तरफ जनता पार्टी के कई पुराने दिग्गज नेता डा लोहिया की सामाजिक समानता की अवधारणा को एक बार फिर से जमीन पर उतारने की खातिर मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करवाने हेतु आम जनता खासतौर से पिछडो के बीच में दिन -रात जन -जागरण कर रहे थे . इस जन -आन्दोलन की मुहीम का असर ये हुआ कि देश की जनता ने कांग्रेस को विपछ में बैठने का जनादेश दे दिया और वी पी सिह का राष्ट्रीय मोर्चा कुछ अन्य पार्टियों (जनता दल , भाजपा एवं वामपंथी दल ) के सहयोग से 1989 में देश की सत्ता पर आसीन हो गया .

प्रधानमन्त्री बनने के बाद वी पी सिंह ने 13 अगस्त 1990 को लगभग 10 साल से लटकी हुई मंडल आयोग की अधिसूचना को जारी कर दिया. इसके जारी होते ही पूरा देश 2 भागो में बंट गया . एक तरफ आरछण के विरोधी थे तो दूसरी तरफ आरछण समर्थक . सवर्ण बिरादरी तो पूरी तरह से वी पी सिह की दुश्मन बन गयी . मंडल कमीशन के विरोध में कांग्रेस और भाजपा के खाए -पिए लोग भी एकजुट हो गये . भाजपा ने तो वी पी सिह की सरकार से समर्थन तक वापस ले लिया और मंडल की काट के लिए कमंडल का खेल रच दिया . भाजपा ने नवम्बर 1990 में ही अयोध्या में श्री राम मन्दिर निर्माण का बीज बोकर मंडल के प्रभाव को समाप्त करने हेतु अनेक अडचने पैदा करना प्रारम्भ कर दिया . अनेक बार बाबरी मस्जिद गिराने हेतु प्रयास हुए जिसका मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिह यादव की सरकार को अस्थिर करना ही था .

वास्तव में मंडल आयोग ने जहा एक तरफ समाज में पिछडो को अपना स्तर सुधारने का अवसर देकर सामाजिक ऊंच -नीच की खाई को कमजोर किया वही इसने भाजपा को इसकी काट हेतु धार्मिक ध्रुवीकरण का मन्दिर मुद्दा भी थमा दिया . जो कि आज भी भाजपा को संजीवनी देता रहता है . अपने छोटे से कार्यकाल में वी पी सिह ने मंडल कमीशन को लागू करने का एक अहम फैसला लिया था , इसके लिए वह सदैव स्मरणीय रहेंगे . अपने इस महत्वपूर्ण फैसले की खातिर उन्होंने अपनी सरकार के गिर जाने की भी परवाह नही की . अचानक मंडल और मन्दिर प्रकरण की घटनाओं के कारण देश की यथास्थिति से वी पी सिह हैरत में थे और वह सक्रिय राजनीति से दूर हो गये . इसके कुछ समय बाद ही वह गम्भीर रूप से अस्वस्थ भी हो गये . उन्हें पहले रक्त कैंसर की समस्या हुई किन्तु बाद में किडनी भी खराब हो गयी . अपनी इन लाइलाज बीमारीयो से जूझते हुए वी पी सिह जी 27 नवम्बर 2008 को इस दुनिया से विदा हो गये .

चूँकि विश्वनाथ प्रताप सिह अपने फतेहपुर लोक सभा निर्वाचन छेत्र से ही सांसद थे इसलिए एक चुनावी सभा में नवम्बर 1989 को उन्हें देखने -सुनने का एक सुअवसर मुझे भी प्राप्त हुआ . इस छेत्र की जनता में उनकी लोकप्रियता बढिया थी और वह भी जनता से मिलना काफी पसंद करते थे . किन्तु प्रधानमन्त्री होने के बावजूद उन्होंने फतेहपुर के विकास के लिए लगभग कुछ नही किया इसलिए यह जिला आज भी काफी पिछड़ा हुआ है . लेकिन देश और समाज के समग्र विकास के लिए उन्होंने जो महान जन हित का कार्य किया है उसके लिए उन्हें सदैव एक समाज सुधारक और सामजिक न्याय के दूत के रूप में अवश्य याद किया जाएगा .